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पांच बार धरने पर बैठ चुके हैं केजरीवाल

सस्ती बिजली और पानी के बूते ही वे 2013 के विधान सभा में 28 सीटें और 2015 के विधान सभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीते। उनकी पहली सरकार 49 दिन चली। उसी सरकार के दौरान कुछ पुलिस अधिकारियों पर कारवाई के लिए उन्होंने जनवरी 2014 में रेल भवन पर धरना दिया।

Author February 26, 2019 8:57 AM
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल। (Express Photo)

बिना किसी ठोस जमीन के धरना-प्रदर्शन की राजनीति के बूतेदिल्ली पर राज कर रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लोकसभा चुनाव से पहले फिर से अपने पुराने ढर्रे पर लौटने का एलान करके राजनीतिक गलियारों में फिर हलचल मचा दी है। पंद्रह साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और अब दिल्ली कांग्रेस की प्रमुख शीला दीक्षित का कहना है कि यह सभी को पता है कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है और इसमें बदलाव केवल संसद कर सकती है।
केजरीवाल यह मुद्दा तब उठा रहे हैं जब सोलहवीं लोकसभा भंग होने वाली है। वे केवल मुख्य मुद्दों से लोगों का ध्यान बंटाने और जबरन नया मुद्दा बनाने की कोशिश में हैं। केजरीवाल ने दो दिन पहले दिल्ली को पूर्ण राज्य बनवाने के लिए पहली मार्च से बेमियादी अनशन करने की घोषणा की है। राजनीति में आने के बाद यह उनका छठा और मुख्यमंत्री बनने के बाद चौथा धरना/अनशन होने वाला है। अनशन शुरू होने तक दिल्ली विधानसभा का बजट सत्र चलने वाला है जिसमें प्रचंड बहुमत होने के चलते वे और उनकी पार्टी हर रोज इस विषय को जोर-शोर से उठाती रहेगी।

राजनीतिक दल बनाने के समय केजरीवाल ने जुलाई 2012 में जंतर मंतर पर 12 दिन का धरना दिया था। लेकिन पहला बेमियादी अनशन बिजली के मुद्दे पर मार्च 2013 में सुंदर नगरी में 15 दिनों तक किया और वही अनशन उनकी राजनीतिक सफलता का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। सस्ती बिजली और पानी के बूते ही वे 2013 के विधान सभा में 28 सीटें और 2015 के विधान सभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीते। उनकी पहली सरकार 49 दिन चली। उसी सरकार के दौरान कुछ पुलिस अधिकारियों पर कारवाई के लिए उन्होंने जनवरी 2014 में रेल भवन पर धरना दिया। दोबारा सरकार आने पर भी उनका उपराज्यपाल और केंद्र सरकार से विवाद जारी रहा। और शहर में सीसीटीवी लगाने में उपराज्यपाल पर अवरोध डालने के नाम पर उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ 14 मई 2018 को उप राज्यपाल दफ्तर (राजनिवास) पर धरना दिया। 11 जून 2018 को उपराज्यपाल पर फाइलें रोकने का आरोप लगाकर केजरीवाल ने अपने सहयोगियों के साथ राजनिवास के प्रतीक्षा कक्ष में नौ दिन तक धरना दिया।

दिल्ली की पूर्व की सरकारों से उलट केजरीवाल हर बात पर विवाद करके और उसका कानूनी समाधान करवाने में लगते हैं। दिल्ली का असली शासक कौन है, इस मुद्दे को सरकार हाई कोर्ट ले गई। हाई कोर्ट ने 16 अगस्त 2016 को अपने फैसले में उपराज्यपाल को दिल्ली का मुखिया बता दिया। इसे दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ में चार जुलाई 2018 को गैर आरक्षित मामलों में दिल्ली सरकार के फैसले को अंतिम बता दिया लेकिन अधिकारियों के तबादले आदि पर सुनवाई को लिए दो जजों की पीठ बना दी। अभी 14 फरवरी को इस पीठ ने केजरीवाल के दावे को कम कर दिया। दो जजों की राय में होने के चलते केजरीवाल सरकार के अनुरोध पर उसकी सुनवाई बड़ी पीठ में करने का अर्जी सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर ली। लेकिन केजरीवाल ने इस फैसले का विरोध किया। वे यह स्वीकारने को तैयार नहीं हैं कि दिल्ली सामान्य राज्य नहीं है। वे बार-बार आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा और कांग्रेस भी पूर्ण राज्य की मांग करती रही है लेकिन वे अब अनका साथ देने को तैयार नहीं हैं। वास्तव में जो दल केंद्र में रहती है वह दिल्ली के अधिकार बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। इस मुद्दे पर केजरीवाल की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले वकीलों में से एक वकील पी चिदंबरम भी हैं जिन्होंने केंद्र में गृह मंत्री रहते हुए बाजाप्ता प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दिल्ली को राज्य बनाने से साफ इनकार किया था।

तथ्य यह है कि जब भी विवाद हुए, दिल्ली सरकार के अधिकार कम हुए। केंद्र और दिल्ली सरकार में लंबे समय तक मंत्री रहे दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन का कहना था कि दिल्ली को किससे लाभ होगा, इस पर विचार करना चाहिए। दिल्ली पुलिस पर हर साल आठ हजार करोड़ रुपए खर्च होते हैं और यह केंद्र सरकार कर रही है। इसी तरह से दिल्ली सरकार के सरकारी कर्मचारियों को हर साल पेंशन देने पर तीन हजार करोड़ से ज्यादा खर्च होता है। दिल्ली सरकार का यह खर्च भी केंद्र उठाता है। इसी तरह से नगर निगमों के खर्चे आदि। दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए सबसे ज्यादा आंदोलन भाजपा की थी। अब जब लोकसभा भंग होने वाली है, इस मुद्दे पर न तो कहीं चर्चा हो सकती है और न ही कोई आश्वासन दे सकता है। यह केवल लोकसभा चुनाव का मुद्दा भर बन सकता है और विपक्ष का आरोप है कि केजरीवाल वही करने में लगे हुए हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने कहा कि केजरीवाल अपने वादे तो पूरे किए नहीं, जो काम करने चाहिए वह कर नहीं पा रहे हैं तो लोगों का ध्यान बंटाने के लिए बेमौसम पूर्ण राज्य के मुद्दे को लेकर अनशन करने की घोषणा कर रहे हैं।

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