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जेनरिक दवाओं पर फिर छिड़ी बहस, दवा की गुणवत्ता पर अभी भी विवाद

कम गुणवत्ता वाली व सस्ती दवा लेकर उसे महंगे दाम पर री पैकेजिंग के जरिए बेचा जाएगा।

Author नई दिल्ली | April 30, 2017 3:19 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।

मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया (एमसीआइ) ने हाल ही में डॉक्टरों को सिर्फ जेनरिक दवाएं लिखने का आदेश दिया था। इस आदेश से चिकित्सा जगत में एक बार फिर जेनरिक दवाओं पर बहस शुरू हो गई है। डॉक्टरों का कहना है कि इस आदेश से मरीजों व डॉक्टरों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ेंगी क्योंकि कोई ब्रांड न होने पर जो भी दवा सस्ती होगी उसे खरीद कर कोई भी ऊंचे दाम पर बेचने लगेगा। दवा कारगर न होने पर मरीज इसका दोषी डॉक्टर को ठहराएगा, जिससे मारपीट की घटनाएं बढ़ेंगी। डॉक्टरों की राय में सरकार एनपीपीए के जरिए स्टेंट की तरह दवाओं की कीमतें कम कर सकती है। एम्स के एक पूर्व निदेशक का कहना है कि यह आदेश व्यावहारिक नहीं है। जैसे फरीदाबाद में 40 कंपनियां हैं जो दवाएं बनाती हैं। इनकी कीमतों में फर्क है और गुणवत्ता में भी। ऐसे में यह तय कर पाना कि कौन सी दवा लेनी है, मुश्किल होगा। कम गुणवत्ता वाली व सस्ती दवा लेकर उसे महंगे दाम पर री पैकेजिंग के जरिए बेचा जाएगा।

देहली मेडिकल फोरम के डॉ प्रेम अग्रवाल का कहना है कि एमसीआइ के सर्कुलर से भ्रम पैदा हो गया है। ऐसा लग रहा है कि ब्रांड लिखने से डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सरकार परचे में दवा लिखने के मामले में सुधार तो करे, पर जेनरिक दवाएं लिखने के साथ ही ब्रांड लिखने की छूट भी दे, ताकि पता रहे कि मरीज ने क ौन सी दवा ली, तभी उसकी गुणवत्ता को लेकर जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकेगी। सफदरजंग अस्पताल के पूर्व प्रो डॉ केपीएस मलिक ने कहा कि जब देश में जेनरिक दवाएं और गुणवत्तापूर्ण दवाएं हैं ही नहीं, तो इस तरह के आदेश का क्या मतलब है क्योंकि सफदरजंग अस्पताल में चेक करने पर पता चला कि छह में से महज एक दवा जेनरिक है। जब यहां का ऐसा हाल है तो बाकी जगहों का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। केवल जेनरिक दवाएं लिखने से ही मतलब नहीं है, जब तक कि सरकार गुणवत्तापूर्ण दवाएं बना कर पूरे देश में उपलब्ध न कराए। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने मांग की है कि सरकार दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने क ी दिशा में कड़े कानून बनाए, साथ ही इसके निगरानी तंत्र को मजबूत किया जाए।

आइएमए के महासचिव डॉ आरएन टंडन ने कहा कि अगर डॉक्टर जेनरिक नाम लिख भी दे तो दवा विक्रेता उसे दूसरे ब्रांड की महंगी जेनरिक दवा थमा देता है। उन्होंने कहा कि दूसरी चुनौैती यह भी है कि भारत में मिलने वाली जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता की कमी के कारण यहां के लोगों को इन भरोसा भी नहीं है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए बड़ी दवा कंपनियों पर दबाव डाले कि वे देश के लिए गुणवत्तापूर्ण दवाओं की आपूर्ति करें। उन्होंने जेनरिक दवाओं की कीमतों को लेकर हुए एक अध्ययन के हवाले से बताया कि जेनरिक दवाओं में भी एक ब्रांड से दूसरे ब्रांड की कीमतों में 20 फीसद से 1000 फीसद तक का मुनाफा है। ऐसे में डॉक्टर की ओर से केवल जेनरिक दवा लिख भर देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि इसकी कीमतों पर अंकुश लगाने की दरकार है। इसके लिए उन्होंने एनेलियम के तहत दवाएं लाने का सुझाव दिया और कहा कि सरकार जन औषधि केंद्र खोले व जेनरिक दवाओं के विकल्प के तौर पर इन केंद्रों पर लोगों को सस्ती दवाएं मुहैया कराए।

 

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