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तृतीय रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान: न्यायपालिका की आजादी और पवित्रता जरूरी : न्यायमूर्ति गोगोई

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रंजन गोगोई ने गुरुवार को यहां रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में ‘दो भारत’ के बीच विभाजन और असमानता की स्थिति पर चिंता जताते हुए आह्वान किया कि अब न्यायपालिका के उस ‘संवैधानिक क्षण’ की दरकार है, जो अभी तक लंबित है।

Author नई दिल्ली, 12 जुलाई | July 13, 2018 5:47 AM
न्यायमूर्ति गोगोई ने इस बात को रेखांकित किया कि न्यायपालिका के उल्लेख के साथ संवैधानिक इतिहास यह दिखाएगा कि उसकी भूमिका निरंतर सामाजिक-राजनैतिक संदर्भ की रोशनी में विकसित हुई है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रंजन गोगोई ने गुरुवार को यहां रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में ‘दो भारत’ के बीच विभाजन और असमानता की स्थिति पर चिंता जताते हुए आह्वान किया कि अब न्यायपालिका के उस ‘संवैधानिक क्षण’ की दरकार है, जो अभी तक लंबित है। उन्होंने कहा कि ‘दो भारत’ की मौजूदगी के कारण देश में जो असमानता आई, वह सामने दिख रही है। व्याख्यान में न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि एक भारत ऐसा है जो इसे एक नई व्यवस्था के रूप में मानता है। और एक दूसरा भारत (इंडिया) ऐसा है जो बेतुके ढंग से खींची गई गरीबी की रेखा के नीचे जिंदगी बसर करता है। वह दिहाड़ी मजूरी कर पेट पालता है और रैनबसेरों में आसरा लेने को बाध्य है। उसके पास तालीम और सेहत की देखभाल की सुविधा नहीं है। उसके लिए विधि अदालतें ही उम्मीद की किरण हैं। रामनाथ गोयनका स्मारक व्यख्यानमाला की शुरुआत मार्च 2016 में हुई थी। इंडियन एक्सप्रेस के संस्थापक रामनाथ गोयनका के निधन के 25 साल पूरे होने पर यह व्याख्यान माला शुरू की गई थी।

गौरतलब है कि इस साल के शुरू में न्यायमूर्ति गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के अन्य तीन न्यायधीशों – जे चेलमेश्वर (रिटायर), मदन बी लोकुर और कुरियन जोसफ के साथ एक अभूतपूर्व संवाददाता सम्मेलन किया था। इसमें इन जजों ने प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नाम लिखा एक पत्र सार्वजनिक किया था। पत्र में इन्होंने अदालत से जुडेÞ विभिन्न मसलों पर सवाल उठाया था। इसमें केसों के आबंटन का मामला खास था। न्यायमूर्ति गोगोई का कहना था कि यह एक तरह से देश का ऋण चुकाना था, जो हमने किया। गुरुवार को ‘इंसाफ की दृष्टि’ विषय पर विभिन्न फैसलों का हवाला देकर अपनी बात रखते हुए न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि इन फैसलों में साफ शब्दों के अलावा यह इंगित किया गया है कि सामाजिक नैतिकता अस्थिर है, और इतना ही नहीं, संवैधानिक नैतिकता को, अपनी शर्तें तय करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संवैधानिक नैतिकता का यह अभिप्राय दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के मामले में, और इस हफ्ते धारा 377 के मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान देखने को मिला।

न्यायमूर्ति गोगोई ने इस बात को रेखांकित किया कि न्यायपालिका के उल्लेख के साथ संवैधानिक इतिहास यह दिखाएगा कि उसकी भूमिका निरंतर सामाजिक-राजनैतिक संदर्भ की रोशनी में विकसित हुई है। उन्होंने कहा कि अगर 1970-1980 के दशक में आधारभूत संरचना सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ था तो 1980 के दशक में इसने लगाातर अनुच्छेद-21 के दायरे का विस्तार किया। इसके बाद 1990 के दशक में यह ‘बेहतर संचालन अदालत’ के रूप में देखने को मिला। संवैधानिक प्रावधानों की नए सिरे से व्याख्या के कारण ऐसा हुआ।

उन्होंने आगे कहा कि हमारी आजादी के बाद पचास सालों में, अदालतों ने बहुत ही संजीदा न्यायप्रणाली को तैयार किया है, जिसका हमें निरंतर लाभ उठाना चाहिए। लेकिन असल में यह जड़ता है, जिसने अभी तक हमें रोक रखा है। लेकिन आज जो चीजे सामने हैं, उसमें अदालती प्रक्रियाएं मुकदमे की तरह हैं, जो वाद के पहले ही शुरू हो जाते हैं। हालांकि मैं कह नहीं सकता कि यह हमारी तरफ से सामूहिक नाकामी है, बल्कि यह विधि के शासन से संचालित राष्ट्र के लिए नाकामी है। क्या यह चिंता की बात नहीं है कि हम समावेशी विचार की अवज्ञा कर रहे हैं। न्यायमूर्ति गोगोई ने कहा कि इस संस्था को आम आदमी के लिए सेवायोग्य और राष्ट्र के लिए प्रासंगिक बनाने के लिए, और जमीनी चुनौतियों का सामना करने के लिए किसी सुधार की ही नहीं, क्रांति की जरूरत है।

अंत में, अपने व्याख्यान में न्यायमूर्ति गोगोई ने रामनाथ गोयनका के इस विचार से सहमति जताई कि उग्र स्वतंत्रता ‘न्याय की आधारशिला’ है। उन्होंने कहा कि इस विचार के साथ ही मैं जोड़ना चाहता हूं कि ‘आजादी’ को स्थापित संवैधानिक मूल्यों का उचित सम्मान करते हुए हमेशा जिम्मेदारी दिखानी चाहिए। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने प्रथम रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान दिया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मई 2017 में द्वितीय व्याख्यान दिया था।

 

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