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मानसून सत्र में सत्ता पक्ष इम्तिहान में कामयाब

कर्नाटक में गैर भाजपा सरकार बनने से उत्साह में आए विपक्षी दलों के लिए संसद का मानसून सत्र भारी झटका साबित हुआ। वे जिस अविश्वास प्रस्ताव के नाम पर सत्ता पक्ष को डराते रहते थे, उसी अविश्वास प्रस्ताव ने विपक्ष को झटका दिया।

कर्नाटक में गैर भाजपा सरकार बनने से उत्साह में आए विपक्षी दलों के लिए संसद का मानसून सत्र भारी झटका साबित हुआ। वे जिस अविश्वास प्रस्ताव के नाम पर सत्ता पक्ष को डराते रहते थे, उसी अविश्वास प्रस्ताव ने विपक्ष को झटका दिया। इसके चलते पूरे सत्र में विपक्ष लगभग खामोश रहा और लोक सभा में तय समय से ज्यादा समय तक कामकाज हुआ। सत्ता पक्ष पूरे समय आक्रामक बना रहा। अविश्वास प्रस्ताव भी कांग्रेस के बजाए पहले नोटिस के आधार पर तदेपा का मंजूर हुआ। प्रादेशिक दलों का एजंडा पहले से ही तय था। जाहिर है जिस तरह से विपक्ष सत्ता पक्ष को अविश्वास प्रस्ताव के नाते घेर पाता, चर्चा ठीक उलट हुई। इतना ही नहीं, पूरा सत्र सत्ता पक्ष ने जैसा चाहा वैसा चला लिया। अविश्वास प्रस्ताव पर 20 जुलाई को 11 घंटे 46 मिनट की चर्चा चली और मतदान के बाद यह प्रस्ताव 126 के मुकाबले 325 वोटों से गिर गया। सत्ता और विपक्ष में शक्ति प्रदर्शन का दूसरा मौका राज्यसभा उपाध्यक्ष के चुनाव में नौ अगस्त को आया। उस चुनाव में भी विपक्षी एकता की पोल खुली। हरिबंश ने कांग्रेस(यूपीए) उम्मीदवार वीके हरि प्रसाद को 105 के मुकाबले 125 मतों से पराजित किया। विपक्षी दल असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (एनआरसी) से बाहर कर दिए गए तकरीबन 40 लाख लोगों के मुद्दे को उठाते रहे और उपसभापति चुनाव हारने के बाद रफाल डील में गड़बड़ी की मुद्दा तेज किया।

राज्य सभा में लोक सभा के मुकाबले कम काम हुआ लेकिन वहीं भी तीन तलाक बिल को सत्र के आखरी दिन लाए जाने के अलावा सत्ता पक्ष ने जो चाहा वह किया। इसी के चलते लोक सभा अध्यक्ष जो बजट सत्र में कामकाज न होने पर सांसदों के खिलाफ बोल रही थी, मानसून सत्र के समापन पर सांसदों के पक्ष में बोलने लगीं। लोक सभा में मानसून सत्र में कुल 22 सरकारी विधेयक पेश किए गए। 21 विधेयक पारित किए गए। इनमें राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्ज देने संबंधी संविधान (123वां संशोधन) विधेयक-2018 और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मद्देनजर लाया गया अनुसूचित जातियां व अनुसूचित जनजातियां (अत्याचार निवारण) संशोधन विधेयक-2018 प्रमुख हैं। यो दोनों विधेयक राजद यानि भाजपा के चुनावी प्रचार के मुख्य मुद्दा बनने वाले हैं।

लोक सभा चुनाव समय से पहले भले ही न हो लेकिन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ आदि के विधानसभा चुनाव तो अगले कुछ महीनों में होने वाले हैं। लोक सभा चुनाव से पहले एक पूरा सत्र तो शीतकालीन सत्र ही होने वाला है अगर मई में भी लोक सभा चुनाव हुआ तो भी बजट सत्र केवल वैधानिक औपचारिकता को पूरा करने वाला ही होगा। साल 2014 का चुनाव तो भाजपा के लिए मील का पत्थर साबित हुआ जब उसे खुद के बूते लोक सभा में बहुमत मिली लेकिन माना जा रहा है कि उत्तर भारत के राज्यों में उसे अधिकतम सीटें मिल गई हैं जिसमें 2019 में कमी होगी। उसकी भरपाई दक्षिण भारत के राज्यों या पूर्वोत्तर के राज्यों की लोक सभा सीटों से होना कठिन लग रही है। गठबंधन की कमी के चलते ही 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी का दोबारा सरकार नहीं बन पाई थी। इस बार गैर भाजपा दलों में तमाम पेंच फंसे होने और उसके नमूना लोक सभा के अविश्वास प्रस्ताव में और राज्य सभा के उप सभापति के चुनाव में दिख जाने के बाद विपक्ष के रणनीतिकारों के हाथ-पांव फूल रहे हैं।

असल में कांग्रेस की हैसियत भाजपा के बराबर बन नहीं पा रही है और क्षेत्रीय दलों का अपना गणित और लक्ष्य है, उसमें कई राज्यों के दलों को भाजपा से बड़ा विरोधी कांग्रेस ही लग रही है। कांग्रेस के अलावा भाजपा के सबसे मुखर विरोधियों में तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) प्रमुख है। उसके जैसा न तो बीजेडी, न टीआरएस या अन्नाद्रमुक जैसे दल भाजपा के विरोधी नहीं हो पा रहे हैं। राजग से अलग होने वाले तेदेपा की समस्या भाजपा से ज्यादा जगमोहन रेड्डी की वाईआरएस कांग्रेस है जिसका किस दल से गठबंधन हो जाए, कहा नहीं जा सकता है। अभी सबसे ज्यादा सांसद वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा में भाजपा के खिलाफ गठबंधन होता दिख रहा है लेकिन राज्य सभा उपसभापति के चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) के जैसा ही सपा ने भी कांग्रेस पर मनमाने फैसला करने का आरोप लगाया। आप ने तो कांग्रेस से अलग चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। लोक सभा चुनाव तक कौन दल किस गठबंधन में रहेगा, अभी से कहा नहीं जा सकता है।