हमारे बुजुर्गों को दोस्ती की जरूरत, अकेलापन दे रहा है अवसाद

रायबरेली के एक बुजुर्ग रामअवतार सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद हैपी गो लकी नाम से एक क्लब चला रहे थे, जहां बुजुर्गों को खुश रहना सिखाया जाता था।

depression, depression in old aged, loneliness of aged people, cause of depression in aged people, loneliness, national news in hindi, international news in hindi, political news in hindi, economy, india news in hindi, world news in hindi, jansatta editorial, jansatta article, hindi news, jansatta
डॉ एससी तिवारी बताते हैं कि अवसाद में जाने के कई कारण हैं। अकेलापन, सामाजिक और आर्थिक स्तर में कमी होना, बीमारी, सेवानिवृत्ति के बाद खाली बैठना, घरवालों से सम्मान न मिलना और दंपति में एक की मौत होना।

गजेंद्र सिंह
रायबरेली के एक बुजुर्ग रामअवतार सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद हैपी गो लकी नाम से एक क्लब चला रहे थे, जहां बुजुर्गों को खुश रहना सिखाया जाता था। जिंदादिल रामअवतार 67 साल की उम्र में उस वक्त अचानक अवसाद में चले गए जब उनकी पत्नी की मौत हो गई। इसके बाद उन्होंने क्लब जाना भी बंद कर दिया। एक समय तो ऐसा आया कि उन्होंने अपना सिर दीवार पर मारकर खुद को लहूलुहान तक कर लिया। उनको इलाज के लिए लखनऊ के केजीएमयू के वृद्धावस्था मानसिक विभाग में लाया गया, जहां डॉक्टरों ने उनके व्यवहार और सोच को बदलने की कोशिश की। इनका इलाज करने वाली मनोचिकित्सक डॉ निशामणि पांडेय बताती हैं कि उन्हें ठीक करने में उनके बच्चों ने काफी साथ दिया। अगर रामअवतार कुछ दिन और ऐसे ही जीते तो उनकी जिंदगी खतरे में थी।

अवसाद की जद में आने वाले लोग ज्यादातर 40 से 60 साल की उम्र के होते हैं। इनमें भी महिलाएं ज्यादा हैं। कुछ परिवारों में तो बुजुर्गों का अवसाद पहचान में आ जाता है लेकिन ज्यादातर लोग अंदर ही अंदर इससे जूझते रहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो पिछले कुछ सालों में बुजुर्गों में अवसाद बढ़ा है। समुदाय आधारित शोध में महिलाओं और शहरी क्षेत्र में रहने वालों में यह सबसे अधिक पाया गया है। केजीएमयू लखनऊ के वृद्धावस्था मानसिक विभाग के अध्यक्ष डॉ एससी तिवारी बताते हैं कि दो साल पहले लखनऊ में किए गए एक सर्वे में 21.9 फीसद बुजुर्गों को अवसाद का शिकार पाया गया था। डॉक्टर तिवारी बताते हैं कि जिन घरों में परिवार का सहयोग मिलता है, वहां बुजुर्ग अवसाद को स्वीकारते हैं। जो बुजुर्ग परिवार में नकारे जाते हैं, वे घुट-घुटकर जीते हैं। ऐसा नहीं है कि अवसादग्रस्त लोगों का जीवन कम हो जाता है। अगर इलाज और काउंसलिंग की जाए तो सामान्य जीवन जीना आसान है।

दिल्ली-एनसीआर के मैक्स अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ सैयद दानिश अहमद कहते हैं कि अवसाद पागलपन नहीं है, लेकिन इसका असर स्वास्थ्य और प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। चिड़चिड़ापन और हमेशा लड़ने की आदत बढ़ जाती है। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि मरीज अपनी जान देने की कोशिश तक करते हैं। बरेली के मनोचिकित्सक डॉ आशीष कुमार बताते हैं कि अवसाद में इलाज जरूरी है, लेकिन इसमें कुछ दवाएं ऐसी हैं जो सीधे गुर्दे और हृदय पर असर करती हैं। इसलिए इलाज में इसका भी ध्यान रखना जरूरी है। 50 की उम्र के बाद अवसाद बढ़ने का सबसे बड़ा कारण दोस्तों का कम होना और सामाजिक दायरा सिमटना है और यह काफी गंभीर बात है।

मानसिक मरीजों का हाल

एनएमएचएस सर्वेक्षण के अनुसार राजस्थान में 38.9, मध्य प्रदेश में 36.6, छत्तीसगढ़ में 32.4 और असम में 27.3 फीसद लोग मानसिक रोग से पीड़ित हैं। मध्य प्रदेश, पंजाब और छत्तीसगढ़ में शराब से होने वाली समस्या ज्यादा है। झारखंड, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु व्यवहार से जुड़ी बीमारियों में आगे हैं। न्यूरो और चिंता से जुड़ी बीमारियों के मरीज झारखंड, राजस्थान, मणिपुर व केरल में अधिक हैं।

क्यों अवसाद में जा रहे हैं हमारे बुजुर्ग

डॉ एससी तिवारी बताते हैं कि अवसाद में जाने के कई कारण हैं। अकेलापन, सामाजिक और आर्थिक स्तर में कमी होना, बीमारी, सेवानिवृत्ति के बाद खाली बैठना, घरवालों से सम्मान न मिलना और दंपति में एक की मौत होना।

पढें नई दिल्ली समाचार (Newdelhi News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट