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मिड डे मील पर रोजाना मात्र 6 से 9 रुपए प्रति छात्र खर्च करती है सरकार

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत प्राथमिक कक्षा स्तर पर प्रति छात्र प्रतिदिन चावल आधारित भोजन के लिए 6 रुपया 64 पैसा प्रति प्लेट लागत आती है।

Author नई दिल्ली | December 12, 2017 6:33 PM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मध्याह्न भोजन योजना के माध्यम से 10 करोड़ छात्रों को जोड़ने और कक्षा में छात्रों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के तमाम दावों के बीच ऐसे सवाल उठ रहे हैं कि क्या प्रति छात्र प्रतिदिन 6 से 9 रुपए के हिसाब से छात्रों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है? मानव संसाधन विकास मंत्रालय के एक अधिकारी ने ‘भाषा’ को बताया कि मध्याह्न भोजन योजना के तहत प्राथमिक कक्षा स्तर पर प्रति छात्र प्रतिदिन चावल आधारित भोजन के लिए 6 रुपया 64 पैसा और माध्यमिक कक्षा स्तर पर प्रति प्लेट 9 रुपया 60 पैसा लागत आती है। इसी प्रकार प्राथमिक कक्षा स्तर पर प्रति छात्र प्रतिदिन गेहूं आधारित भोजन के लिए 5 रुपया 70 पैसा और माध्यमिक कक्षा स्तर पर 8 रुपया 20 पैसा लागत आती है।

उन्होंने कहा कि यह स्कूलों में भोजन आधारित योजना है जिसके तहत करीब 10 करोड़ बच्चों को रोज खाना मिलता है। हमारा भोजन की गुणवत्ता पर जोर रहता है। इस उद्देश्य के लिए रसोइयों के लिए अभ्यास शिविरों का आयोजन करने के साथ कई अन्य पहल की गई है। कैसे खाना बनाना है, कैसे परोसना है, अच्छा खाना कैसे बने…इन बातों पर राज्य सरकार के सहयोग से हम नजर रख रहे हैं। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में बच्चों को परोसे जा रहे भोजन की गुणवत्ता सहित उसे परोसने के तरीकों की भी समीक्षा करने की पहल की गई है।

बहरहाल, कई शिक्षाविदों ने इस बात पर सवाल उठाया है कि जब खाद्यान्न एवं अन्य खाद्य पदार्थों आदि की कीमतों में वृद्धि देखी जा रही है, तो ऐसे में छह से नौ रुपए प्रति प्लेट की दर से खर्च करके क्या हमारे नौनिहालों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा सकता है? एनसीईआरटी के पूर्व अध्यक्ष जे एस राजपूत ने ‘भाषा’ से कहा कि आजादी के बाद से ही हमारे देश में कुपोषण बड़ी समस्या रही है। जब हमारे आधे बच्चों के कुपोषण से ग्रस्त होने की रिपोर्ट आ रही हो, तब हमें जागृत होना चाहिए।

ऐसी ही परिस्थिति में सरकार ने मध्याह्न भोजना योजना शुरू की थी। इसके अनेक फायदे भी हुए। बच्चों का स्कूलों से जुड़ने का सिलसिला चला। लेकिन समाज और सरकार को मिलकर इसे सतत रूप से आगे बढ़ाने की जरूरत है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि आवंटन इतना हो कि इस योजना को भ्रष्टाचार से मुक्त बनाकर सुचारू रूप से चलाया जा सके। उन्होंने कहा कि ऐसे में जब खाद्यान्न एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं, जब तीन-चार साल तक मध्याह्नन भोजना के लिए एक ही तरह की दर को बनाए रखना ठीक नहीं है। इस योजना के महत्व को देखते हुए तीन महीने पर खाद्यान्न की बाजार दरों के हिसाब से मध्याह्न भोजना की दरों की समीक्षा की जानी चाहिए। क्योंकि बच्चों में निवेश देश के लिए सबसे बड़ा निवेश है।

शिक्षाविद एन श्रीनिवासन ने कहा कि मध्याह्न भोजना योजना के तहत प्रति छात्र प्रति प्लेट 6 से 9 रुपए का आवंटन है। ऐसे में जब आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं तब मध्याह्न भोजन की दरों में समीक्षा की जानी चाहिए क्योंकि इतने कम पैसे में बच्चों को कैसे पौष्टिक भोजना मिलेगा? उल्लेखनीय है कि नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) के निष्पादन की 2009-10 से 2013-14 के बीच की लेखा परीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्याह्न भोजना योजना स्कूलों में बच्चों को आकर्षित करने और इनके नामांकन में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। लेकिन हाल के कुछ सालों में बच्चों की नामांकन दर में लगातार कमी से लगता है कि यह योजना भी बच्चों को स्कूलों की ओर आर्किषत करने में पर्याप्त साबित नहीं हो पा रही है। इसमें कहा गया था कि स्कूलों में बच्चों के नामांकनों में गिरावट हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, लक्षद्वीप और पुडुचेरी में देखी गई।

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