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सत्ता समर: राष्टीय चेहरे बनाता रहा है दिल्ली का चुनावी मैदान

देश की राजधानी और लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण दिल्ली राष्ट्रीय नेताओं को संसद में भेजने का एक बड़ा ठिकाना आज भी बनी हुई है। 1912 में जब अंग्रेजों ने कलकत्ता के स्थान पर राजधानी बनाने का फैसला किया तब दिल्ली की आबादी 2,32,837 थी। आज दिल्ली की आबादी दो करोड़ के पार है।

Author March 17, 2019 9:10 AM
प्रतीकात्मक फोटो (फाइल)

देश की राजधानी और लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण दिल्ली राष्ट्रीय नेताओं को संसद में भेजने का एक बड़ा ठिकाना आज भी बनी हुई है। 1912 में जब अंग्रेजों ने कलकत्ता के स्थान पर राजधानी बनाने का फैसला किया तब दिल्ली की आबादी 2,32,837 थी। आज दिल्ली की आबादी दो करोड़ के पार है।
आजादी के बाद 1952 के पहले चुनाव में दिल्ली की दोनों सीटों पर स्वाधीनता सेनानी सीके नायर(बाहरी दिल्ली) और सुचेता कृपलानी (नई दिल्ली) ने चुनाव जीते। सुचेता कृपलानी लगातार दो बार चुनाव जीतने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हो गर्इं और मुख्यमंत्री बनीं। दिल्ली में आबादी बढ़ने के साथ लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ती गई। लेकिन 1967 में सात सीटें होने के बाद सीटों की संख्या बढ़नी रुक गई और 2008 में सीटों की संख्या सात रखते हुए सीटों का परिसीमन करके सभी लोकसभा सीटों की आबादी बराबर करने के प्रयास हुए। अबादी का घनत्व समान न होने के कारण इन दस सालों में ही फिर से सीटों की आबादी में काफी अंतर आ गया। लेकिन हर लोकसभा सीट के नीचे दस-दस विधानसभा सीटें होने के कारण कुछ तो समानता अभी भी दिख रही है।

बड़ी संख्या में पाकिस्तान से विस्थापित होकर पंजाब, सिंध और कुछ बंगाल मूल के लोग आए। आजादी के साथ ही केंद्र सरकार के दफ्तर में काम करने सरकारी कर्मचारी आए।फिर दिल्ली में कल- कारखाने बढ़े और प्रवासी लोगों का आना बढ़ा। उत्तराखंड के लोग बड़ी संख्या में आए। 1982 के एशियाड खेलों के समय बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुए और तभी से बिहार (झारखंड), मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़), ओड़िशा, पूर्वी उत्तर प्रदेश आदि राज्यों से बड़ी संख्या में लोग आए। नई दिल्ली सीट से दो बार सुचेता कृपलानी, दो बार अटल बिहारी वाजपेयी, दो बार लालकृष्ण आडवाणी और दो बार दिल्ली के उप राज्यपाल रहे पूर्व नौकरशाह जग मोहन सांसद रहे। चांदनी चौक सीट से जनसंघ के बड़े नेता रहे वसंत राव ओक को कांग्रेस के दिग्गज राधारमण ने पराजित किया। स्वाधीनती सेनानी सुभद्रा जोशी चांदनी चौक से 1971 में चुनाव जीती और 1977 में पराजित हो गई। दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश सदर से एक बार और बाहरी दिल्ली से चार बार सांसद बने। भाजपा के दिग्गज कृष्णलाल शर्मा दो बार बाहरी दिल्ली से सांसद बने। दिग्गज नेता और जीवन के अधिकांश समय सत्ता के शीर्ष पर रहे जगजीवन राम की पुत्री आरक्षित सीट करोल बाग से दो बार संससद रहीं, लेकिन एक बार वहीं से पराजित होकर वे फिर से बिहार की अपने पिता की परंपरागत सासाराम सीट पहुंच गर्इं। वहीं से चुनाव जीत कर लोक सभा अध्यक्ष बनी। नई दिल्ली की तरह ही दक्षिणी दिल्ली सीट 2008 के परिसीमन से पहले वीआईपी सीट हुआ करती थी। इस सीट से सुषमा स्वराज्य दो बार चुनाव जीतीं। भाजपा के मदन लाल खुराना और विजय कुमार मल्होत्रा दक्षिणी दिल्ली और सदर से सांसद रहे। वहां दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री साहिब सिंह बाहरी दिल्ली से सांसद रहे। कांग्रेस के एचकेएल कपूर पूर्वी दिल्ली से, सज्जन कुमार बाहरी दिल्ली से तो जगदीश टाइटलर सदर और जय प्रकाश अग्रवाल चांदनी चौक से सांसद रहे। क्रिकेटर चेतन चौहान पूर्वी दिल्ली से पराजित हुए। जनता पार्टी के टिकट पर सिकंदर बख्य चांदनी चौक से सांसद रहे तो भाजपा के विजय गोयल सदर और चांदनी चौक दोनों ही सीटों से सांसद रहे। स्मृति ईरानी चांदनी चौक से पराजित हुर्इं तो कांग्रेस के कपिल सिब्बल विजयी रहे। 1984 में दक्षिणी दिल्ली से संसद रहे ललित माकन की आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी। 1985 में उस सीट से उप चुनाव में कांग्रेस दिग्गज अर्जुन सिंह चुनाव जीते और कांग्रेस के इतिहास में पहली बार उपाध्यक्ष बने। पंजाब में राजीव-लौंगेवाल समझौता का श्रेय उनको जाता है।

’अभी सात सीटें हैं, लेकिन 2008 के परिसीमन में सीटों के नाम बदल गए। अब नई दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, चांदनी चौक, पूर्वी दिल्ली, उत्तर पूर्व दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और एससी आरक्षित उत्तर पश्चिम दिल्ली हैं।

’1952 में लोकसभा की दो ही सीटें थीं
’1957 में चांदनी चौक और सदर बाजार सीटें बनीं
’1962 में करोलबाग आरक्षित सीट बनी
’1967 में सीटों की संख्या सात हो गई जिसमें दक्षिणी दिल्ली और पूर्वी दिल्ली नाम की दो सीटें बन गर्इं।

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