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बिल्डरों सा बर्ताव कर रही सरकार

लोगों के सपने पूरे करने के नाम पर केंद्र सरकार जो दिल्ली के लोगों के साथ कर रही है, उसे सीधे शब्दों में जालसाजी ही कहा जा सकता है। 29 अक्तूबर, 2019 को भारत सरकार का राजपत्र निकलता है जिसमें 1731 कॉलोनियों को नियमित करने की बात होती है।

पीएम मोदी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल।

अरविंदर सिंह लवली

विधानसभा चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार और अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली दिल्ली सरकार दोनों में अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का श्रेय अपने नाम लेने की होड़ है। केंद्र सरकार ने 1731 कॉलोनियों को नियमित करने और उसके पंजीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अपना घर किसी की जिंदगी का सबसे बड़ा सपना होता है। दुखद है कि केंद्र और केजरीवाल सरकार जनता को धोखे में रख रही हैं। इतिहास में पहली बार केंद्र सरकार अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने के लिए संसद में बिल लेकर आई, जो एक गैरजरूरी कवायद थी। पांच साल इस पूरे मुद्दे पर निष्क्रिय रहने के बाद केंद्र की नींद अचानक टूटी।

कांग्रेस की खड़ी की गई बुलंद बुनियाद पर कब्जा जमाने की होड़ में भाजपा और आम आदमी पार्टी यह भी ध्यान नहीं रख रही हैं कि चुनावी जीत की हड़बड़ी आगे आने वाली कितनी पीढ़ियों के लिए गड़बड़ी का सबब बनेगी। मकानों के मालिकाना हक के पेच ऐसे उलझेंगे कि मोहल्ले के लोग आपसी झगड़े-फसाद और कचहरियों में उलझे रहेंगे। कांग्रेस इन पर आरोप लगा रही थी कि हमने नियमित करने की प्रक्रिया पूरी की, अधिसूचना जारी हुई लेकिन जमीनों का पंजीकरण क्यों नहीं शुरू हुआ। इसलिए दोनों दलों ने पंजीकरण को ही मूल समस्या समझ लिया है। पंजीकरण कई सारे विषयों में से सिर्फ एक विषय है यह दोनों दलों की समझ से परे है।

इससे पहले 1971, 1977 और 1989 में कॉलोनियों को नियमित करने की प्रक्रिया हुई है और तीनों बार कैबिनेट नोट से ही हुई। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय में नियमित हुई कॉलोनियां शहरी नियोजन के हिसाब से बेहतरीन हैं। मनमोहन सिंह की अगुआई में 2007 में 2020 का मास्टरप्लान लाया गया था। तब 895 कॉलोनियों की अधिसूचना जारी की गई थी। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने अनधिकृत कॉलोनियों से जुड़े सभी अधिकार शहरी विकास मंत्रालय और राजस्व विभाग को सौंप दिए थे। केंद्र ने तब इसके लिए बाकायदा खाका तैयार किया था। सारे अधिकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली को दिए थे और उसे इसकी परिधि तय करने को कहा गया था।

यह परिधि दिल्ली सरकार को ही तय करनी थी कि कौन सी कॉलोनी किस जमीन पर बनी हुई है। यहां पर तो सबसे पहला सवाल अरविंद केजरीवाल की दोहरी बातों पर उठता है। केजरीवाल राज्य की शक्तियों को मजबूत करने की बात कह केंद्र पर काम नहीं करने का आरोप लगाते रहते हैं। लेकिन यहां पर तो जो शक्ति उनके हाथ में थी उसका भी समर्पण केंद्र को कर आए। कांग्रसे कॉलोनी पक्की करने की प्रक्रिया लगभग पूरी कर चुकी थी तो वे इस प्रक्रिया को दोबार शुरू कर 2015 में फिर से केंद्र के पास गए। इसके पहले 49 दिनों की सरकार में शहरी विकास मंत्रालय के सचिव ने आदेश जारी किया था कि कॉलोनियों की परिधि दिल्ली सरकार को बनानी है। अगर वो राज्य की शक्तियों और जनता की सुविधाओं को लेकर फिक्रमंद थे तो अपने इसी कदम के खिलाफ क्यों चले गए इस सवाल का जवाब तो उन्हें दिल्ली की जनता को देना होगा।

अवैध कॉलोनियों की समस्या बहुस्तरीय है, जिसमें तीन तरह की जमीनें हैं। पहली तो किसानों की जमीन है जो उन्होंने किसी को बेची और उस पर मकान बने। दूसरी निजी जमीन पर बने मकान हैं, तीसरी सरकारी जमीन पर बसी कॉलोनियां हैं। गौरतलब है कि दिल्ली में 70 फीसद मकान निजी जमीन पर हैं जिनका मालिकाना हक लोगों के पास है। लेकिन जो मकान सरकारी जमीन पर बने हैं उनके कागज कैसे पेश किए जाएंगे। कॉलोनियों को पक्का करने में प्रशासनिक स्तर पर भी मुश्किलें बढ़ा दी गई हैं। पहले तो नगर निगम, अनुमंडल अधिकारी (एसडीएम) और पुलिस से ही गुजरना पड़ता था। अब इनके सामने दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) की जांच का पहाड़ भी खड़ा है। डीडीए भी उप-पंजीकार के पास ही जाएगा। विरोधाभास की बात करें तो केंद्र सरकार के मंत्री ने कहा कि कॉलोनी की परिधि तय करने का काम 31 दिसंबर तक पूरा होगा। जब कॉलोनियों की परिधि ही तय नहीं हुई है तो फिर उसके एक महीने पहले से जमीनों का पंजीकरण कैसे शुरू होगा? ऐसी अनियमितता तो दुनिया में कहीं नहीं होती है।

इन कॉलोनियों के मकानों पर नंबर रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने डाले हैं। तो जब तक कॉलोनी का खाका तैयार नहीं होगा तब तक भवन उपनियम कैसे बनेंगे और पंजीकरण कैसे होगा? इन सब प्रक्रिया में चुनाव निकल जाएगा और जनता के हिस्से सिर्फ मायूसी आएगी। अवैध कॉलोनियों को लेकर इस सरकार की नीयत और नीति दोनों के विश्लेषण की जरूरत है। वही मंत्री है, वही विभाग है लेकिन अब तकरीरों में फर्क है। सरकारी जमीन पर ये सुप्रीम कोर्ट में दूसरा रुख लेते हैं और जनता के सामने दूसरी बात कहते हैं। सरकार का यह कदम छलावा भर है और जनता को छलने में भाजपा ने अपना इतिहास रचा है। पहले एसडी शौरी ने अदालत में इसके खिलाफ याचिका लगाई थी और भाजपा ने उन्हें इसके लिए पुरस्कृत भी किया था।

लोगों के सपने पूरे करने के नाम पर केंद्र सरकार जो दिल्ली के लोगों के साथ कर रही है, उसे सीधे शब्दों में जालसाजी ही कहा जा सकता है। 29 अक्तूबर, 2019 को भारत सरकार का राजपत्र निकलता है जिसमें 1731 कॉलोनियों को नियमित करने की बात होती है। यह आम लोगों के बीच उम्मीद की रोशनी लाता है। लेकिन इसी में सेक्शन 7-ए के तहत निषिद्ध भूमि की सूची डाली गई है, जिसके बारे में लोगों को अंधेरे में रखा गया है। यानी आरक्षित अथवा अधिसूचित वनों में आने वाली भूमि, प्राचीन स्मारकों अ‍ैर पुरातत्त्व स्थलों और अवशेष अधिनियम, 1958 (1958 का 24) द्वारा संरक्षित अथवा निषिद्ध क्षेत्र के रूप में निर्धारित की गई भूमि, जोन-ओ में आने वाली भूमि, यमुना बाढ़ के मैदानों, मौजूदा सड़कों और मुख्य योजना सड़कों के मार्ग में आने वाली भूमि, हाई टेंशन लाइनों के मार्ग में आने वाली भूमि, दिल्ली के रिज क्षेत्र में आने वाली भूमि और वर्तमान समय में किसी भी अन्य कानून के अंतर्गत आरक्षित अथवा संरक्षित भूमि का इसमें जिक्र है। खंड सात-ए के तहत उल्लेखित इन जमीनों पर बनी कालोनियों को नियमित नहीं किया जाएगा।

दिल्ली में बदरपुर विधानसभा क्षेत्र, ओखला, शास्त्री पार्क, मुस्ताबाद, करावल नगर, बुराड़ी जैसी लगभग 200 कॉलोनियां ओ-जोन में आती हैं, लेकिन इनका नाम उन 1731 कॉलोनियों की सूची में है जिन्हें नियमित किया जाना है। इसी तरह संगम विहार, देवली, आंबेडकर नगर, छतरपुर जैसे इलाकों में लगभग 150 कॉलोनियां ऐसी हैं जो जंगल की जमीन पर बनी हैं। महरौली जैसी लगभग 70 कॉलोनियां प्राचीन स्मारकों अ‍ैर पुरातत्त्व स्थलों और अवशेष अधिनियम के दायरे में आ जाती हैं। पश्चिमी दिल्ली में मोहन गार्डन, मटियामहल, नजफगढ़, नांगली आदि विधानसभा में लगभग 150 से 200 कॉलोनियां हाई टेंशन तार के नीचे आनी वाली जमीनों पर बसी हैं। रिज और अन्य क्षेत्रों में भी लगभग 200 कॉलोनियां हैं। इससे साफ है कि सेक्शन 7-ए के तहत लगभग 40 से 45 फीसद कॉलोनियां नियमित नहीं होने वाली हैं। मेरी अपील है कि केंद्र सरकार के मंत्री जनता को जागरूक करें कि कौन सी कॉलोनियां नियमित नहीं होने वाली हैं।

अनियमित कॉलोनियों पर केंद्र की गड़बड़ी राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में ही दिख गई। नियमित होने वाली 1731 कॉलोनियों में पहला नाम लद्दाख बुद्ध विहार का आता है जो ओ-जोन में यानी नदी के बाढ़ क्षेत्र में आती है। फिर यह कॉलोनी पक्की होने की सूची में कैसे है? चुनाव के लिए जनता को भरमाने में सरकार ने पूरी तरह से आंख बंद कर काम किया है और एक तुगलकी फरमान जारी कर दिया है। सबसे अहम बात कि इस पूरी प्रक्रिया में कॉलोनियों के भागीदारों को शामिल नहीं किया गया है। कॉलोनियों के नियमित करने में सरकार निजी बिल्डरों की तरह का व्यवहार कर रही है जिसकी ‘छुपी शर्त’ आम लोग देख नहीं पाते हैं और ठगे जाते हैं। कॉलोनी की परिधि तय होने, खाका बनने और मकानों में नंबर डालने की प्रक्रिया में कम से कम छह महीने लगेंगे। विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही कॉलोनियों का नियमितीकरण ठंडे बस्ते में चला जाएगा और आम जनता ठगी सी खड़ी रह जाएगी।

(लेखक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहने के साथ दिल्ली सरकार में शहरी विकास मंत्री का पद संभाल चुके हैं।)

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