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होली की रंगत

परंपरा में होली ऋषि और कृषि का उत्सव है। वैदिक काल से लेकर आज तक होली ऋषियों और कृषकों द्वारा ही मनाई जाती रही है।

(PHOTO-PTI)

शास्त्री कोसलेन्द्रदास

बंगाल को छोड़ सर्वत्र होलिका दहन
बंगाल को छोड़कर होलिका-दहन प्राय: सर्वत्र होता है। बंगाल में फाल्गुन पूर्णिमापर कृष्ण प्रतिमा का झूला प्रसिद्ध है। यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं है कि होली पर रंग खेलने की अवधि भी पूरे देश में विभिन्न है। कहीं यह रंगीली बौछारें होली के अगले दिन ही बरसती हैं, कहीं पांचवें दिन तो कहीं आठवें दिन और कहीं तो पूरे पखवाड़े। रंगों से खेलने के पीछे जो पारंपरिक गूढ़ धार्मिक तत्त्व छिपा है, वह है पुरोहितों द्वारा होलिका की पूजा और श्रीकृष्ण का गोपियों के साथ रंगीली होली खेलना।

परंपरा में होली ऋषि और कृषि का उत्सव है। वैदिक काल से लेकर आज तक होली ऋषियों और कृषकों द्वारा ही मनाई जाती रही है। आश्रमों में ब्रह्मचारी वटुक फाल्गुनी पूर्णिमा को ‘सामवेद’ के मंत्रों का गान करते थे। एक ओर जहां गुरुकुलों में होली पर ‘हुताशनी’ अनुष्ठान होता है, वहीं नई फसल के पक जाने पर किसान और सारे नागरिक चटकीले फागुन में रंग-बिरंगी होली खेलते हैं। वेदों ने होली को प्रथम वैदिक देवता ‘अग्नि’ से मिलाया। भला, धरती पर उपजे नए धान्य को ऐसे थोड़े ही खाया जाता है? जौ-गेहूं की चमचमाती बालियों को सबसे पहले ‘अग्नि देवता’ को समर्पित किया जाता है। यजुर्वेद ने नए धान्य को ‘वाज’ कहा है। होली की वैदिक अग्नि-ज्वाला में ‘वाज’ की आहुति देकर फिर उन पकी हुई बालियों को प्रसाद रूप में ग्रहण करना है। नव धान्य से जुड़ा होने के नाते होली हमारे जीवन को चलाने वाला उत्सव है। वेदों में वर्णित चार प्रमुख उत्सवों में होली एक है। यह जरूर है कि वैदिक काल में जो ‘होलाका’ थी, वह अब ‘होली’ हो गई। ‘काठक गृह्णसूत्र’ ने होली को स्त्रियों के सौभाग्य वृद्धि के लिए संपन्न किया जाने वाला एक अनुष्ठान माना है, जिसके देवता चंद्रमा हैं।
‘तंत्र शास्त्र’ ने फागुनी पूनम की रात को ‘दारुण रात्रि’ कहा है। वहां यह साधना और सिद्धियों को प्राप्त करने की रात्रि है। भारत रत्न पांडुरंग वामन काणे ने ‘धर्मशास्त्र के इतिहास’ में होली को भारत में सबसे बड़े उल्लास और आनंद का उत्सव माना है।

पौराणिक आख्यानों में हिरण्यकशिपु की बहन होलिका का वह आख्यान प्रसिद्ध है, जिसमें वह अपने कपट से भक्त प्रह्रलाद को गोद में बिठाकर जलाना चाहती है। होलिका की मृत्यु तथा प्रह्रलाद का बचाव हो जाता है। पर इसके बाद का ऐसा वर्णन, जिससे आज की होली का मेल होता है सातवीं सदी के संस्कृत नाटककार और कन्नौज के महाराज हर्षवर्द्धन ने अपने ‘रत्नावली’ नाटक में किया है। वहां हो रही होली ‘वसंतोत्सव’ है। स्थान है कौशांबी, आज से ढार्ई हजार साल पहले का सुंदर शहर। अब प्रयाग से दूर कोसम गांव में इस नगर के अवशेष हैं। नाटिका में राजा उदयन अपने किले पर खड़े होकर सारी प्रजा को विभिन्न रंगों से होली खेलते देख प्रमुदित हो रहे हैं। स्त्रियां होली खेलने में व्यस्त है। कुंकुम से भरी मुट्ठियां आकाश में उड़कर लाल बादल बना रही हैं? कहीं-कहीं पीले गुलाल से बने बादल यूं लग रहे हैं, मानो वे स्वर्ण के ही बादल हों।

इधर, राजमहल के भीतर होली यूं जमी है कि मदमस्त लोग पिचकारियों से एक-दूसरे पर सुगंधित जल डाल रहे हैं तो महल में भारी कीचड़ मच गया है और मतवाली कामिनियों के मस्तक का सिंदूर पानी के साथ बहकर नीचे तक फैल गया है। प्राकृत भाषा में पहली शताब्दी के लगभग लिखी ‘गाहा सतसई’ में होली को ‘वसंतोत्सव’ न कहकर ‘फाल्गुनोत्सव’ कहा गया है। यहां के ‘फाल्गुनोत्सव’ में नदी किनारे इकट्ठे हुए युवक-युवतियां एक-दूसरे पर बिना किसी भेदभाव के नदी का कीचड़ उछाल रहे हैं। ‘गाहा सतसई’ की होली गांव की है। अत: गांवों के सारे संसाधन होली खेलने के काम आते हैं। यह बहुत गौर करने की बात है कि जब ‘गाहा सतसई’ की होली खेली जा रही थी, तब वात्स्यायन अपने ‘कामसूत्र’ में सुवसंतक, उदकक्ष्वेडिका और अभ्यूषखादिका जैसे उत्सवों की चर्चा कर रहे थे। इनमें ‘सुवसंतक’ अब मनाए जाने वाला वसंत पंचमी का त्योहार है। ‘उदकक्ष्वेडिका’ पानी की पिचकारियों से रंग खेलने का उत्सव है। ‘अभ्यूषखादिका’ नए धान्य को आग में भूनकर खाने का उत्सव है। ‘कामसूत्र’ की यह होली मुक्त एवं स्वछंद हास-परिहास का उत्सव है।

नाच-गान, हंसी-ठिठोली और मौज-मस्ती की त्रिवेणी है होली। लोक अंचलों में हुए अनेक संस्कृत विलानों के साथ ही सारी भारतीय भाषाओं में रंग-बिरंगी होली खेलने का बड़ा मनोहारी व सजीव वर्णन हुआ है। होली केवल आने-जाने वाला कालखंड मात्र नहीं है बल्कि यह तो हमारे जीवन में पूरी तरह रच-बस गया उत्सव है। पर इस होली पर द्वापर में श्रीकृष्ण से बिछुड़ी एक गोपी मेवाड़ के महलों में एकांत में बैठकर अपने पिया को विरही अश्रुओं से याद कर रही है। इस गोपी का तंबूरा उसकी विरह-वेदना की ज्वाला को और भभका रहा है। यह गोपी है, मीरा, जो झटककर विधाता से ही पूछ रही है- किणु संग खेलूं होरी पिया तज गए हैं अकेली। तभी तो श्याम पिया मीरा की चुनरिया को रंगने आए। होली के रंग तो ऐसे अनोखे है जिन्हें सूरदास भी पहचानते हैं -सूरदास की काली कमरिया चढ़त न दूजो रंग।

 

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