ताज़ा खबर
 

सत्यजीत रे की कहानी में पिरोया गया प्लास्टिक से मुक्ति का संदेश

शारदीय नवरात्र में राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में तैयार किए जाने वाले मां दुर्गा के पूजा पंडाल न केवल हमारी संस्कृति व परंपरा को दर्शाते हैं, बल्कि मौजूदा सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य की झलक भी दिखाते हैं।

Author नई दिल्ली, 13 अक्तूबर। | October 14, 2018 3:55 AM
देश की राजधानी की इस गंभीर समस्या को पश्चिम बंगाल की समृद्ध कला संस्कृति के जरिए उजागर करने की कोशिश की गई है।

शारदीय नवरात्र में राजधानी के अलग-अलग हिस्सों में तैयार किए जाने वाले मां दुर्गा के पूजा पंडाल न केवल हमारी संस्कृति व परंपरा को दर्शाते हैं, बल्कि मौजूदा सामाजिक व राजनीतिक परिदृश्य की झलक भी दिखाते हैं। नवरात्र के छठे दिन से शुरू होने वाली मां दुर्गा की पूजा के लिए बनने वाले पंडाल कई तरह की सामाजिक समस्याओं को भी उजागर करते हैं और लोगों को समरसता का संदेश भी देते हैं। ऐसा ही एक पूजा पंडाल पूर्वी दिल्ली के मयूर विहार फेज-1 में तैयार किया जा रहा है। मिलानी कल्चरल एंड वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से तैयार किए जा रहे इस पूजा पंडाल की थीम है दिल्ली को प्लास्टिक मुक्त बनाना। देश की राजधानी की इस गंभीर समस्या को पश्चिम बंगाल की समृद्ध कला संस्कृति के जरिए उजागर करने की कोशिश की गई है।

मयूर विहार फेज-1 में तैयार किए जा रहे इस पूजा पंडाल की सबसे बड़ी खासियत है, इसका मंडप। कपड़े के कैनवास पर तैयार किए जा रहे इस मंडप का विषय है सत्यजीत रे की राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित बांग्ला बाल फिल्म ‘गुपी गाइन बाघा बाइन’ (1968) की कहानी। फिल्म का हिंदी में भी रूपांतरण किया गया है जिसका नाम है ‘गोपी गवैया बाघा बवैया’। फिल्म की पूरी कहानी को कैनवास पर पेंटिंग के जरिए दिखाया गया है और कहानी में थोड़ा सा बदलाव कर लोगों, खासकर बच्चों को दिल्ली व यमुना नदी को पॉलीथीन से मुक्ति दिलाने का संदेश दिया जा रहा है। इस फिल्म की कहानी कुछ ऐसी है कि गुपी और बाघा को बुरा संगीतकार होने की वजह से एक राज्य से भगा दिया जाता है।

हालांकि, वे दोनों अपने कौशल से भूतों के राजा को खुश करने में सफल होते हैं। भूतों का राजा उन्हें तीन वर मांगने को कहता है। पूजा पंडाल में दिखाई गई कहानी में यह बदलाव किया गया है कि गुपी और बाघा भूतों के राजा की जगह देवी दुर्गा से वर मांगते हैं कि वे दिल्ली और यमुना को प्लास्टिक व पॉलीथीन से मुक्ति दे दें। मिलानी कल्चरल एंड वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मृणाल बिस्वास ने बताया कि यह कहानी बच्चों को काफी प्रभावित करेगी। उन्होंने बताया कि पंडाल तैयार करने में इस बार प्लास्टिक और थर्माकॉल का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं किया जा रहा है। मां दुर्गा की मूर्ति को सजाने में भी रासायनिक रंगों का इस्तेमाल नहीं किया गया है ताकि विसर्जन के बाद यमुना में रंगों का जहर न घुले।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App