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…तो मुसलमानों की हत्या क्या उनके धर्म का हिस्सा है?

ताहिर कहते हैं कि बौद्धों ये पसंद नहीं था कि बकरीद पर बकरे की कुर्बानी दी जाए और मांसाहार किया जाए लेकिन यह सब इसलाम का हिस्सा है।

Author नई दिल्ली | October 5, 2017 3:47 AM
खाने के लिए इंतजार करता रोहिंग्या बच्चा (फोटो-रायटर, 23 सितंबर)

सुमन केशव सिंह

शाहीन बाग, श्रम विहार मेट्रो स्टेशन के पीछे जहां कचरा डाला जाता है, वहां रोहिंग्या विस्थापितों की एक छोटी सी बस्ती है, लेकिन राह चलते यह बस्ती किसी को दिखाई नहीं देती। सामने से देखने पर यह कचरा घर से ज्यादा कुछ और नहीं लगाा, लेकिन बस्ती के मुहाने से थोड़ी दूर पहले मिले एक शख्स से पता पूछने के दौरान एक नई जानकारी मिली। शख्स ने बताया कि यहां म्यामां से अवैध रूप से आए लोगों की बस्ती है। उसने बताया कि कच्चे रास्ते पर 300 मीटर अंदर जाने के बाद कुछ झोपड़े दिखेंगे, जो राहिंग्या विस्थापितों के ही हैं। यह बस्ती कालिंदी कुंज के जकात फाउंडेशन की देखरेख में चलाई जा रही बस्ती से बिल्कुल अलग थी।

इस बस्ती तक पहुंचने के लिए कचरे वाले रास्ते पर चलते हुए हमारी मुलाकात मोहम्मद ताहिर और मोहम्मद इस्माइल से हुई। ये भी रोहिंग्या विस्थापित हैं। दोपहर में पसीने से तरबतर वो कहीं से भागे आ रहे थे। ताहिर और इस्माइल के साथ ही आगे हम उसकी बस्ती की ओर बढ़े। जब हम उनके घर के पास पहुंचे तो दस्तावेजों का एक बड़ा सा बंडल हमारे सामने रखा और बताया कि पुलिस हमारी पहचान करा रही है। सारे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। कुछ नए दस्तावेज बनाने हैं। इसलिए पुरानों की फोटो कॉपी करवा कर जमा करने जाना है। सभी दस्तावेजों की फिर से जांच होगी। उन्होंने बताया कि इस तरह की जांच अक्सर होती रहती है। ऐसा ही बंडल मोहम्मद इस्माइल के हाथ में भी। मोहम्मद ताहिर की उम्र करीब 60 साल थी।हमने पूछा कि क्या आप यहां वैधानिक रूप से रह रहे हैं ताहिर ने कहा ‘जी साब हमारे पास यूएन का वीजा है लेकिन हमको सरकार की ओर से कोई मदद या सहूलियत नहीं मिलती है।’ हम किराए के झोपड़े में रहते हैं 500 रुपए किराया अदा करते हैं। इस बस्ती का हर वासिंदा सिर पर छत के लिए पांच सौ रुपए देता है और जीवन चलाने के लिए 350 रूपए रोज की मजदूरी करता है।

कुछ ऐसे शुरू हुआ कत्लेआम का दौर

ताहिर ने बताया वह म्यांमार के बुशीदांग थाने के लावाडग गांव के विस्थापित हुए लोग हैं। मुसलमानों के नेता अब्दुल रजाक की मौत के बाद म्यांमार से अपनी जान बचा कर भागने पर मजबूर हुए। उनके अनुसार रकाइन उनका देश है। जहां से कत्लेआम कर भगाने से पहले एक बौद्ध महिला की गलाकाट कर हत्या कर दी गई। इल्जाम रोहिंग्या मुसलमानों पर लगाया गया। जिसके बाद मुसलमानों के खिलाफ पूरे बर्मा नफरत फैला दी गई। बौद्धों ने हमे नरभक्क्षी बताया, कहा ये मांस खाते हैं। ताहिर कहते हैं कि बौद्धों ये पसंद नहीं था कि बकरीद पर बकरे की कुर्बानी दी जाए और मांसाहार किया जाए लेकिन यह सब इसलाम का हिस्सा है। हम अपनी मान्यताओं के अनुसार त्योहार मनाना चाहते हैं। बौद्ध खुद को शाकाहारी और अहिंसा का देश बताते हैं धार्मिक देश बताते हैं लेकिन उन्होंने दस लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। ताहिर का बौद्धों से सवाल था कि जानवरों का कत्ल उनके धर्म के खिलाफ है तो इतने सारे मुसलमानों की हत्या कौन सा धर्म हैं।

ताहिर ने आगे बताया कि अब्दुल रजाक की मौत के बाद म्यांमार सरकार की ओर एक कार्ड दिया गया। जिसमें यह लिखा था कि इस देश के नागरिग नहीं है। दूसरे देश से आए हैं। रोहिंग्याओं के पास अब अपना कुछ नहीं बचा था। बौद्धों का अत्याचार चरम पर था। ताहिर की पत्नी गुलबहार दरवाजे के पीछे से झांकती हुई सब कुछ सुन रही थीं। उन्होंने कहा, बर्मा में हमारे लिए अब कुछ नहीं बचा था। लेकिन हम हिंदुस्तान का शुक्रिया करते हैं कि उसने हमें जीने की इजाजत तो दे दी। लेकिन गुलबहार के मन में डर और चिंता भी। उन्हें कुछ लोगों ने बताया कि भारत सरकार भी उन्हें यहां से भी बाहर निकालना चाहती है। इसलिए थाने में उनकी पहचान हो रही है। गुलबहार कहती हैं, आगे क्या होगा पता नहीं, लगता है ऐसे ही मर जाएंगे।

 

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