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परिचर्चा में गरजेंगे वाम-दक्षिण और आम

कश्मीर के वर्तमान हालात, तीन तलाक, ईडब्लूएस आरक्षण से लेकर परिसर में दीवारों पर लिखने पर लगे प्रतिबंध चर्चा और बहस होना तय है।

अध्यक्ष पद के सभी उम्मीदवारों ने बारी-बारी से अपनी बात मीडिया के सामने रखी।

छह सितंबर को होने वाली अध्यक्षीय परिचर्चा में इस बार अनुच्छेद 370 को खत्म करने से लेकर कश्मीर के वर्तमान हालात, तीन तलाक, ईडब्लूएस आरक्षण से लेकर परिसर में दीवारों पर लिखने पर लगे प्रतिबंध चर्चा और बहस होना तय है। इसी एक झलक बुधवार को जेएनयू छात्र संघ चुनाव आयोग की ओर से आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई दी। अध्यक्ष पद के सभी उम्मीदवारों ने बारी-बारी से अपनी बात मीडिया के सामने रखी।

आईशी बोस, वाम एकता
आईशी बोस ने कहा कि आज देश में धर्मनिरपेक्षता के वातावरण को खराब किया जा रहा है। दलितों और अल्पसंख्यकों की देश में ही नहीं परिसर में लिंचिंग हो रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि परिसर से एक नजीब नाम का छात्र गायब हो जाता है, जिसका आज तक पता नहीं चलता। बोस ने कहा कि जेएनयू में सीएसकैश को खत्म कर आइसीसी लाया गया, जहां शिकायतकर्ता जाने से डरते हैं क्योंकि वहां अपराधी का ही संरक्षण होता है। उन्होंने कहा कि वाम एकता विद्यार्थियों के मुद्दों को उठाने के लिए बनाई गई है।
जितेंद्र सूना, बापसा

सूना ने कहा कि आज देश में दबे-कुचलों को कभी गाय तो कभी श्रीराम के नाम पर मारा जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस परिसर में लेफ्ट और राइट के बीच में आम छात्र पिस रहा है। जब ओबीसी आरक्षण लागू हुआ तो उस समय पश्चिम बंगाल में वाम की सरकार थी लेकिन उन्होंने इस आरक्षण को लागू करने से मना कर दिया था और कहा था कि हमारे यहां जातिवाद नहीं है। सूना ने कहा कि परिसर में एससी और एसटी विद्यार्थी सबसे अधिक संख्या में पढ़ाई बीच में छोड़ रहे हैं लेकिन इसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। उन्होंने यूजीसी को यूनिवर्सिटी मनु कमीशन कहा।

मनीष जांगिड़, एबीवीपी
मनीष ने कहा कि जो वाम संगठन एक साल में अपने छात्र संघ को ही अधिसूचित नहीं करा पाए, वो भला विद्यार्थियों की समस्याओं के लिए क्या संघर्ष करेंगे। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर में दलितों और महिलाओं को अन्य लोगों की तरह समान अधिकार मिले हैं लेकिन इस पर कोई वाम संगठन नहीं बोलेगा। 1990 में जब श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा जलाया गया था तो एबीवीपी के दस हजार कार्यकर्ताओं ने वहां जाकर तिरंगा फहराया था। उन्होंने कहा कि तीन तलाक जैसी कुप्रथा खत्म हुई है लेकिन इस पर भी यहां कोई नहीं बोलेगा।

प्रशांत कुमार, एनएसयूआइ
प्रशांत ने कहा कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने पर हमारे एबीवीपी के साथी जश्न मना रहे हैं लेकिन वे कश्मीर की जमीन को तो चाहते हैं लेकिन कश्मीरियों को नहीं। उन्होंने कहा कि लेफ्ट और राइट के बीच में आम विद्यार्थी परेशान हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम जीतते हैं तो दो नए पदों को सृजित करेंगे जिनमें संस्कृति सचिव और खेल सचिव शामिल हैं। इससे परिसर के विद्यार्थियों को संस्कृति और खेल से जुड़ने का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा कि जेएनयू की जो दीवारें कभी बोलती थीं आज वे खामोश हैं। हम जीतने के बाद इन दीवारों पर फिर से लिखना शुरू करेंगे।

प्रियंका भारती, छात्र राजद
प्रियंका ने कहा कि मंडल कमीशन लागू होने के करीब बाद 20 साल बाद विश्वविद्यालयों में इसे लागू किया गया लेकिन ईडब्लूएस आरक्षण एक दिन में लागू कर दिया गया। उन्होंने कहा कि पांच लाख सालाना आमदनी वाला कैसे गरीब हो सकता है। गरीब तो वो होता है जो बिना खाने के मरता है जैसे एक बच्ची भात-भात कहते हुए मर गई। उन्होंने कहा कि इस परिसर में हम जैसे एकलव्यों का अंगूठा कटाने के लिए कई द्रोणचार्य बैठे हैं जो साक्षात्कारों में अपना कमाल दिखाते हैं। उन्होंने वाम एकता पर वार करते हुए कहा कि इन्हें एकता की याद चुनावों के समय ही आती है। प्रियंका ने कहा कि वाम ने अगर संघर्ष किया होता तो जेएनयू की प्रवेश परीक्षा आॅनलाइन नहीं होती।

राघवेंद्र मिश्रा, निर्दलीय
राघवेंद्र ने कहा कि कुछ समय से जेएनयू के केंद्रीय पुस्तकालय में हर शुक्रवार को नमाज अता होती है। मैंने इसके खिलाफ छात्र संगठनों से लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन तक को लिखा है लेकिन कोई इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा कि हम पुस्तकालय को मस्जिद नहीं बनने देंगे। उन्होंने कहा कि जेएनयू छात्र संघ के कार्यालय में मार्क्स की फोटो तो है लेकिन गांधी की नहीं। अगर मैं जीतता हूं तो सबसे पहले यहां गांधी, सावरकर और गोलवलकर की तस्वीर लगाऊंगा। इसके अलावा हमारे उत्तर-पूर्व से कई महान लोग हुए हैं, उनकी भी तस्वीर यहां लगनी चाहिए। उन्होंने अनुच्छेद 370 और तीन तलाक कानून पर सभी को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यदि में जीतता हूं तो जेएनयू परिसर में मां सरस्वती की मूर्ति स्थापित कराऊंगा।

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