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दिल्ली-एनसीआर की सड़कें भी अब ईपीसीए की निगरानी में

इसके तहत दिल्ली, नोएडा और गुड़गांव में तीन-तीन सड़कों की पहचान की जानी है ताकि इन सड़कों पर जमा धूल की वजह से पर्यावरण को होने वाली परेशानी से निपटने की कार्ययोजना तैयार की जा सके।

Author नई दिल्ली | October 23, 2017 03:02 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

दिल्ली-एनसीआर की कई प्रमुख सड़कें अब उच्चतम न्यायालय से अधिकार प्राप्त पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) की निगरानी में आ गई हैं। ये सड़कें खराब हालत में हैं। प्राधिकरण ने क्षेत्र में अधिकारियों से ऐसी सड़कों की सूची तैयार करने को कहा है। इसके तहत दिल्ली, नोएडा और गुड़गांव में तीन-तीन सड़कों की पहचान की जानी है ताकि इन सड़कों पर जमा धूल की वजह से पर्यावरण को होने वाली परेशानी से निपटने की कार्ययोजना तैयार की जा सके।  आपको बता दें कि आइआइटी कानपुर ने दिल्ली के वायु प्रदूषण पर एक अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट में यह कहा था कि स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक माने जाने वाले सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर (पीएम 2.5) की सबसे बड़ी वजह दिल्ली की सड़कों की धूल है। ईपीसीए के अध्यक्ष भूरे लाल ने कहा कि उच्च प्रभाव वाली सड़कों की पहचान करने के बाद प्रदूषण स्तर को कम करने के लिए वृहद कार्य योजना के तहत तत्काल धूल नियंत्रण के उपाय किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि दीपावली के बाद धूल में इजाफा हुआ है।

आइआइटी की रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम 10 का कुल 50 फीसद और पीएम 2.5 का करीब 38 फीसदी हिस्सा सड़क की इसी धूल का होता है। ईपीसीए के अध्यक्ष ने कहा कि समस्या जितनी बड़ी है उसके मुकाबले पहल का पैमाना छोटा लगता है। कई और सड़कें ईपीसीए की निगरानी में आएंगी और उन्हें बाद में कार्य योजना के दायरे में लाया जाएगा। उन्होंने बताया कि दिल्ली पर्यावरण विभाग और हरियाणा व उत्तर प्रदेश के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को पीडब्ल्यूडी और एनएचएआइ समेत संबंधित एजंसियों के साथ समन्वय करके सड़कों की पहचान करने के लिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। प्रदूषण नियंत्रण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों का लगातार यह कहना है कि दिल्ली-एनसीआर में बड़े पैमाने पर जारी निर्माण कार्यों के कारण भारी पैमाने पर धूल पैदा होती है। यह धूल लाखों वाहनों की लगातार आवाजाही से लगातार उड़ती रहती है। खासकर सड़कों किनारे जमा धूल के मामले में खास तौर पर यह देखा गया है कि वाहनों के कारण वह सतह पर बैठ ही नहीं पाती। इन्हीं सूक्ष्म धूलकणों के साथ वाहनों से निकलने वाले धुएं का प्रदूषण मिल जाता है और फेंफड़ों में जमा होकर स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी सांस लेना मुश्किल करते हैं जबकि सांस की बीमारियों से पीड़ित लोगों की परेशानी लगातार बढ़ाते हैं। यह भी कहा जाता है कि शहरों में सांस की बीमारियों में वृद्धि के लिए यह धूल भी बहुत हद तक जिम्मेदार है।

 

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