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आप: कमजोर हो चुकी पार्टी पर बगावत का संकट, बिखराव रुकने के संकेत नहीं

एक के बाद एक कई चुनावों में पार्टी की हार से पार्टी पहले से ही बेहद कमजोर हो चुकी थी, वहीं पूर्व मंत्री कपिल मिश्र के एक के बाद एक खुलासे ने केजरीवाल की नींद उड़ा दी है।

Author नई दिल्ली | June 8, 2017 3:15 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (File Photo)

चौतफा संकट से घिरे आम आदमी पार्टी (आप) के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने ही बुने जाल में लगातार फंसते जा रहे हैं। एक के बाद एक कई चुनावों में पार्टी की हार से पार्टी पहले से ही बेहद कमजोर हो चुकी थी, वहीं पूर्व मंत्री कपिल मिश्र के एक के बाद एक खुलासे ने केजरीवाल की नींद उड़ा दी है। दूसरी तरफ पिछले साल आठ अगस्त को आए हाई कोर्ट के फैसले ने सरकार के पर कतर दिए। अफसरशाही पहले से ही केजरीवाल की टीम से नाराज चल रही है, उसे हाई कोर्ट के फैसले ने आप सरकार को टरकाने का मौका दिया। अब पार्टी के विवाद और बेहद करीबी रहे पूर्व मंत्री के खुलासे के बाद अफसरों ने सरकार को गंभीरता से लेना कम कर दिया है। दिल्ली में नगर निगम चुनावों के बाद फिर से दिल्ली से बाहर न जाने के दावे को आप ने फिर पलट दिया है। रविवार की देर रात पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारणी ने दस जून को किसानों के मुद्दे पर देश भर में आंदोलन चलाने का फैसला लिया है। इससे पहले भी केजरीवाल बार-बार अपने बयान को बदलने का अनोखा रिकार्ड बना चुके हैं।

2012 में अण्णा हजारे की अगुआई में ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन मूवमेंट’ के साख अरविंद केजरीवाल का उदय हुआ था। अण्णा के मना करने पर भी पार्टी बना कर 2013 के विधानसभा चुनाव लड़कर आप ने दिल्ली विधानसभा की 28 सीटें जीतीं। किसी को न समर्थन देने और किसी का समर्थन न लेने के वायदे से उलट उन्होंने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई और 49 दिन में सरकार छोड़ कर चले गए। अपने इस्तीफे पर उन्होंने माफी मांग कर 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा। देश भर में भारी पराजय के बाद आप में भारी कलह मचा। उनका आरोप था कि योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण आदि के दबाव में वे दिल्ली छोड़ कर देश भर में चुनाव लड़ने लगे। उन नेताओं से लड़ाई का अंत 2015 में दिल्ली की सत्ता मिलने के बाद उन्हें पार्टी से बाहर करके मिला। जिस केजरीवाल को लोकसभा चुनाव की हार के बाद बगावत रोकने के लिए बेवजह जेल जाना पड़ा, उन्हीं को दिल्ली की जनता ने 70 में से 67 सीटें दे दी। रामलीला मैदान में शपथ लेते समय उन्होंने दिल्ली से बाहर न जाने की घोषणा की और देश भर में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली की जनता से माफी मांगी। लेकिन दूसरे ही दिन से पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी।

विरोध करने या पूरी तरह से हां में हां न मिलाने वालों को पार्टी से बाहर करने का सिलसिला जीत के गुरूर में चलता रहा। एक के बाद एक करके दिल्ली, पंजाब और देश के दूसरे हिस्से के नेता आप से अलग होते गए। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के पुराने साथी कुमार विश्वास पिछले काफी दिनों से पार्टी में अलग-थलग हो गए थे। पंजाब चुनाव की हार ने बगावत के लिए जमीन तैयार की और निगम चुनाव की पराजय ने हवा दी। कुमार विश्वास जैसे नेताओं ने पार्टी फैसले पर सवाल उठाया। लेकिन बड़ा हंगामा शुरू हुआ पूर्व मंत्री कपिल मिश्र के आरोपों से। कपिल मिश्र मंत्रिमंडल से हटाए जाने तक या यूं कहें कि केजरीवाल से अपने एक सहयोगी से दो करोड़ रुपए लेने के आरोप लगाने तक तो केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के बेहद करीबी रहे। उन्होंने न तो सालों आप की ओर से भाजपा के खिलाफ बैटिंग की बल्कि हर काम में वे कम उम्र के होने के बावजूद सबसे आगे रहते थे। इसलिए वे सरकार की हर बात बारिकी से जानते हैं। दो करोड़ रूपए रिश्वत के अलावा, रिश्तेदारों को गैरकानूनी लाभ पहुंचाने से लेकर चंदे के पैसे से विदेश यात्राओं और उन यात्राओं के एजंडे ने उनके विश्वास को तोड़ दिया है। पूरा ब्यौरा वे आम जन को साझा करने के बजाए उपराज्यपाल, एसीबी (भ्रष्टाचार निरोधक शाखा), सीबीआइ को दिया। उस पर कार्रवाई शुरू हुई है।

यह संकट इसलिए भी बड़ा है कि जिस अरविंद केजरीवाल के नाम पर वोट मिलते हैं, उनके नाम पर ही पार्टी काम करती है, वही भ्रष्टाचार के आरोप में घिर गया है। कपिल मिश्र ने अब तक जो खुलासे किए हैं उसमें पार्टी नेता कुमार विश्वास ही नहीं उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर कोई बड़ा आरोप नहीं लगाया जा रहा है। यह भी साफ होता जा रहा है कि केजरीवाल के करीबी लोगों में भले ही बड़े-बड़े नाम लिए जाते हों लेकिन मनीष सिसोदिया के बाद सबसे करीबी सत्येंद्र जैन और जितेंद्र तोमर हैं। तभी तो यह सवाल है कि भ्रष्टाचार के पार्टी के ही स्टींग से एक मंत्री असीम अहमद खान और संदीप कुमार को मंत्रिमंडल से हटाया गया। दूसरी तरफ पहले जितेंद्र सिंह तोमर और बाद में सत्येंद्र जैन का हर संभव बचाव क्यों किया गया। तोमर तब हटे जब अदालत ने उन्हें जेल भेजना तय किया, फिर भी उनको पार्टी से नहीं हटाया गया। सत्येंद्र जैन के मामले में तो पार्टी ने सारी सीमा लांघ दी। चाहे उनकी बेटी और रिश्तेदार की नियम के खिलाफ नियुक्त हो या हवाला का मामला, सीबीआइ के छापे में न केवल उनका बचाव किया गया बल्कि हर बार उनके विभागों में बढ़ोतरी की गई। अब फिर से सीबीआइ ने सत्येंद्र जैन पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

जो केजरीवाल हर मुद्दे पर बोलते थे उन्होंने पूरे प्रकरण पर एक तरह से चुप्पी लगा ली है।कपिल मिश्र राजनीति में नए हैं अन्यथा जितनी जानकारी केजरीवाल के करीबियों के बारे में उन्होंने सार्वजनिक की, उतने में सरकार गिर जाती। फिर भी उन आरोपों ने अरविंद केजरीवाल के ईमानदार होने के दावे को खंडित तो कर ही दिया है। सत्येंद्र जैन पर और कार्रवाई के बाद पार्टी की हालत ज्यादा खराब होने वाली है। मुद्दों से ध्यान भटकाने में माहिर और अपना एजंडा खुद तय करने में माहिर माने जाने वाले केजरीवाल बुरी तरह से फंसते जा रहे हैं। अब न तो वे हर मामले में प्रधानमंत्री को कोसते हैं और न ही हर रोज उपराज्यपाल से लड़ने के मुद्दे खोजते हैं। उपराज्यपाल के खिलाफ जो भी आरोप वे या उनके लोग लगाते हैं उसका दूसरे ही दिन खंडन हो जाता है। अपने ही एक साथी वेद प्रकाश के इस्तीफे से खाली सीट पर उपचुनाव की तैयारी शुरू करते हुए किसानों के मुद्दों को याद किया तो दूसरे ही दिन पार्टी ने देश भर में किसानों के मुद्दे पर आंदोलन शुरू करना तय कर लिया। जो हालात हैं उसमें आप के बिखराव रुकने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं।

 

 

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