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18 साल में सिर्फ 35 दानदाताओं की हड्डियां बनी दूसरों का सहारा

1999 में स्थापित अस्थि बैंक के आंकड़े बताते हैं कि तब से अब तक केवल 35 शव अस्थि दान के लिए आ पाए हैं। हालांकि एम्स प्रशासन के मुताबिक, अस्थि बैंक को सफलता से चलाने के लिए तेजी से काम हो रहा है।

Author नई दिल्ली, 9 सितंबर। | September 10, 2018 4:39 AM
एम्स में मरीज की मस्तिष्क मृत्यु के बाद अंगदान और मृत्यु के बाद हड्डियों को दान करने की पहल की गई थी।

अंगदान या देहदान के प्रति जागरूकता की कमी और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण जहां एक ओर जरूरतमंद मरीजों की जान बचाने के लिए आज भी अंग नहीं मिल पाते, वहीं एम्स में देश का एकमात्र केडवेरिक बोन बैंक (शव अस्थि बैंक) अपनी स्थापना के 18 साल बाद भी अभी तक पूरी तरह से वजूद में नहीं आ पाया है। एम्स में मरीज की मस्तिष्क मृत्यु के बाद अंगदान और मृत्यु के बाद हड्डियों को दान करने की पहल की गई थी। इसके तहत अंगों के लिए जहां ऑर्गन रिट्रीवल बैकिंग ऑर्गनाइजेशन (आर्बो) बनाया गया था, वहीं हड्डी के लिए अस्थि बैंक की स्थापना की गई थी। आर्बो में अंगदान को बढ़ावा देने की कोशिशें तो हुर्इं, लेकिन व्यापक तौर पर परवान नहीं चढ़ पाई। इसी तरह 1999 में स्थापित अस्थि बैंक के आंकड़े बताते हैं कि तब से अब तक केवल 35 शव अस्थि दान के लिए आ पाए हैं। हालांकि एम्स प्रशासन के मुताबिक, अस्थि बैंक को सफलता से चलाने के लिए तेजी से काम हो रहा है।

अस्थि बैंक की शुरुआत करने में अहम भूमिका निभाने वाले और मौजूदा एम्स ट्रॉमा सेंटर के मुखिया डॉ राजेश मल्होत्रा ने बताया कि लोगों में जानकारी की कमी तो है ही, साथ ही गलत धारणाएं भी हैं। शव की अंतिम क्रिया से जुड़ी धार्मिक भावनाएं अंग, शव और अस्थि मिलने में भी मुख्य बाधक हैं। 1999 में स्थापना के बाद 2001 तक हड्डियों के लिए कोई शव दान नहीं हुआ। जहां लोग नेत्रदान करने के बाबत यह सोचते हैं कि अगले जन्म में उनके परिजन नेत्र हीन पैदा हो सकते हैं, उसी तरह से हड्डियां दान करने में भी लोग गलत धारणा पाले हुए हैं। अस्थि दान केंद्र में दी गई हड्डियों का इस्तेमाल कई उद्देश्यों से किया जाता है। यह हड्डियां पांच साल तक संरक्षित की जा सकती हैं। किसी पार्थिव शरीर से मृत्यु के 12 घंटे के अंदर हड्डियां निकालकर सुरक्षित रखनी होती हैं। अगर शव को रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है तो यह समयावधि 38 घंटे तक बढ़ाई जा सकती है। उसके बाद उनमें एचआइवी, हेपेटाइटिस या अन्य किसी संक्रमण की जांच होती है। हड्डियों को -80 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखने के बाद सुरक्षित लंबे समय तक रखा जा सकता है।

भारत में हर साल हजारों कैंसर या दुर्घटना पीड़ित रोगियों में अस्थि प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है लेकिन केवल 35 फीसद मरीजों को ही यह लाभ मिल पाता है। मल्होत्रा के मुताबिक लोग जीते जी भी अस्थिदान कर सकते हंै। उन्होंने कहा कि अगर किसी बच्चे के रीढ़ की हड्डी में कोई दिक्कत है मसलन हड्डी बढ़ी है या टेढ़ी है तो सर्जरी में जो हड्डियां निकाली जाती हैं उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है और किसी और पीड़ित को उनका लाभ मिल सकता है। डॉ मल्होत्रा ने कहा कि अस्थिदान को लेकर और अधिक जागरुकता बढ़ाने की दरकार है। गौरतलब है कि दधीचि देहदान समिति सहित कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं। इन संस्थाओं ने सफदरजंग अस्पताल को भी मदद करने का आश्वासन दिया है। डॉ मल्होत्रा के मुताबिक इन अस्थियों से किसी रोगी में कैंसर, संक्रमण या चोट की वजह से समाप्त हो चुकी हड्डी के हिस्से को बदला जा सकता है। कैंसर के बड़े ऑपरेशन के बाद शरीर में बने छिद्रों को भरने में इनका इस्तेमाल किया जा सकता है।

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