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गीत संगीत: ‘ए बारे सैंया, तोहे सकल वन ढूंढ़ूं’

मुख्य राग के बाद उन्होंने शाम के लोकप्रिय राग केदार में एक भावभीनी पुरानी बंदिश ‘साजन बिन नींद न आये, बिरह सताये’ मध्य-द्रुत एकताल में गाई।

पंडित राजन एवं साजन मिश्र

‘संगीत हमारे लिए पूजा है। हम आज आप सभी को राग नंद द्वारा मां सरस्वती की पूजा में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करते हैं’। ये उद्गार थे पंडित राजन एवं साजन मिश्र के, जो आइआइटी के सेमिनार हॉल में स्पिक मैके द्वारा आयोजित चतुर्दिवसीय संगीतोत्सव का शुभारंभ कर रहे थे। विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूक करने वाली इस संस्था का पांचवां वार्षिक अंतरराष्ट्रीय अधिवेशन इस बार आइआइटी दिल्ली में हो रहा है, जिसकी पूर्वपीठिका स्वरूप पिछले हफ्ते यह उत्सव आयोजित था।  चार दिनों तक चले इस संगीतोत्सव में पहले दिन पंडित राजन-साजन मिश्र का शास्त्रीय गायन, दूसरे दिन कुचिपुड़ी-युगल डॉक्टर राजा-राधा रेड्डी का नृत्य, तीसरे दिन पंडित हरिप्रसाद चौरसिया का बांसुरी-वादन और अंतिम दिन श्री शेखर सेन के लोकप्रिय शो ‘कबीर’ की संगीतात्मक साभिनय प्रस्तुति देखने-सुनने हर शाम संगीत प्रेमी उमड़े।

उद्घाटन की शाम गायन शुरू करने से पहले पंडित राजन-साजन मिश्र ने परंपरा को सहेजने के लिए इस संस्था का साधुवाद करते हुए बताया कि उनका इससे पुराना नाता रहा है अत: यह परिसर उन्हें अपना सा लगता है। राग नंद की परिचयात्मक आलाप के बाद इस राग का जाना-पहचाना बड़ा खयाल ‘ए बारे सैंया, तोहे सकल वन ढूंढूं’ उन्होंने विलंबित एकताल में शुरू किया तो सुर दर सुर राग विस्तार के साथ ही साथ बंदिश की बोल बढ़त में नायिका की विरह वेदना भी रेखांकित होती रही। स्थायी-अंतरा भरने के बाद थोड़ी सी लय बढ़ाकर पहले बराबरी की लय में गमक-मयी आकार की तानें, फिर सरगम की उलट-पलट वाली तानें और अंत में आकार की हरहराती तानों तक में एक-दूसरे से उनका परस्पर संवाद लगातार बना रहा। इस विलंबित बंदिश के बाद छोटा ख्याल ‘अजहूं न आए श्याम’ भी विरह भाव की पारंपरिक बंदिश ही थी। लेकिन इसके बाद द्रुत एकताल में निबद्ध ‘हे सलोनी सांवरी’ में एक सुरीला उछाह था, बंदिशों के मामले में मिश्र बंधुओं का खजाना भरा-पूरा है।

मुख्य राग के बाद उन्होंने शाम के लोकप्रिय राग केदार में एक भावभीनी पुरानी बंदिश ‘साजन बिन नींद न आये, बिरह सताये’ मध्य-द्रुत एकताल में गाई। प्राय: इस बंदिश में लोग ‘नी धनी सा सा’ गाने की भूल करते हैं, लेकिन सीधे पंचम से तार सा लेकर उन्होंने एक तरह से उन्हें व्याकरण-सम्मत रास्ता दिखाया। इस राग की जानी-पहचानी बंदिश ‘कान्ह रे नंद-नंदन’ तीन ताल में गाते हुए उन्होंने एक बार फिर इस राग की इन दोनों ही बंदिशों में भाव भरने का काम बेहद मीठे ढंग से किया। पहली में श्रृंगार का वियोग पक्ष दिल छू लेने वाला था तो दूसरी में संयोग, जहां ‘बृजबाला’ जैसे शब्द के श्रृंगार से सराबोर उच्चारण पर उन्हें बरबस तालियां मिलीं। इस शाम शैलेंद्र मिश्र ने तबले पर और सुमंत मिश्र ने हारमोनियम पर उनकी सोत्साह संगति की।

 

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