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कैराना में जाट और दलित तय करेंगे चुनावी नतीजे

उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव का नतीजा जाट और दलित मतदाताओं के रुख से तय होगा। फिलहाल दोनों ही तबकों में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रति नाराजगी का भाव दिख रहा है।

Author नई दिल्ली | May 14, 2018 05:37 am
प्रतीकात्मक चित्र

उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव का नतीजा जाट और दलित मतदाताओं के रुख से तय होगा। फिलहाल दोनों ही तबकों में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रति नाराजगी का भाव दिख रहा है। विपक्ष की एकजुटता और सपा-बसपा के बजाय अजित सिंह की पार्टी के उम्मीदवार की मौजूदगी ने भाजपा की बेचैनी बढ़ा रखी है। दो दिन पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री और मुजफ्फरनगर के जाट भाजपा सांसद संजीव बालियान शामली के पास करमूखेड़ी गांव में प्रचार के लिए गए तो जाटों के तीखे सवालों का सामना नहीं कर पाए।

भाजपा ने कैराना में अपने दिवंगत सांसद हुकुम सिंह गुर्जर की बेटी मृगांका को उम्मीदवार बनाया है। उनके मुकाबले विपक्ष की तरफ से रालोद की तबस्सुम बेगम हैं जिन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार की हैसियत से भाजपा के हुकुम सिंह को हराया था। इसके बाद पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में तबस्सुम के बेटे ने सपा उम्मीदवार की हैसियत से मृगांका को मात दी थी। दरअसल तबस्सुम के पति मुनव्वर हसन भी इस सीट से 1996 में लोकसभा चुनाव जीते थे। उनका 2008 में सड़क दुर्घटना में 44 साल की उम्र में निधन हो गया था। मुनव्वर उत्तर प्रदेश के इकलौते नेता हैं जो इतनी कम आयु में ही संसद और विधानमंडल के दोनों सदनों में सदस्य रहे।

जहां तक 2014 का सवाल है, तब भी भाजपा के हुकुम सिंह को पचास फीसद वोट ही मिल पाए थे। बहुकोणीय मुकाबले और कैराना से हिंदुओं के पलायन के प्रचार से हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने उनकी राह आसान बना दी थी। पर अब हालात बदले हुए लग रहे हैं। भाजपा के जाट सांसद बालियान से किसानों ने पूछा कि मोदी सरकार ने जाटों को ओबीसी आरक्षण देने का वादा पूरा क्यों नहीं किया? गन्ना किसानों का भुगतान क्यों नहीं हो रहा? कर्ज माफी के नाम पर उनके साथ मजाक क्यों किया गया? अजित सिंह को कमजोर करने से बिरादरी को क्या मिला? बालियान ने इन सवालों के जवाब देने के बजाए वहां से खिसकने में ही भलाई समझी।

उधर, अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का मुद्दा बना कर लड़ रहे हैं। वे इस उपचुनाव को जाटों और मुसलमानों की एकता की बहाली का अवसर बता रहे हैं। 2013 में हुए सांप्रदायिक फसादों के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों और मुसलमानों में मनमुटाव बढ़ गया था। उसी का भाजपा को पहले लोकसभा और फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में फायदा मिला। कैराना में जाट मतदाता करीब पौने दो लाख और दलित करीब दो लाख हैं। भाजपाई डरे हैं कि अगर आधे जाट भी जयंत के प्रभाव में तबस्सुम के साथ चले गए तो कैराना में भी गोरखपुर और फूलपुर जैसे नतीजे की आशंका को टाला नहीं जा सकेगा।

भाजपा ने अपने सभी चौदह जाट विधायकों को कैराना में झोंक दिया है। हार के डर से पार्टी के संगठन मंत्री सुनील बंसल बार-बार भ्रमण कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र पांडेय एक दौरा कर चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सभाएं भी प्रस्तावित हैं। पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशें अभी तक तो बेअसर ही हैं। रही दलितों की बात तो बसपा के समर्थन और भाजपा के प्रति उनकी नाराजगी से भी मृगांका को मुश्किल हो रही है। सहारनपुर के भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर उर्फ रावण व मेरठ के पूर्व बसपा विधायक योगेश वर्मा के खिलाफ रासुका के तहत कार्रवाई से दलित बेहद नाराज हैं। बची-खुची कसर सहारनपुर में दलित नेता की राजपूतों द्वारा हत्या की घटना ने पूरी कर दी है। इससे भाजपा के हिंदुत्व के एजंडे की धार भोथरी हुई है।

बिजनौर जिले की नूरपुर सीट पर भी समूच विपक्ष की तरफ सपा के उम्मीदवार और भाजपा की अवनी चौहान के बीच मुकाबला है। अवनी के पति लोकेंद्र चौहान पिछले साल बहुकोणीय मुकाबले में विजयी हुए थे। सड़क दुर्घटना में उनकी मौत की वजह से यहां उपचुनाव हो रहा है। नूरपुर को लेकर सपा के नेता निश्चिंत नजर आ रहे हैं। भाजपा को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सहानुभूति वोट का आसरा है। दोनों जगह एक चर्चा तेजी से फैली है कि भाजपा ने जानबूझ कर उपचुनाव की तारीख 28 मई तय कराई है ताकि रमजान के चलते मुसलमान ज्यादा तादाद में मतदान न कर पाएं। कैराना का दौरा कर लौटे मेरठ के सपा विधायक रफीक अंसारी और जिला अध्यक्ष राजपाल सिंह ने दावा किया कि भाजपा कोई भी हथकंडा अपना ले, दोनों जगह उसे हार का ही मुंह देखना पड़ेगा। आंकड़ा उसके खिलाफ है और लोगों में केंद्र व राज्य दोनों सरकारों के प्रति गुस्सा भी है।

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