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उपन्यासः पहाड़ का दर्द

गपबाजी। कुमाऊंनी का शब्द है। इसी नाम से उपन्यास लिखा है राकेश तिवारी ने। कुछ लोगों को नाम भर से इसमें ‘कसप’ की छाया दिख सकती है। मगर यह बिल्कुल अलग है।

सूर्यनाथ सिंह
फसक यानी गप। गपबाजी। कुमाऊंनी का शब्द है। इसी नाम से उपन्यास लिखा है राकेश तिवारी ने। कुछ लोगों को नाम भर से इसमें ‘कसप’ की छाया दिख सकती है। मगर यह बिल्कुल अलग है। आजकल लिखे जा रहे उपन्यासों से भी भिन्न अंदाज में भी, विषय-वस्तु और शिल्प में भी। कोई गप में भी उपन्यास लिख सकता है, ‘फसक’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। बचवाली नामक एक कस्बे के जीवन को उकेरते हुए पूरे उत्तराखंड के पहाड़ को उपस्थित कर दिया गया है इस उपन्यास में। एक चाय की दुकान पर बैठकी करने वाले तीन-चार चरित्र पहाड़ की धड़कनों पर नजर रखे हुए हैं।

एक लड़की- रेवा- अपनी जड़ों की तलाश में पहाड़ पर आती है। लंबे समय से बंद पड़े भुतहे जोशी कॉटेज में रहने लगती है। उसे लेकर बचवाली में फसक शुरू हो जाती है। भूत के साथ उसके प्रेम संबंधों की अटकलें लगाई जाने लगती हैं। बचवाली के लफंगे रात को जोशी कॉटेज की खिड़कियों से कान लगा कर उसमें से आने वाली आवाजें सुनते हैं और अपने-अपने ढंग से प्रेमकथा के सूत्र बढ़ाते जाते हैं। अटकलें विश्वास में बदलने लगती हैं।

इस कथा के सूत्र से जुड़ी, समांतर चलती तीन-चार कथाएं और हैं। नन्नू महराज यानी बाबाजी, चंदू पांडे, तेजू यानी तेज प्रताप, पी थ्री यानी प्रेम प्रकाश पंत, विधवा पुष्पा और रेवा की कथाएं। चंदू जमीन-जायदाद के धंधे में है, बाबाजी का परम भक्त, देश की संसद में पहुंचने का सपना संजोए। स्थानीय निकाय का चुनाव जीत कर शक्ति अर्जित करता है। भैयाजी जैसे ताकतवर नेता के जनाधार में सेंध लगाता है। बाबाजी उसके ताकत के खेल में सहयोग करते हैं और विधवा पुष्पा उनकी हवस का शिकार बनती है। तेज प्रताप और पी थ्री संवेदनशील पढ़े-लिखे, दुनिया-जहान की तिकड़मों को तह तक समझने वाले युवा हैं। पर वे बचवाली के समाज में फिट नहीं बैठ पाते। तेज प्रताप से रेवा की निकटता बढ़ती है और उसकी कहानी खुलती है।

रेवा की मां ने एक दलित से प्रेम किया। उससे गर्भ धारण किया और रेवा पैदा हुई। उच्च कुल के जोशी परिवार को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और रेवा की मां का प्रेमी यानी उसके पिता कहां खो गए, किसी को नहीं पता। जोशी परिवार उजड़ कर महानगरों में बस गया। कभी शानो-शौकत का प्रतीक रहा जोशी कॉटेज में ताला लटक गया। रेवा अपने पिता की तलाश में है। अपनी जड़ों की तलाश में है। मगर बचवाली उसे खदेड़ने में सफल होता है। चंदू पांडे और बाबाजी के नेतृत्व में जोशी कॉटेज की शुद्धि यानी उस पर कब्जे का अभियान चलता है। यह कथा गपबाजियों के बीच चलती रहती है और पहाड़ की हकीकत खुलती रहती है। पहाड़ को खोखला करने की तिकड़में उजागर होती रहती हैं। किस तरह राजनीति और धर्म मिल कर पहाड़ की परंपरा को धूमिल कर रहे हैं, आधुनिक तकनीक के आने से किस तरह वहां के युवा गुमराह हो रहे हैं, इन तमाम पक्षों पर यह उपन्यास नजर डालता चलता है। इसमें फसक-फसक में पहाड़ की पुरानी परंपराओं और इतिहास पर भी चर्चा चलती रहती है। यह एक तरह से बदलते, टूटते-दरकते पहाड़ के दर्द की कहानी है। उपन्यास के शुरू से लेकर अंत तक बीच-बीच में फ्यून नामक एक अपशकुनी जंतु के बोलने का जिक्र उठता रहता है। पहाड़ के लोगों का मानना है कि जब भी फ्यून बोलता है, किसी न किसी की मौत होती है। यह एक प्रकार से प्रतीक है, पहाड़ पर मंडराते संकट का।

राकेश तिवारी में गजब की विश्लेषण क्षमता है। वे हर चीज को बहुत बारीकी से देखते और उसके बारे में बड़े थिर होकर कहते-बताते चलते हैं। बात से बात निकालते-बढ़ाते, बनाते चलते हैं। पक्के बातूनी की तरह। उनकी बातों का सिरा कहीं खत्म नहीं होता। उन बातों में पहाड़ का लहजा है, वहां की बोली-बानी और मुहावरे हैं। रीति-रिवाजों-मान्यताओं की गंध है। पहाड़ का भोलापन है, तो आधुनिकता की ललक में पैदा हुआ शातिरपन भी है।

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