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पुस्तक समीक्षाः बेजान होते इंसान में जिंदा हरकतों की खोज

रचना से पूर्व, उसके पिछवाड़े में बहुत कुछ पड़ा होता है चमकते पत्थर तो कचरा भी। हर लेखक, अपने-अपने ढंग से इससे निपटता है और रचना-पूर्व के रहस्य को खोलता है।

नरेंद्र मोहन की विशिष्ट रचनाएं’ और ‘कविता समग्र’ के दोनों भागों को पढ़ते हुए एक रचनाकार का शब्दों के साथ विधाओं से भी संघर्ष दिखता है।

रचना से पूर्व, उसके पिछवाड़े में बहुत कुछ पड़ा होता है चमकते पत्थर तो कचरा भी। हर लेखक, अपने-अपने ढंग से इससे निपटता है और रचना-पूर्व के रहस्य को खोलता है। रचना में जो संसार फूट पड़ता है, उसकी जड़ें यही हैं। मेरे लिए रचना से पहले एक धुंध सी रहती है, एक खालीपन। यह धुंध कैसे छंटती है और खालीपन शब्दों में कैसे बोलने और सुलगने लगता है, इस बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कह सकता। हां, जिस क्षण धुंध छटने लगती है, खालीपन सुलगने लगता है तो मुझे उनमें समाई जिंदा हरकतें दिखने लगती हैं।’ ‘नरेंद्र मोहन विशिष्ट रचनाएं’ में नरेंद्र मोहन अपनी रचना प्रक्रिया की प्रयोगशाला को पाठकों के सामने खोलते हैं तो हम समझते हैं कि कैसे एक छोटे से बीकर में निजी अनुभवों के रसायनों को मिलाकर इतिहास के पूरा कालखंड खोज लेते हैं।

‘नरेंद्र मोहन की विशिष्ट रचनाएं’ और ‘कविता समग्र’ के दोनों भागों को पढ़ते हुए एक रचनाकार का शब्दों के साथ विधाओं से भी संघर्ष दिखता है। वे कहते हैं कि सृजनात्मकता इलैस्टिक का फीता नहीं है कि उसे जितना चाहे खींचते चले जाएं। उनकी रचनाएं बड़े भावजगत को संघनन के बिंदु पर लाती हैं। आपातकाल हो या मंटो या गिरिजाकुमार माथुर, नरेंद्र मोहन अपने शब्दों से एक जिंदा शक्ल तैयार कर देते हैं। माथुर को याद करते हुए वे लिखते हैं ‘तब यह कहां पता था कि एक कवि के डूबने का अर्थ सूर्य के डूबने के अर्थ से कुछ कम नहीं होता’। समकालीन रचनाकारों, दोस्तों और समय को याद करते हुए कभी-कभी इनके शब्द लावा के ऊपर बिछे बर्फ जैसे महसूस हो सकते हैं तो कहीं-कहीं पर वाक्य अधूरे से लगते हैं। यही अधूरापन है जो रचनाकर्म को पूरा करता सा दिखता है। जहां अपनी बात कहने के लिए आपको शब्दकोश के सभी शब्द भी कम पड़ने लग जाएं। जो खुद विभाजन का मारा है वह जिन्ना पर नाटक उसे नायक बनाने के लिए लिख रहा है या खलनायक बनाने के लिए। रचनाकार इसका जवाब देते हैं ‘हीरो, विलेन के आगे क्या हम कुछ नहीं सोच सकते’। नाटक के तय किरदारों के संवाद लिखते हुए अचानक एक अनचाहे का आ जाना, और उसे पहचानने का संघर्ष करना इनकी रचनाओं में दिख जाता है। जब ज्ञान ही असहाय कर दे और ज्ञान ही अंधेरा बन कर चेतना पर छाने लगे तो वो उस अंधेरे को छांटने के लिए चाबी ढूंढ़ लेते हैं। ऐतिहासिक और सामयिक चेतना की चाबी लगाने भर से ध्वनियां उभरने के साथ बिंब-प्रतिबिंब भी बनने लगते हैं।

नरेंद्र मोहन की कविताएं आम इंसानों के सपनों, हादसों, कोमलता और हिंसा के साथ प्रयोग करती हैं। कई तरह की विधाओं के साथ प्रयोग करने के कारण उनकी एक कृति में सारी विधाएं दिख जाती हैं। कविताओं में जॉर्ज आर्वेल को लाने के साथ ही मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ की पुनर्रचना कर बैठते हैं। बिना राजनीतिक नारेबाजी के ये पूरी राजनीति का पोस्टमार्टम कर बैठते हैं। उस बौद्धिकता पर हमला करते हैं जो सिर्फ हर खेमे में संतुलन बिठाना चाहती है। संतुलनवादी बौद्धिकों से वे खरी-खरी कहते हैं, ‘आप मुझे समझा रहे हैं क्रांति/एक सिक्के की तरह उछालते हुए-यह रही/ जब कि मुझे वह दिखती रही अंगारे-सी दहकती…’। वे तनावभरी अबूझ भाषा की चाबी भी खोज लाते हैं और अपने शब्द रचते हैं।

घर से स्कूल तक जहां भाषा मारी जा रही हो और इस मरघट पर कोई विलाप भी न हो तो शोक के इस आलस को वो झकझोरते हुए कहते हैं, ‘ ‘समाचार हो चुकी भाषा को/जिंदा करने का अहम सवाल सामने है/ और तुम लगातार जम्हाइयां ले रहे हो’। निराशा के इस घोर अंधेरे में भी वे शोषितों और शासितों के बीच संवाद की उम्मीद रखते हैं। इनके बीच बनी चौड़ी खाई के बीच संवाद का पुल बनाने की वकालत करते हुए कहते हैं, ‘मैं नहीं मान सकता/आपकी चमड़ी है ही नहीं/हां, यह जरूर है कि आपने साधना द्वारा/इतना सख्त बना लिया है इसे कि/किसी बड़े धमाके के बिना/इसमें कहीं कोई हरकत नहीं होती/’। इनकी कविताएं उस बेजान होते इंसान की अभिव्यक्ति हैं जिसकी स्मृति जिंदा है। कवि बीते कल, आज और आने वाले कल के साथ निरंतर संवाद कर रहा है। बम, गोलों और रॉकेटों के शोर में गुम हुए बच्चों की पीड़ा इनकी कविताओं का सबसे उल्लेखनीय पक्ष है।
नरेंद्र मोहन की रचनाओं में खुद से बात करता हुआ इंसान पूरे देश की तरफ से और पूरे देश के लिए बोलता हुआ दिख जाता है। ये रचनाएं पिछले पचास साल के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक द्वंद्व से जूझती हैं। ये बौद्धिकता का आतंक नहीं रचती हैं। सीधे-सरल शब्दों में कवि अपनी बात कह जाते हैं, ‘कितना तन लो/तान लो कितना प्रतीकों का जाल/सादगी के सामने/चमत्कार बेकार’।

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