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इंसाफ के लिए भटक रहा परिवार, दर्ज नहीं हो रही एफआइआर

मकबूल के परिजनों को जब युवक की लाश के बारे में पता चला तो वे आए और अपने बेटे को पहचान लिया।

Author नई दिल्ली | September 26, 2016 3:08 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

उत्तराखंड के रहने वाले एक युवक की लाश उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में मिली और इस मामले में एफआइआर दर्ज कराने के लिए लड़ाई हो रही है दिल्ली में। इसे मात्र संयोग कहा जाए या फिर पुलिसिया विभाग की नाकामी, कि मृतक का परिवार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय गृह मंत्रालय, भ्रष्टाचार निरोधक शाखा, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड प्रशासन और दिल्ली पुलिस आयुक्त के दफ्तर के चक्कर काट-काट कर थक गया, लेकिन मौत की गुत्थी नहीं सुलझ पाई गई। दिल्ली की रेलवे पुलिस में इस बाबत एफआइआर भी दर्ज कराई गई, लेकिन इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। मानवाधिकार कार्यकर्ता खतीजा शेख अहमद कहती हैं कि हम इस मामले की तह तक जाने की कोशिश में है। एक सजग नागरिक और मानवाधिकार कार्यकर्ता होने के नाते हमारा यही मकसद है कि मामले का खुलासा हो और आरोपी कानून की गिरफ्त में आ जाए।

दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन थाने में इस साल 16 अप्रैल को दर्ज एफआइआर में उत्तराखंड के टिहरी-गढ़वाल के चंबा थाने के सुनार गांव में रहने वाले मकबूल के पिता अमीर अली ने अपनी आपबीती सुनाई है। एफआइआर में कहा गया है कि मकबूल पुणे के एक होटल में बेकरी का काम करता था। इसी साल 14 अप्रैल को वह पुणे से झेलम एक्सप्रेस ट्रेन में सवार होकर दिल्ली के लिए निकला था। दूसरे दिन यानी 15 अप्रैल को रात करीब आठ बजे मकबूल की पत्नी ने फोन पर उसका हालचाल पूछा। तब मकबूल ने कहा कि वह दिल्ली पहुंचने वाला है। इसके बाद पता नहीं क्या हुआ। वह दिल्ली नहीं पहुंचा। मकबूल के दिल्ली नहीं पहुंचने पर उसके भाई आजम ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। गुमशुदगी में शक जताया गया कि मकबूल का किसी ने अपहरण तो नहीं कर लिया।

काफी खोजबीन के बाद जब 36 साल के मकबूल का पता नहीं चला तो हारकर परिजनों ने रेलवे स्टेशन थाने में एफआइआर दर्ज कराई। तीन बच्चियों के पिता मकबूल का परिवार इस असमंजस में था कि आखिर वह ट्रेन से गया कहां। यह कशमकश चल ही रही थी कि मेरठ के परतापुर थाना इलाके में 16 अप्रैल को एक युवक की लाश मिली। मृत युवक के जूते-मोजे, बैग, पर्स और मोबाइल गायब होने से मामला संदेहास्पद बन गया। परतापुर पुलिस ने बिना जांच-पड़ताल इस मामले को दुर्घटना करार दिया और युवक की लाश की शिनाख्त के लिए विज्ञापन जारी कर दिए। मकबूल के परिजनों को जब युवक की लाश के बारे में पता चला तो वे आए और अपने बेटे को पहचान लिया। परतापुर पुलिस ने शिनाख्त परची में लिखा कि उसे वहां के सालासर वैष्णो ढाबा के पास के श्ांकर महतो ने इस दुर्घटना के बारे में सूचना दी।

यह बात मकबूल के परिजनों के गले नहीं उतर रही कि जब वह ट्रेन से आ रहा था तो उसकी लाश सड़क किनारे कैसे मिली। जिस वाहन के टक्कर से उनके बेटे की मौत हुई उसके बारे में पुलिस क्यों नहीं पता लगा रही। इसी बीच दिल्ली के निजामुद्दीन थाने की पुलिस को मकबूल का गायब फोन एक युवक के पास से मिला और फिर यहीं से मामले की पेचीदगी शुरू हो गई। मामला लूटपाट के बाद की हत्या का है, यह मानकर मकबूल के परिजन हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की जिद करने लगे। पर सवाल यह है कि हत्या का मामला दर्ज कहां हो?

मानवाधिकार कार्यकर्ता खतीजा शेख अहमद इस मामले की पैरोकार हैं। इस मामले में उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखा और उनसे अनुरोध किया। सिंह के विशेष कार्य अधिकारी विनोद कुमार सिंह ने 19 जुलाई को दिल्ली के पुलिस आयुक्त आलोक कुमार वर्मा को इस बाबत निर्देश जारी कर मामले की जांच कराने और पीड़ित परिजनों को न्याय दिलाने की बात कही। इतना ही नहीं खतीजा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और दिल्ली के पुलिस आयुक्त से भी कई बार दरख्वास्त कर कहा कि आखिर हजरत निजामुद्दीन रेलवे थाने की पुलिस इस मामले में हत्या का मामला दर्ज कर उसकी जांच क्यों नहीं करा रही?

खतीजा कहती हैं कि जब थाने में मकबूल की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की गई और बाद में संदिग्ध हालत में उसकी लाश मिली तो पुलिस हत्या का मामला दर्ज करने में इतनी देर क्यों कर रही है। इस बाबत खतीजा व मकबूल के पिता अमीर अली ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पुलिस के आला अधिकारियों से भी गुहार लगाई है, लेकिन इतनी मशक्कत और दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी पीड़ित परिजनों को कहीं से इंसाफ नहीं मिला है।

 

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