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…ताकि नंगे पैर न घूमें देश के नौनिहाल, NCPCR ने सरकारी स्कूल में ड्रेस के जूते देने की मांग

सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत सभी लड़कियों, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और गरीबी रेखा से नीचे के बच्चों को दो जोड़ी वर्दी दी जाती है।

इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने मांग ्रकी है कि देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल ड्रेस के साथ-साथ जूते भी पहनने को मिलें। आयोग ने सोमवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और राज्य सरकारों को पत्र लिखकर इस बात की सिफारिश की है कि शिक्षा अधिकार कानून 2009 को लागू करने के लिए बने सर्व शिक्षा अभियान फ्रेमवर्क व दिशानिर्देश के तहत पहली से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को स्कूल की ओर से दी जाने वाली यूनिफॉर्म में जूते भी शामिल हों एनसीपीसीआर के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा कि दुनिया में ऐसा कहीं नहीं है जहां स्कूल यूनिफॉर्म में केवल कपड़े शामिल हों, जूता नहीं। बकौल कानूनगो अगर हम समावेशी समाज की बात करते हैं तो जूते पहनने से बच्चों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान आएगा, साथ ही स्कूल के प्रति उनका आकर्षण भी बढ़ेगा। कानूनगो ने कहा कि अभी शिक्षा अधिकार कानून 2009 को लागू करने के लिए सर्व शिक्षा अभियान फ्रेमवर्क व दिशानिर्देश के तहत प्राथमिक कक्षाओं (एक से आठ) तक के बच्चों को वर्दी के नाम पर केवल स्कूल ड्रेस दी जाती है, यह अधूरा है, कानून के तहत प्रदत सुविधाओं का पूरा लाभ देने के लिए इसमें जूता भी शामिल किया जाना चाहिए।

सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) के तहत सभी लड़कियों, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति और गरीबी रेखा से नीचे के बच्चों को दो जोड़ी वर्दी दी जाती है। एसएसए के मुताबिक, ‘स्कूल वर्दी का उद्देश्य बच्चों में स्कूल के प्रति अपनत्व और अधिकार की भावना पैदा करना है।’ हालांकि, एसएसए ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्दी देने का मकसद संगठन की भावना या एकरूपता तैयार करना नहीं है, इसलिए वर्दी की रूपरेखा स्थानीय स्तर पर तैयार होगी और खरीद विकेंद्रीकृत तरीके से एसएमसी (स्कूल मैनेजमेंट कमेटी) स्तर पर की जाएगी।
सर्व शिक्षा अभियान के तहत बच्चों को दी जाने वाली स्कूली सुविधाओं पर होने वाले खर्च को केंद्र और राज्य सरकारें 65:35 के अनुपात में साझा करती हैं। आयोग की तरफ से जूतों को शामिल किए जाने पर आने वाले अतिरिक्त खर्च का आकलन 500 से 700 करोड़ रुपए किया गया है। अखिल भारतीय अभिभावक संघ के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल का कहना है,‘2009 में बने शिक्षा का अधिकार कानून के लिए 2017 में इस तरह की पहल काफी देर से की गई है। जूते ही क्यों, बच्चों का यह मौलिक अधिकार है कि उन्हें सब कुछ मिले, सिली हुई वर्दी, जुराबें, गर्मी और सर्दी के लिए अलग कपड़े।’ अग्रवाल ने कहा कि दिल्ली के स्कूलों में प्रति बच्चा 500 रुपए दिया जाता रहा है वर्दी के लिए और अब हाई कोर्ट की फटकार के बाद 1100 रुपए किया गया है, लेकिन उतने में भी क्या होता है कम से कम 2100 रुपए मिलने चाहिए।

देश भर में सरकारी स्कूलों की संख्या 12 लाख से ऊपर है। आयोग के मुताबिक, इन स्कूलों में 10-11 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के तहत इन स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा तक सभी बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा दी जाती है। बच्चों को मुफ्त वर्दी, किताब और कॉपी दिए जाने का भी प्रावधान है।

 

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