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पं. छन्नूलाल मिश्र ने कहा, बदल गया मानव जीवन का ध्येय

पद्मभूषण से सम्मानित शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का कहना है कि कण-कण में ईश्वर बसा है।

Author March 23, 2018 01:17 am
पद्मभूषण से सम्मानित शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र

पद्मभूषण से सम्मानित शास्त्रीय गायक पंडित छन्नूलाल मिश्र का कहना है कि कण-कण में ईश्वर बसा है। छल छोड़ कर मानव सेवा करना ही रामभक्त का लक्षण है। पं. छन्नूलाल मिश्र जयपुर में एक समारोह में शामिल होने आए थे। उसी दौरान उनसे आज के माहौल को लेकर शास्त्रीय संगीत और नई पीढ़ी की उसमें रुचि को लेकर बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि अब उदासीनता का माहौल है। इस उदासीनता की वजह शिक्षा और संस्कार की कमी है। अपनी गायिकी से श्रोताओं को भावविभोर कर देने वाले मिश्र आज भी पूरी तरह से युवाओं की तरह तरोताजा रह कर अपने गायन से लोगों को बांध देते हैं। उन्होंने बातचीत के दौरान भक्ति को लेकर अपनी बात साझा की। उनसे जब पूछा गया कि भक्ति पुराने फैशन की तरह है और पिछड़ेपन के तौर पर पहचानी जाती है। नई पीढ़ी की इसमें रुचि नहीं है, इससे कैसे निबटा जा सकता है? इस पर छन्नूलाल मिश्र ने बेबाकी से अपनी राय रखी। उनका कहना था कि अब मनुष्य के जीवन का ध्येय ईश्वर प्राप्ति न हो कर धन प्राप्ति हो गया है। नए बच्चों में शिक्षा की कमी के साथ संस्कारों का अभाव भी साफ दिखता है। माता पिता और गुरु को प्रणाम वाली बातें अब गौण हो गई हैं। शिक्षक को अब गुरु का दर्जा खत्म हो गया है। माता-पिता अपने बच्चों को कार में बैठा कर शिक्षा लेने भेजते हैं, गुरु सम्मान की परंपरा ही खत्म हो गई है। गुरु के पास भी अब विद्या नहीं मिल रही है, उसे नौकर के समान समझा जाता है।

पं. छन्नूलाल मिश्र ने कहा कि आज शिक्षा लेने वाले भी उसमें ध्यान नहीं लगाते हैं। संगीत की शिक्षा लेने के लिए पूरा ध्यान लगाना पड़ता है। शिक्षा लेते समय ही जब बच्चों का मन हर जगह दौड़ेगा तो फिर सही अर्थों में शिक्षा ग्रहण नहीं हो पाती है। मिश्र ने जोर देकर कहा कि ज्ञान होगा तभी ध्यान लगेगा। संगीत शिक्षा में ध्यान मग्न होकर गुरु के बताए रास्ते का अनुसरण करके ही महारत हासिल की जा सकती है। सब अपना है और सब पराया है के भाव से ही बच्चे ध्यान लगा कर शिक्षा लेंगे तो यह विधा आगे बढ़ेगी। मिश्र का कहना है कि आए का कुछ नहीं और गए का कुछ नहीं की सोच से ही शिक्षा ली और दी जा सकती है।

मिश्र ने यहां राजस्थान संस्कृत अकादमी की तरफ से आयोजित रामानुजाचार्य के दार्शनिक संसार विषय की गोष्ठी का उदघाटन करते हुए उस दौर के भक्तिकाल का उल्लेख किया। उस दौर को कबीर के प्रसंगों से जोड़ा। उनका कहना था कि कबीर के सदगुरु की व्याख्या से ही समाज के तमाम रूप सामने आ जाते हैं। मिश्र ने यहां नवसंवत्सर के मौके पर सेंट्रल पार्क में शास्त्रीय गायन के जरिए लोगों की खूब वाहवाही लूटी। उन्होंने ठुमरी रचना आजा सांवरिया से अपने गायन की शुरुआत करते हुए श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

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