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ठिठुरती दिल्ली को मिली किताबों की धूप

लुढ़के पारे के बाद भी शनिवार दोपहर तक दिल्लीवाले प्रगति मैदान को बता चुके थे कि वह बहुत बड़ा नहीं है। कड़ाके की ठंड को किताबों की गर्मी मात दे चुकी थी।

Author नई दिल्ली | January 7, 2018 2:12 AM
स योजना में दान के तहत चार लाख किताबें जरूरतमंद लोगों के हाथों तक पहुंचाई जा चुकी हैं।

लुढ़के पारे के बाद भी शनिवार दोपहर तक दिल्लीवाले प्रगति मैदान को बता चुके थे कि वह बहुत बड़ा नहीं है। कड़ाके की ठंड को किताबों की गर्मी मात दे चुकी थी। पर्यावरणविद् सुनीता नारायण, भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत तोमास्ज कोजलोस्की, नेशनल बुक ट्रस्ट के प्रमुख बल्देव भाई शर्मा और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त सचिव मधु रंजन कुमार ने नौ दिन चलने वाले इस वार्षिक मेले को लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों के सुपुर्द किया।  राष्टÑीय पुस्तक न्यास के निदेशक बल्देव भाई शर्मा ने कहा कि भारत में कुंभ की परंपरा 12 साल पर है,  लेकिन पुस्तकों का महाकुंभ हर साल होता है जहां ज्ञान के संगम में डुबकी लगाई जाती है। लेखकों और पाठकों का यह मिलनस्थल एक उत्सव की तरह है। शर्मा ने कहा कि न्यास ने ‘हर हाथ एक किताब’ की योजना शुरू की है। इस योजना में दान के तहत चार लाख किताबें जरूरतमंद लोगों के हाथों तक पहुंचाई जा चुकी हैं।
‘पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन’ की थीम वाले मेले में पर्यावरण विशेषज्ञ सुनीता नारायण ने कहा कि पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की बात आती है तो आज कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आज दिल्ली की हवा इतनी जहरीली है कि हर सांस में जहर है। नारायण ने कहा कि आमतौर पर प्रचारित किया जाता है कि भारत में जलवायु परिवर्तन की समझ नहीं है। लेकिन जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव भारत पर पड़ रहा है। हम बहुत ज्यादा गर्मी, बहुत ज्यादा बरसात और बहुत ज्यादा सर्दी झेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत में असल वित्त मंत्री तो मानसून ही है। मानसून में हो रहे बदलावों का सबसे बुरा असर किसानों और हाशिए पर पड़े लोगों पर होता है।

मेले में अतिथि देश यूरोपीय संघ के राजदूत टोमाश कोजलौस्की ने कहा कि मुझे यह देख कर बहुत खुशी हुई कि उद्घाटन सत्र में ढेर सारे स्कूली बच्चे हैं। पुस्तक मेला आम लोगों के लिए ही होता है। यूरोप और भारत की समृद्ध साहित्यिक परंपरा रही है। भारत किताबों का भी बड़ा बाजार है। भारत और यूरोपीय संघ के रिश्ते सिर्फ राजनीति और आर्थिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी हैं। यूनान की लेखिका और साहित्य के लिए 2017 की यूरोपीय संघ पुरस्कार विजेता कल्लिया पापादाकी ने भी अपनी बात रखी।एनबीटी ने महिला लेखन प्रोत्साहन योजना शुरू की है। इसके तहत उद्घाटन सत्र में तीन पुस्तकों कौशल पंवार की ‘जोहड़ी’, इंदिरा दांगी की ‘रानी कमलापति’ और यशस्विनी पांडे की ‘य से यशस्विनी य से यात्रा’ का लोकार्पण हुआ। इसके साथ ही पर्यावरण की थीम वाले कैलेंडर का भी लोकार्पण किया गया।

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने वीडियो कांफ्रेंस के जरिए कहा कि जलवायु परिवर्तन को लेकर जागरूकता फैलाना जरूरी है क्योंकि इंसान ने धरती का दोहन सीमा से ज्यादा किया है। उन्होंने कहा, ‘हमने इस धरती से जरूरत से ज्यादा लिया है। समय आ गया है कि हम जागरूकता के महत्त्व को समझें और ऐसा बिजली की बर्बादी न करने, सफर के लिए साइकिल का इस्तेमाल करने या पेट्रोल और डीजल से चलने वाली गाड़ियों के बजाए ज्यादा पैदल चलने जैसे सामूहिक प्रयासों के बिना संभव नहीं होगा’।
विश्व पुस्तक मेला 14 जनवरी तक चलेगा। इसमें देशभर के 800 से ज्यादा प्रकाशक हिस्सा ले रहे हैं। यूरोपीय संघ के 20 से ज्यादा देश अपने प्रकाशकों, संपादकों और लेखकों के एकप्रतिनिधिमंडल के साथ मेले में हिस्सा ले रहे हैं। यूरोपीय संघ के देशों के अलावा कनाडा, चीन, मिस्र, पाकिस्तान और ब्रिटेन जैसे 40 से ज्यादा देश इसमें हिस्सा लेंगे।
ठिठुरती दिल्ली को मिली किताबों की धूप

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