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मनोज तिवारी शीला दीक्षित की तरह मजबूत साबित होते हैं या नहीं

भाजपा नेता उसी तरह से परेशान होने लगे हैं जैसे 1998 में शीला दीक्षित के दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष और बाद में मुख्यमंत्री बनने पर कांग्रेस के नेता परेशान हुए थे।

Author July 31, 2017 12:01 AM
दिल्ली भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी।

विरोधियों की जमात
जब तक भोजपुरी के लोकप्रिय गायक मनोज तिवारी केवल दिल्ली में भाजपा के लिए वोट जुटाते दिखते थे, तब तक तो दिल्ली भाजपा के जमे-जमाए नेताओं को उनसे कोई परेशानी नहीं थी। पार्टी ने उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाया और विपरीत परिस्थितियों में भी पार्टी लगातार तीसरी बार नगर निगम चुनाव जीत गई। हालांकि इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी भूमिका थी, लेकिन सच्चाई यह भी है कि मनोज तिवारी के धुआंधार प्रचार का लाभ भी भाजपा को मिला। फिर तो उनके समर्थक उन्हें दिल्ली का भावी मुख्यमंत्री बताने लगे और दिल्ली में उनकी अच्छी-खासी जमीन तैयार हो गई। लेकिन अब भाजपा नेता उसी तरह से परेशान होने लगे हैं जैसे 1998 में शीला दीक्षित के दिल्ली कांग्रेस का अध्यक्ष और बाद में मुख्यमंत्री बनने पर कांग्रेस के नेता परेशान हुए थे। कांग्रेस नेताओं को यह अंदाजा ही नहीं था कि शीला दीक्षित दिल्ली में कितनी मजबूत हो गई हैं। ऐसा ही कुछ मामला मनोज तिवारी को लेकर भाजपा में दोहराया जा रहा है और देखना यह है कि मनोज तिवारी शीला दीक्षित की तरह मजबूत साबित होते हैं या नहीं।

किरकिरी की चिंता
कहावत है कि खूंटे के दम पर ही बछड़ा जोर मारता है और जब खूंटा ही कमजोर हो तो बछड़ा भी गायब होने लगता है। दिल्ली में प्रचंड बहुमत से चुनाव जीतने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के नेताओं की बाढ़ सी आ गई थी। हर रोज अलग-अलग नेता और उनके तरह-तरह के बयान सामने आते रहते थे। लेकिन जब सत्ता में रहते हुए भी आप के बुरे दिन आ गए तो ज्यादातर छुटभैये नेता गायब हो गए। अब तो कुछ पुराने नामों के अलावा कोई नया नाम गलती से भी सुनने में में नहीं आता। जो नेता बोलते हुए भी दिखते हैं वे भी संभल-संभल कर बोलते हैं, उन्हें लगता है कि कहीं कुछ उल्टा न हो जाए और पार्टी के साथ-साथ उनकी खुद की किरकिरी हो जाए।

पढ़ाई संग दाखिला भी
पढ़ाई का सत्र शुरू और दाखिला भी जारी, जी हां कुछ ऐसा ही नजारा है दिल्ली विश्वविद्यालय का। प्रशासन का दावा था कि पांच कटआॅफ आएंगी, लेकिन अब तक सात आ चुकी हैं। अगली कटआॅफ से भी गुरेज नहीं! किसी ने ठीक ही कहा है, पूरे महीने चलेगा दाखिला सत्र। एक अध्यापक ने चुटकी लेते हुए कहा, पहला सेमेस्टर तो ऐसे ही चलता आ रहा है। कुछ परिस्थितियों में आधा पाठ्यक्रम बीतने के बाद भी छात्र पहुंचते हैं। पीछे बैठे एक अन्य प्राध्यापक ने पुष्टि के लहजे में कहा, एकदम सही, कुलपति के विशेषाधिकार भी तो होते हैं! लिहाजा, इस चर्चा को छोड़िए, पढ़ाई का सत्र जारी रखिए। दाखिला चलता रहेगा। कभी अभियान से तो कभी विशेष अभियान से! यह अलग बात है कि दाखिला लेने वाले आखिरी छात्र का पाठ्यक्रम काफी पीछे छूट जाएगा, पर विश्वविद्यालय का इससे क्या लेना-देना।

अपनों पर मेहरबानी
अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को दे, यह कहावत दिल्ली की परिवहन व्यवस्था में लगे महकमों और दिल्ली की जीवनरेखा बन चुके तंत्र पर पूरी तरह से सटीक बैठती है। इस प्रणाली में इसी बात का सबसे ज्यादा रोष है कि अंधाधुंध ढंग से यहां रेवड़ी बांटने का काम हो रहा है। जिस तरह से तंत्र उम्रदराज होता जा रहा है उसी तरह पीढ़ियों को सही जगह फिट करने का काम भी हो रहा है। अधिकरियों के बड़े होते बच्चों के लिए जगह व जमीन भी तैयार की जा रही है। इसमें भी ठेकेदारी प्रथा ने सोने पर सुहागा क ा काम किया है। पहले इसके सहारे वे उन्हें सिस्टम में घुसाते हैं और बाद में मौका देख कर उनको सही जगह पर लॉन्च कर दिया जाता है। इस दयादृष्टि की वजह से ही कई अधिकारियों के रिश्तेदार महकमे में शामिल हो चुके हैं।

 भीड़ की होड़
दिल्ली पुलिस वाहवाही बटोरने में कोई कसर नहीं छोड़ती। यह वाहवाही खुद पुलिस अधिकारी अपने मातहतों के बीच बड़े उत्साह से बटोरते हैं। मगर कितना अच्छा होता अगर वहां ‘मित्र’ ज्यादा होते और पुलिस के ‘जवान’ कम होते। बीते दिनों ‘पुलिस मित्र’ के एक अलंकरण समारोह में आयुक्त की मौजूदगी में कई खासमखास पुलिस अधिकारी और जवान जमा हुए। हालांकि यह पहला मौका नहीं था। इससे पहले भी पुलिस के कार्यक्रम में भीड़ ज्यादा होती रही है। बेदिल को इसी तरह के एक कार्यक्रम में शिरकत करने गए सज्जन ने बताया कि पुलिस आयुक्त की मौजूदगी में सारे आला अधिकारी वाहवाही बटोरते हैं पर किसी को यह भान नहीं होता कि कार्यक्रम ‘पुलिस मित्र’ का है और भीड़ जवानों की ज्यादा क्यों हो जाती है? मतलब साफ है कि आयुक्त को भीड़ दिखाने की होड़ लगी हुई है।
-बेदिल

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