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डेंगू से बेटे की मौत के बाद मां-बाप ने की खुदकुशी

तीन दिन पहले सात वर्षीय अविनाश राउत की डेंगू से मृत्यु के बाद उसके माता-पिता लक्ष्मीचंद्र और बबीता ने घर के पास एक इमारत से कूदकर प्राण दे दिए..

Author नई दिल्ली | Updated: September 12, 2015 4:07 PM

‘यह किसी की गलती नहीं है। यह हमारा फैसला है।’ अपने बेटे की अकाल मौत से व्यथित एक माता-पिता ने उड़िया भाषा में लिखे अपने सुसाइड नोट में यह बयां किया है। तीन दिन पहले सात वर्षीय अविनाश राउत की डेंगू से मृत्यु के बाद उसके माता-पिता लक्ष्मीचंद्र और बबीता ने घर के पास एक इमारत से कूदकर प्राण दे दिए।

8 सितंबर को अस्पताल में अविनाश की डेंगू से मौत हुई थी। पुलिस और इस परिवार के पड़ोसियों का कहना है कि माता-पिता काफी भागदौड़ के बाद डेंगू से पीड़ित अपने बेटे के लिए अस्पताल में बेड नहीं दिला पाए। बतरा अस्पताल में जब अविनाश को पहुंचाया गया, उसकी हालत बिगड़ चुकी थी। रात भर उनके बेटे को बचाने की कोशिश हुई और सुबह दस बजे उसने दम तोड़ दिया।

पुलिस का कहना है कि दुखी राउत दंपति ने उसी रात छतरपुर में बेटे का अंतिम संस्कार किया। रात ढाई बजे पड़ोसियों ने देखा करीबी सरकारी स्कूल के परिसर में उन दोनों की लाशें पड़ी थीं। उनके दोनों हाथ एक-दूसरे से बंधे थे। लाडो सराय की इमारत नंबर एम 212 में यह परिवार किराए पर रहता था।

दो कमरों के इस घरकी दीवार से सटी एक पीली साइकिल खड़ी थी। यह अविनाश उर्फ बिट्टू की थी।घर की मालकिन कविता सेजवाल ने बताया कि हादसे वाली जगह में एक दुपट्टे से बबीता का बांया हाथ लक्ष्मीचंद्र के दाएं से बंधा था। बबीता रात के कपडेÞ पहने थी। बेटे के अंतिम संस्कार के बाद उसे इन्हीं कपड़ों में देखा था। ऐसा लगता था कि वह पहले गिरी थी और उसका पति बाद में गिरा था। मरने के बाद भी उनके हाथ कस कर बंधे थे।

लक्ष्मी चंद्र एक निजी फर्म में काम करता था। बबीता घर देखती थी और अविनाश पहली में पढ़ता था। उसी इमारत के किराएदार ज्ञानेंद्र देबाशीश ने बताया कि सात सितंबर कोशाम करीब छह बजे बबीता और लक्ष्मीचंद्र बिट्टू को अस्पताल ले गए। पास के एक नर्सिंग होम में उसके इलाज के बाद बच्चे को घर लाया गया। डॉक्टरों ने उसे अस्पताल में भरती करने की सलाह दी थी। पर मां-बाप को उसकी हालत ठीक लगी। उसी दिन शाम को अविनाश की तबीयत बिगड़ गई। पड़ोसियों का कहना है कि बच्चे को दो-तीन बड़े अस्पताल ले जाया गया, पर वहां कोई बेड नहीं मिला। तुगलकाबाद एक्सटेंशन के बतरा अस्पताल में जगह मिली। लेकिन तब तक वहां हालत बिगड़ चुकी थी। डाक्टरों का कहना है कि बच्चे को काफी गंभीर हालत में लाया गया था। उसे बचाने की पूरी कोशिश की गई।

पुलिस उपायुक्त (दक्षिण) प्रेमनाथ ने इस बात की पुष्टि की बेटे की मौत के बाद ओड़िशा के इस दंपति ने अपनी जान दे दी। उनका शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया। पड़ोसियों का कहना है कि बेटे की मौत के बाद बबीता इतनी आहत थी वह अस्पताल की छत से कूदकर जान देना चाहती थी। जबकि लक्ष्मीचंद्र शांत दिख रहा था। पड़ोसियों ने बताया कि रात 12 बजे के आसपास उन्होंने यह कहकर सबको घर भेज दिया कि वे आराम करना चाहते हैं। इसके बाद ही मौत को गले लगाने के लिए वे घर से निकल गए। बबीता और लक्ष्मीचंद्र का अंतिम संस्कार गुरुवार को छतरपुर श्मशान में कर दिया गया।

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