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जंग का इस्तीफा निजी फैसला या राजनीतिक दबाव

दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए भाजपा ने आप से हाथ मिला लिया है।
Author नई दिल्ली | December 28, 2016 18:41 pm
दिल्‍ली के उपराज्‍यपाल नजीब जंग। (फाइल फोटो)

भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग के इस्तीफे को भले ही उनका निजी फैसला बताए, लेकिन हालात बताते हैं कि जंग के इस्तीफे के पीछे का कारण शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की घोषणा ही है। इसका सबूत केवल अजय माकन का बयान ही नहीं है, बल्कि राजनिवास के सूत्र भी बताते हैं कि 27 नवंबर को दिल्ली सरकार के डेढ़ साल के कामकाज की जांच करने वाली पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की तैयारी थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी। उपराज्यपाल ने 14 अक्तूबर के अपने सार्वजनिक बयान से उलट रिपोर्ट को सीबीआइ को जांच के लिए देने के बजाए केंद्रीय गृह मंत्रालय को सौंप दी। इतना ही नहीं, जांच पूरी होने के बाद 400 में से ज्यादातर फाइलों को संबंधित विभागों को लौटा दिया।

कहा तो यह भी जा रहा है कि इस्तीफा देने से पहले उपराज्यपाल ने दिल्ली के एक बड़े नेता से दर्द भी बांटा था। इसी की जानकारी मिलने पर दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष अजय माकन ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए भाजपा ने आप से हाथ मिला लिया है। उपराज्यपाल ने शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट 19 दिसंबर को सार्वजनिक करने की जानकारी दी थी। अगर ऐसा न होता तो पहले हफ्ते भर की छुट्टी की अर्जी देने के बाद वे अचानक इस्तीफा नहीं देते। दूसरी ओर नजीब जंग के इस्तीफे के पांच दिन बाद भी उनके स्थान पर किसी और को उपराज्यपाल बनाए जाने की घोषणा नहीं हुई है, जबकि परंपरा यह रही है कि मौजूदा उपराज्यपाल के हटने की जानकारी सार्वजनिक होने से पहले ही नए उपराज्यपाल की नियुक्ति की घोषणा हो जाती है।

उपराज्यपाल दिल्ली का वैधानिक शासक होता है और वह छुट्टी पर रहते हुए भी जरूरी काम करता रहता है, जैसा जंग ने गोवा जाने के लिए दी गई छुट्टी की अर्जी में भी लिखा था। नजीब जंग को कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने तेजेंद्र खन्ना के स्थान पर जुलाई 2013 में उपराज्यपाल बनाया था। आप सरकार के 49 दिन के पहले कार्यकाल और फरवरी 2015 से शुरू हुए दूसरे कार्यकाल का कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता होगा, जब उपराज्यपाल और केजरीवाल सरकार का टकराव न हुआ हो। इतना ही नहीं राजनिवास की बार-बार मनाही के बावजूद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में दो दर्जन विधेयक गैरकानूनी तरीके से पास करवा दिए, जो अभी भी लंबित हैं। दिल्ली सचिवालय से लेकर महिला आयोग, वक्फ बोर्ड और ज्यादातर विभागों में मनमाने तरीके से नियुक्ति से लेकर अनेक आयोग बनाने आदि के फैसलों पर भी विवाद चलता ही रहा है।

उपराज्यपाल को दिल्ली का प्रशासनिक प्रमुख बताने वाले हाई कोर्ट फैसले के बाद उपराज्यपाल ने आप सरकार की ओर से डेढ़ साल में लिए गए फैसलों की जांच पूर्व सीएजी वीके शुंगलू की अगुवाई वाली तीन सदस्यों की कमेटी को सौंप दी। कमेटी ने करीब 400 फाइलों की जांच कर 27 नवंबर को अपनी रिपोर्ट उपराज्यपाल को सौंप दी। केजरीवाल सरकार ने इस कमेटी को रोकने की हर स्तर पर कोशिश की और 14 अक्तूबर को मंत्रिमंडल की बैठक बुलाकर शुंगलू कमेटी को अवैध घोषित कर दिया। साथ ही उपराज्यपाल के पास इस तरह के अधिकार न होने के दावे किए गए। उपराज्यपाल ने उसी दिन बयान जारी करके अपने फैसले को संविधान सम्मत बताया और कहा कि सच्चाई आम लोगों के सामने आनी चाहिए। इसके बाद कमेटी के आग्रह पर उसका कार्यकाल छह हफ्ते के लिए बढ़ा दिया गया। कमेटी ने 27 नवंबर को अपनी रिपोर्ट उपराज्यपाल को सौंप दी। राजनिवास के सूत्रों के मुताबिक, करीब दो सौ फाइलों में भारी गड़बड़ी मिली। इस्तीफा देने से पहले उपराज्यपाल ने रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंप दी और ज्यादातर फाइलें संबंधित विभागों को लौटा दी गर्इं।

जंग के इस्तीफे के बाद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने आरोप लगाया कि उपराज्यपाल को रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से रोका गया है। उनका आरोप है कि भाजपा और आप दोनों में समझौता हुआ है क्योंकि अगर शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक हो जाती तो आप सरकार का भ्रष्टाचार उजागर हो जाता। इससे गोवा व पंजाब में आप को झटका लगता और भाजपा नहीं चाहती कि किसी भी कीमत पर गोवा व पंजाब में कांग्रेस की सरकार बने। कहा यह भी जा रहा है कि उन राज्यों में भी, जहां भाजपा का सीधे कांग्रेस से मुकाबला है, वहां भाजपा आप या आप जैसे दलों को इसलिए बढ़ावा दे रही है ताकि वे गैर भाजपा मतों का विभाजन करवा सकें, जिससे कम वोट लाकर भी भाजपा की जीत हो जाए। भाजपा नेतृत्व कांग्रेस के मुकाबले इन दलों से आसानी से मुकाबला कर सकता है।

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