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जनसत्ता बारादरी: जड़ों की ओर लौटना होगा

आगामी नवंबर में आम आदमी पार्टी अपनी स्थापना के पांच साल पूरे कर लेगी। इस दौरान वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद बनी इस पार्टी ने कई उतार-चढ़ाव देखे। दिल्ली जीत कर इतिहास रचा, तो देश के अन्य राज्यों में पांव पसारने की भारी कीमत भी चुकाई। पार्टी के संस्थापक सदस्य कुमार विश्वास ने जनसत्ता बारादरी की बैठक में कहा कि हमें लोगों ने इसलिए चुना था कि हम वैकल्पिक राजनीति करेंगे। वैकल्पिक राजनीति के मार्ग से हम जब-जब हटेंगे, तब-तब अस्वीकार किए जाएंगे। उन्होंने ‘बैक टु बेसिक’ की बात करते हुए कहा कि पार्टी को आंदोलन के दौर में लौटना होगा। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

आप नेता और लोकप्रिय कवि डॉ कुमार विश्वास। (फाइल फोटो)

कुमार विश्वास क्यों
भारतीय राजनीति में तूफान की तरह आई आम आदमी पार्टी ने नाकामियों की सुनामी भी झेली। जनलोकपाल का नारा लगाने वाली पार्टी के संयोजक पर तानाशाह की तरह काम करने के आरोप लगे और पार्टी के संस्थापक सदस्य एक-एक कर छिटकने लगे। अभी जब गुजरात और राजस्थान में पार्टी अपने पैर जमा रही है तो इसके वादों, दावों और आगे के सपनों पर बात करने के लिए पार्टी के संस्थापक सदस्य और शुरुआती दौर में मंचों पर आंदोलन की कमान संभालने वाले कुमार विश्वास से बेहतर चेहरा और कौन होता।

अजय पांडेय : आप आम आदमी पार्टी के राजस्थान के प्रभारी हैं। वहां कैसी तैयारी है?
कुमार विश्वास : राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है, जहां कांग्रेस और भाजपा ही सत्ता में आती रहती हैं, इसलिए कि वहां तीसरा कोई मजबूत विकल्प नहीं है। जबकि इन दोनों पार्टियों का प्रदेश की समस्याओं को लेकर बहुत जुड़ाव नहीं रहता है। जबकि वह अपार संभावनाओं का प्रदेश है। मुझे पार्टी ने कहा कि आपको पार्टी की कार्यपद्धतियों को लेकर गंभीर आपत्ति रहती है। आपने पंजाब को लेकर सवाल उठाए, दिल्ली में उठाए, इसलिए क्यों न आप एक प्रदेश को बना कर दिखाएं। इस तरह राजस्थान मुझे दिया गया। तब मैंने पूछा कि क्या वहां मुझे संगठन निर्माण करना है या चुनाव भी लड़ना है? तो एक मत से पीएसी ने कहा कि हम वहां चुनाव लड़ेंगे। आप तैयारी कीजिए। तब मैंने ‘बैक टु बेसिक’ का नारा दिया। इस पर हमारे कुछ साथियों को एतराज भी हुआ। ‘बैक टु बेसिक’ एक मुश्किल काम है। पार्टी को आंदोलन के दौर में लौटाना। यानी भीड़ जुटाने के लिए अतिरिक्त साधन इस्तेमाल नहीं किए जाएंगे। इसमें कार्यकर्ताओं को सुनना पड़ता है, क्योंकि संगठन को उनके हिसाब से चलाना है।

पंजाब में मैंने महसूस किया कि वहां की पिछले चार सौ साल की जो राजनीति है, वह दिल्ली के वर्चस्ववाद के खिलाफ है। दशमेश गुरु का कहना था कि आप अपना काम करो, यहां हमें अपना काम करने दो, क्योंकि यह जमीन हमारी है। वैसी ही स्थिति राजस्थान की है। राजस्थान की राजनीति दिल्ली के वर्चस्व के खिलाफ है। इसलिए हमने वहां उसे ‘बैक टु बेसिक’ में परिवर्तित किया। सो, राजस्थान में हमारी अच्छी तैयारी है। पिछले दो महीनों में हम ‘महारानी’ को दो बार बैकफुट पर लाए। अभी उन्होंने जो अध्यादेश जारी किया, उस पर सबसे पहले आवाज हमने उठाई। उसके बाद कांग्रेस भी आगे आई। नतीजतन मुख्यमंत्री को उस अध्यादेश को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजना पड़ा। जाहिर है, अब वह अध्यादेश वापस आने वाला नहीं है। एक अच्छी शासक की तरह उन्हें अपनी गलती मान कर उस अध्यादेश को वापस ले लेना चाहिए था। इस तरह राजस्थान में हमारी तैयारी अच्छी चल रही है। अभी यह तो दावा नहीं कर सकते कि कितनी सीटों पर हम जीतेंगे या नहीं जीतेंगे। पर अभी डेढ़ साल हैं। सौ विधानसभाओं में हमारा संगठन बन गया है, सौ पर अभी बनना है। अभी उन्नीस प्रदेशों में हमारी पार्टी काम कर रही है। पांच साल से सीवाईएसएस है। मगर यह एक ऐसा प्रदेश है, जहां पचास से अधिक सीटें हमने सीवाइएसएस में जीतीं, आठ हमारे पूरे पैनल जीते, बारह अध्यक्ष जीते, जिनमें दो विश्वविद्यालयों के अध्यक्ष जीते।

मनोज मिश्र : आम आदमी पार्टी के उभार से वैकल्पिक राजनीति की शुरुआत का सपना जगा था। इन पांच सालों में आपको क्या लगता है कि कोई कमी रह गई है?
’आंदोलनों से निकली पार्टियां राजनीतिक पार्टियों में परिवर्तित हो ही जाती हैं। लेकिन वे अपने परिवर्तन की आयु जितनी दीर्घ कर लेंगी, वे राजनीति में उतना ही सकारात्मक प्रयोग कर पाएंगी। जैसे कांग्रेस का वैचारिक पतन इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल से होना शुरू हुआ। आज कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है, जिसका वैचारिक मूल्य कुछ नहीं है। अब भारतीय जनता पार्टी भी अस्सी फीसद से अधिक कांग्रेस हो चुकी है। हमारे संगठन में भी उसके बनने के बाद से अब तक उसका राजनीतिकरण हुआ है। लेकिन मुझ जैसे कार्यकर्ता जो सत्ता से बाहर खड़े रहते हैं, वे इस क्षरण को कम करने का प्रयास करते रहते हैं। इसलिए यह कहना तो गलत होगा कि जैसा आंदोलन के समय था, आज पार्टी वैसी ही है। अगर पार्टी आज वैसी होती, तो जितना समर्थन और प्रेम आंदोलन को मिला था, उतना ही पार्टी को भी मिल रहा होता। दरअसल, जब आप किसी मसले पर कोई फैसला करते हैं तो उसमें सहमत और असहमत होने वालों की संख्या बढ़ती जाती है। जिस पार्टी और संगठन में सहमत लोगों का समूह बड़ा हो, उसका आधार बड़ा होता जाता है। नवंबर में हमारे संगठन के पांच साल पूरे होने जा रहे हैं, उसकी वर्षगांठ पर हम समीक्षा करेंगे कि रास्ते में छूटे कौन-कौन लोग हैं, क्या वे निजी महत्त्वाकांक्षा की वजह से छूटे हैं, क्या वे वैचारिक असहमति को सहन न कर पाने की वजह से छूटे हैं। मेरा निजी संघर्ष इसलिए है कि यह एक विशुद्ध राजनीतिक पार्टी न बन कर रह जाए।

मुकेश भारद्वाज : पंजाब में आपकी पार्टी जीतने का दावा कर रही थी, मगर चुनाव के समय पार्टी के भीतर ही इतनी तरह की टूट-फूट और आरोपों का सामना करना पड़ा कि उसे वहां से मुंह छिपा कर भागना पड़ा। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे।
’पहली बात तो यह कि वहां के बारे में मुझे बहुत जानकारी नहीं है। पार्टी ने चुनावों से पहले कहा कि आप पंजाब के चुनावों में हस्तक्षेप मत कीजिए। लोगों को लगता था कि मैं एक राष्ट्रवादी चेहरा हूं और पंजाब में हिंदू-सिख भाईचारे को लेकर बहुत सावधानी बरती जाती है। मगर पता नहीं क्या राजनीतिक गणित था कि मुझे वहां जाने से मना कर दिया गया। इसलिए मुझे वहां की जानकारियां सिर्फ उतनी ही मिल पातीं, जितनी पीएसी में दी जाती थीं। हां, यह जरूर है कि पंजाब हमारे लिए बहुत बड़ा झटका था। अगर हम पंजाब में चुनाव जीतते तो हमारी संभावनाएं और प्रबल होतीं। हम आज गुजरात में भी उसी शक्ति के साथ खड़े हो पाते। अभी गुजरात में हम तय नहीं कर पा रहे कि गुजरात में पंद्रह सीट लड़ें कि सोलह सीट लड़ें। सो, मैं यह नहीं कहता कि गलतियां नहीं हुई हैं। पंजाब में गलतियां हुई हैं, इसलिए हम हारे हैं। नेताओं का काम है कि वे गलतियों से सबक लें। सो, पंजाब से जो सबक मिला, उसका उपयोग मैं राजस्थान में कर रहा हूं।

मृणाल वल्लरी : आम आदमी पार्टी पर आरोप है कि आप उन्हीं जगहों पर जाते हैं, जहां कांग्रेस मजबूत हो रही होती है और इस तरह आप भाजपा के हाथ मजबूत करते हैं।
’मुझे इस दावे में कोई सच्चाई दिखती नहीं है। कुछ निर्णय ऐसे हैं, जो प्रभारियों ने लिए। पंजाब में हम इसलिए चुनाव लड़े कि 2014 में हम वहां काफी मजबूत स्थिति में थे। जब पूरे भारत में हमें कहीं कोई सीट नहीं, मिली तब पंजाब ने हमें चार सीटें दीं। इस तरह पंजाब में हम पहले से थे। वहां चुनाव लड़ना ही था, लड़े। जहां तक गुजरात का मामला है, वहां पंजाब से पहले माहौल बन चुका था। अभी वहां क्या स्थिति है, उसका जवाब वहां के प्रभारी गोपाल राय दे सकते हैं। प्रभारियों को स्वतंत्रता है कि वे अपने क्षेत्र में चुनाव संबंधी निर्णय स्वयं करें। हालांकि यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि पूरे देश में हमारी पहचान इतनी बन चुकी है कि जहां भी हम जाते हैं, भारी संख्या में लोग हमें सुनने आते हैं। तो, हमें लोगों ने चुना इसलिए कि हम वैकल्पिक राजनीति करेंगे। पार्टियां तो बहुत-सी हैं, रोज बनती हैं, पर लोगों को वैकल्पिक राजनीति चाहिए। वैकल्पिक राजनीति के मार्ग से हम जब-जब हटेंगे, तब-तब अस्वीकार किए जाएंगे।

सूर्यनाथ सिंह : पार्टी के पांच साल पूरे होने पर जो आपने समीक्षा करने की बात की, क्या उसमें इस बात की भी समीक्षा होगी कि अरविंद केजरीवाल के कामकाज के तरीके से जो बार-बार असंतोष पैदा होता है, वह कैसे कम हो?
’एक तो यह कि पार्टी के भीतर, पीएसी में जो एजंडा तय होता है, उस पर मैं बाहर अखबार के दफ्तर में बैठ कर चर्चा नहीं कर सकता। हां, मैं अपने बारे में इतना जरूर कह सकता हूं कि जो कुछ असंगत है, यह नहीं होना चाहिए, इससे बचा जा सकता था, उस पर मैं लगातार आवाज उठाता रहा हूं, शायद इसलिए मैं बहुत सारे लोगों को अरुचिकर लगता हूं, पर मैं पूरी कोशिश करता हूं और आशा है कि कार्यकर्ताओं, विधायकों और देश की जनता का एक बड़ा वर्ग यही मानता है कि आम आदमी पार्टी को वैकल्पिक राजनीति की ओर लौटना पड़ेगा। जो-जो हमारी पार्टी से गए और देश की सबसे बड़ी पार्टी से चुनाव लड़े, वे हारे। इससे यही सबक मिला कि इन पारंपरिक तरीकों को जनता स्वीकार नहीं करती। आप वैकल्पिक राजनीति कीजिए। आप सच को सच बोलो। अगर हम जाति की राजनीति करें, धर्म की राजनीति करें, तो हमें कोई नहीं जिताएगा।

मनोज मिश्र : राजस्थान सरकार की तरह दिल्ली सरकार भी मीडिया पर बंधन लगा रही है।
’दिल्ली सरकार से मेरा संबंध नहीं है। न मुझसे पूछा जाता है, और न मैं बताता हूं। इतने साल के अपने कवि सम्मेलनी कॅरियर में मैं सरकारों के आयोजनों में नहीं जाता। सरकारें आती-जाती रहती हैं। मेरे राजनीतिक जीवन को भले लोग याद न रखें, पर मैं जानता हूं कि आज से दो सौ साल बाद कवि कुमार विश्वास को लोग जरूर याद करेंगे।

मुकेश भारद्वाज : आपके विरोधी तो कहते हैं कि कविता और कॉमेडी से राजनीति नहीं हो सकती।
’ देखिए, भ्रष्ट हुए बिना पूर्णकालिक नेता नहीं रहा जा सकता। पूर्णकालिक नेताओं के खर्चे कहां से आते हैं? मैं तो कवि सम्मेलन से पैसे जुटाता हूं और उससे अपना खर्च चलाता हूं। पूर्णकालिक नेताओं की तरह मैं चमचे नहीं पालता और न दूसरों के पैसे से हवाई यात्रा और लंबी गाड़ियों में चलता हूं। अगर वह सब मुझे करना होता तो प्रधानमंत्री मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं और वे जानते हैं कि मेरा मकसद क्या है। तो, मैं इस आरोप को शिरोधार्य करता हूं कि हां, मैं कुछ दिन राजनीति नहीं करता हूं, अपना काम करता हूं। कवि सम्मेलन वाला काम मेरी जीवनवृत्ति है, मैं उसे छोड़ नहीं सकता। और जो लोग कहते हैं कि कविता और कॉमेडी से राजनीति नहीं हो सकती, वे गलत कहते हैं। अगर भाजपा के लोग ऐसा कहते हैं, तो उन्हें शर्म से डूब कर मर जाना चाहिए, क्योंकि उनका अखिल भारतीय विस्तार ही एक कवि की भाषा से हुआ है। भारतीय जनता पार्टी का विस्तार बलराज मधोक से नहीं हुआ, नानाजी देशमुख से नहीं हुआ, अटल बिहारी वाजपेयी की प्रांजल भाषा और लोकश्रुत शैली के कारण हुआ है। और अगर हमारी पार्टी के पैराशूट से आए लोग यह बात कहते हैं, तो उन्हें बता दें कि उनकी आज जो औकात बनी है, वह एक कवि की भाषा से बनी है। तेरह-तेरह दिन आंदोलन चलाना और लोगों को बांधे रखना, वह एक कवि का कौशल ही था। तब आप उस पर मुग्ध थे। क्योंकि तब वह आप पर कोई सवाल नहीं उठाता था। आज आप मुग्ध नहीं हैं, क्योंकि वह आप पर सवाल उठाता है। यह बात मुझे समझ में नहीं आती कि जो आदमी कल तक फटे कपड़ों में घूमा करता था, राजनीति में आते ही चमचमाते कपड़े पहनने लगता है। महंगा मोबाइल उसके हाथ में होता है। पूछिए तो कहेगा कि कार्यकर्ता ने दिया है। पूरे यूरोप में प्रोफेशनल पॉलीटिक्स है। डॉक्टर पॉलीटिक्स करता है, कोई और पेशेवर पॉलीटिक्स करता है। वह अपनी वृत्ति नहीं छोड़ता और पॉलीटिक्स भी करता है। हमारे यहां ऐसा नहीं है। तो, कविता से राजनीति चलती है, कविता से राजनीति संभलती है। जो आपका निजी काम है, उसे नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि उससे आपका घर चलता है।

मनोज मिश्र : कई बार ऐसा भी हुआ कि आपने पार्टी छोड़ने का मन बना लिया!
’अभी तो नहीं। पहले हुआ है कुछ मौकों पर, जब मुझे लगा कि यह बात मेरे विचार के विपरीत है और मैं उसे सहन नहीं कर पाऊंगा। एक बार ऐसा हुआ, पर वह स्थिति टल गई। मुझे लगता है कि काम को अधूरा छोड़ कर बाहर आना या कुछ भी करना ठीक नहीं है।

मीना : आपकी पार्टी के भीतर विवाद उठते रहते हैं, फिर उपराज्यपाल से टकराव बना रहता है, ऐसे में दिल्ली में पार्टी की स्थिति पर क्या असर पड़ा है?
’सफलता के सौ पिता होते हैं और विफलता की कोई मां नहीं होती। पंजाब में अगर हमने सफलता पाई होती तो लोग कहते कि देखो इन लड़कों ने पहले दिल्ली जीती, फिर पंजाब और अब चल दिए गुजरात, अब ये करेंगे चमत्कार। मगर पंजाब में आशा के विपरीत नतीजे आए। पर गलतियां चाहे जो हुई हों हमसे, पर इस बात का संतोष होना चाहिए कि वहां हम मुख्य विपक्षी दल हैं। इतनी पुरानी पार्टी अकाली दल को पीछे छोड़ दिया है।

मृणाल वल्लरी : बारादरी की ही बैठक में कवि केदारनाथ सिंह ने कहा था कि इस समय अच्छी और गंभीर कविता नहीं लिखी जा रही। आपका क्या कहना है?
’पहली बात तो यह कि गंभीर क्या है और शाश्वत क्या है, उसका निर्णय उसी समय नहीं हो सकता। एक ही वक्त में केशव और तुलसीदास ने राम पर कविता लिखी। केशव ओरछा नरेश के कवि थे। तुलसी को बनारस के पंडितों ने इसलिए तिरस्कृत कर दिया कि उन्होंने देवभाषा से अलग भाषा में राम के चरित्र का बखान किया। मगर आज वही तुलसीदास का काव्य देश भर में लोकप्रिय है। राम के चरित्र पर और भी बहुत से लोगों ने लिखा, पर वह लोकप्रियता किसी को नहीं मिली, जो रामचरित मानस को मिली। इसलिए वे कौन ठेकेदार हैं, जो तय करते हैं कि कौन सी धारा मुख्य है और कौन सी गौण। ये खुद तो पांच सौ हैं और कहते हैं कि हम मुख्यधारा हैं। और जिनको पांच करोड़ सुन रहे हैं, वे अप्रासंगिक हो गए! असल में इनका एक बंद समाज है। ये खुद ही अपनी किताबें आपस में बांट कर पढ़ लेते हैं, खुद ही एक-दूसरे की समीक्षा कर लेते हैं। खुद ही आपस में पुरस्कार बांट लेते हैं। मैं इनकी कविताएं बड़े आदर के साथ पढ़ता हूं, हो सकता है, उन तक मेरी कविताएं न पहुंची हों। पर मेरी कविताओं को पंद्रह-बीस लाख नौजवान लड़के-लड़कियां पढ़ते हैं, अपने इश्क भरे खतों में उनकी पंक्तियां शामिल करते हैं।

(प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह/मृणाल वल्लरी)

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