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मानेसर जमीन घोटाला: ईडी ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा और अन्य के ख़िलाफ़ दर्ज किया मनी लॉन्ड्रिंग का मामला

इस प्रकरण में किसानों को 1500 करोड़ रुपए का चूना लगाया गया था।

Author नई दिल्ली | September 9, 2016 4:38 PM
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा। (फाइल फोटो)

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए नई मुसीबत पैदा करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने गुड़गांव के मानेसर में जमीन के अधिग्रहण में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उनके और अन्य के खिलाफ धनशोधन का मामला दर्ज किया। इस प्रकरण में किसानों को 1500 करोड़ रुपए का चूना लगाया गया था। ईडी ने सीबीआई की प्राथमिकी के आधार पर कांग्रेस नेता के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज की है। पिछले हफ्ते सीबीआई ने हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी में तलाशी ली थी। अधिकारियों ने बताया कि प्रवर्तन निदेशालय का मामला धनशोधन रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के प्रावधानों के तहत बनाया गया है तथा एजेंसी ने इस मामले में किए गए भ्रष्टाचार के फलस्वरूप कथित रूप से अवैध तौर हुई आपराधिक कमाई की पहचान करनी शुरू कर दी है। उन्होंने कहा, ‘शीघ्र ही आरोपियों को सम्मन भेजा जाएगा। जांच के तहत एजेंसी दागी कोष से अर्जित परिसपंत्ति की भी जांच कर रही है ताकि पीएमएलए के तहत उनकी कुर्की की जा सके।’

यह मामला पिछले साल सितंबर में इस संबंध में सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए एक मामले से संबंधित है। सीबीआई ने इस आरोप पर मामला दर्ज किया था कि 27 अगस्त, 2004 से 27 अगस्त 2007 के बीच निजी बिल्डरों ने हरियाणा सरकार के अज्ञात जनसेवकों के साथ मिलीभगत कर गुड़गांव जिले में मानसेर, नौरंगपुर और लखनौला गांवों के किसानों और भूस्वामियों को सरकार द्वारा अधिग्रहण का भय दिखाकर उनकी करीब 400 एकड़ जमीन औने-पौने दाम पर खरीद ली थी। आरोप है कि मानेसर, नौरंगपुर और लखनौला के भूस्वामियां को करीब 1500 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। पिछले हफ्ते हुड्डा के निवास की तलाशी के दौरान सीबीआई ने करोड़ों रुपए के धन के लेन-देन का ब्यौरा मिलने का दावा किया था जिसे अब एजेंसी पर परख रही है। उम्मीद है कि ईडी अपनी जांच को आगे बढ़ाने के लिए शीघ्र ही सीबीआई से इन दस्तावेजों की प्रतियां मांग सकती है।

सीबीआई ने आरोप लगाया कि शुरू में हरियाणा सरकार ने मानेसर, नौरंगपुर और लखनौला गांवों में औद्योगिक आदर्श टाउनशिप की स्थापना के वास्ते 912 एकड़ जमीन के अधिग्रहण के लिए जमीन अधिग्रहण अधिनियम के तहत अधिसूचना जारी की थी। उसने मामला दर्ज करने के बाद कहा था कि उसके बाद सरकारी अधिग्रहण का भय दिखाकर निजी बिल्डरों ने मामूली कीमत पर भूस्वामियों की जमीन हथियार ली। उसके बाद, सरकारी नीति का उल्लंघन करते हुए अधिग्रहण प्रक्रिया से मुक्त कर यह जमीन उसके मूल भूस्वामियों के बजाय बिल्डरों, उनकी कंपनियों और एजेंटों के पक्ष में जारी करते हुए सक्षम प्राधिकार यानी उद्योग निदेशक द्वारा आदेश जारी किया था। सीबीआई ने प्राथमिकी में आरोप लगाया है कि इस तरह 400 एकड़ की जिस जमीन की कुल कीमत बाजार दर चार करोड़ रूपए प्रति एकड़ के हिसाब से 1600 करोड़ रुपए थे, वह जमीन निजी बिल्डरों ने कथित रूप से भूस्वामियों से महज करीब 100 करोड़ रुपए में खरीदी।

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