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अस्पतालों में दवाओं की कमी को लेकर निशाने पर केजरीवाल सरकार, चिकित्सा अधिकारियों का तबादला कर निकाली खीज

मरीजों को न तो मुफ्त दवाएं मिल रही हैं और न अन्य सुविधाएं। मशीनें खराब होने के कारण मरीजों की जांच भी समय पर नहीं हो पा रही है। लोगों के स्वास्थ्य और चिकित्सा से जुड़ी दिल्ली सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाएं नाकामी के कगार पर पहुंच गई हैं।

Delhi Jal Board, Delhi Jal Board Approves, 20% Increase, 20% Increase in Water charge, Water and Sewer Charges, AAP Government, AAP Government Decision, Water and Sewer in Delhi, State newsदिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

दिल्ली सरकार के अस्पतालों में दवाओं की कमी को लेकर लोगों की नाराजगी झेल रही केजरीवाल सरकार ने अपनी खीज कई अस्पतालों के छह चिकित्सा अधिकारियों का तबादला करके निकाल ली है। छह अधिकारियों के तबादले का आदेश शुक्रवार को जारी हुआ और शनिवार को ही उन्हें नई जगह पर रिपोर्ट करने का निर्देश दे दिया गया। जिन छह चिकित्सा अधिकारियों का तबादला किया गया है, उनमें से ज्यादातर अस्पतालों के ओपीडी से जुड़े हुए हैं, जहां से मरीजों को दवाएं मुहैया कराई जाती हैं। वैसे असलियत यह है कि राजधानी के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ता है। मरीजों को न तो मुफ्त दवाएं मिल रही हैं और न अन्य सुविधाएं। मशीनें खराब होने के कारण मरीजों की जांच भी समय पर नहीं हो पा रही है। लोगों के स्वास्थ्य और चिकित्सा से जुड़ी दिल्ली सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाएं नाकामी के कगार पर पहुंच गई हैं। इसका हल निकालने के बजाय सरकार सारा गुस्सा डॉक्टरों और अधिकारियों का तबादला करके निकाल रही है।

केजरीवाल सरकार ने जिन छह चिकित्सा अधिकारियों का तबादला किया है, उनमें डॉ बालाशंकर, डॉ रश्मि अरोड़ा, डॉ अश्विनी गोपाल, डॉ कविता गोयल, डॉ अनुराधा चौहान और डॉ विकास रामफल शामिल हैं। दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य व परिवार कल्याण निदेशालय ने शुक्रवार को एक आदेश जारी किया, जिसके तहत इन सभी चिकित्सा अधिकारियों को किसी अन्य आदेश का इंतजार करने के बजाय शनिवार को ही नई पोस्टिंग पर रिपोर्ट करना था। इन अधिकारियों का जिस तरह से आनन-फानन में तबादला किया गया है, उसका कारण हाल ही में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से लोकनायक अस्पताल में देर रात किया गया औचक निरीक्षण माना जा रहा है। केजरीवाल इस तरह के दौरे पहले भी अन्य कई अस्पतालों में कर चुके हैं।

हालांकि, वास्तविकता यह है कि केजरीवाल सरकार की कथित लोकहितकारी स्वास्थ्य संबंधी घोषणाएं नकारा साबित हो रही हैं। दिल्लीवासियों को लुभाने के लिए सरकार ने एक साल पहले सभी सरकारी अस्पतालों में मुफ्त दवाएं दिए जाने की घोषणा की थी। उस घोषणा से पहले जिस तरह की व्यापक तैयारियां की जानी चाहिए थीं, वह नहीं की गर्इं। दिल्ली सरकार के तकरीबन सभी अस्पतालों में दवाएं वितरित करने वाले फार्मासिस्टों और काउंटरों का अभाव है। इस कमी को पूरा करने के बजाय केजरीवाल सरकार ने डॉक्टरों को एक फरमान जारी कर दिया कि उन्हें मरीजों को सरकार की ओर से तय की गई दवाओं से अलग दवा रेफर नहीं करनी है। यानी डॉक्टर मरीजों को महंगी दवाएं नहीं लिख सकते। दिल्ली के आसपास के शहरों के लोगों को जब पता चला कि दिल्ली में मरीजों को मुफ्त दवाएं मिल रहीं हैं, तो यहां के सरकारी अस्पतालों में ओपीडी में इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई। इसके कारण सभी अस्पतालों के दवा काउंटरों पर मुफ्त दवा लेने के लिए मरीजों की लंबी कतारें लगनी शुरू हो गर्इं। वैसे असलियत यह है कि दिल्ली सरकार के अस्पतालों में पहले भी मरीजों को मुफ्त दवाएं मिलती रही हैं, लेकिन जिस तरह से केजरीवाल सरकार ने इसे प्रचारित किया, उसका सभी अस्पतालों में उलटा असर पड़ा। इसके बाद सरकार ने एक फरमान और जारी किया कि कोई भी अस्पताल खुद दवाएं नहीं खरीदेगा, सभी दवाएं एक केंद्रीय एजंसी खरीदेगी और उसे सभी अस्पतालों की मांग के अनुसार पहुंचाया जाएगा। दिल्ली सरकार की यह योजना भी नाकाम साबित हुई।

अस्पतालों में जब समय पर दवाएं नहीं पहुंचीं तो केजरीवाल सरकार ने इसका सारा दोष अफसरों पर मढ़ दिया और मुख्य सचिव को उस बाबत पत्र लिखा। बाद में केजरीवाल समझ गए कि दवाएं किसी केंद्रीय एजंसी से खरीदने का उनका फैसला गलत था और उन्होंने नया आदेश जारी करके सभी अस्पतालों को पहले की तरह ही दवाएं खरीदने का नया आदेश जारी कर दिया। करीब एक महीने पहले मुख्यमंत्री केजरीवाल ने लोगों को खुश करने के लिए अरुणा आसफ अली अस्पताल का औचक निरीक्षण किया। उस दौरे की बाकायदा वीडियोग्राफी करवाई गई। केजरीवाल एक मरीज से मिले और उसकी दवाओं की परची लेकर खुद काउंटर पर दवा लेने गए। वहां उन्हें पता चला कि वह दवा तो अस्पताल में है ही नहीं। उन्होंने दवा लिखने वाले डॉक्टरों को वहीं बुला कर लताड़ लगाई। केजरीवाल के उस वीडियो को सोशल मीडिया पर खूब वायरल किया गया और यह प्रचारित किया गया कि केजरीवाल आम लोगों का कितना खयाल रखते हैं, जबकि असलियत यह है कि दिल्ली सरकार के सभी अस्पतालों में न तो जरूरत के मुताबिक दवाएं हैं, न दवा काउंटर हैं और न ही दवाएं बांटने वाले फार्मासिस्ट हैं।

 

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