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पंजाब और गोवा में करारी हार के बाद ही पार्टी में एकजुटता चरमराने लगी थी, पर दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों के बाद विद्रोह सतह पर आ गया।

Author Published on: May 8, 2017 4:15 AM
दिल्ली विधानसभा में मिली करारी हार के बाद अरविंद केजरीवाल ने की अपने विधायकों को मनाने की कोशिश।

आम आदमी पार्टी शुचिता के जिन सपनों के साथ भ्रष्टाचार से लड़ने और वैकल्पिक राजनीति का खाका खींचने का जज्बा लेकर उभरी थी, वही उसमें कहीं खोता चला गया और आज वह बिखराव के कगार पर है। इंडिया अगेन्स्ट करप्शन और आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में रहे और दिल्ली सरकार में जल मंत्री की जिम्मेदारी निभा चुके कपिल मिश्रा ने जिस तरह खुल कर पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं, उससे पार्टी की चूलें हिल गई हैं। हालांकि उनके आरोपों में कितनी सच्चाई है और उनकी नीयत कितनी साफ है, उसकी परीक्षा होनी चाहिए, पर इस घटना से एक बार फिर यह साफ हो गया है कि अब पार्टी और केजरीवाल सरकार के दिन बहुत थोड़े रहे गए हैं। हालांकि पंजाब और गोवा में करारी हार के बाद ही पार्टी में एकजुटता चरमराने लगी थी, पर दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों के बाद विद्रोह सतह पर आ गया। केजरीवाल पार्टी में संतुलन बनाने के प्रयास में किसी को खुश, तो किसी को नाराज करने का समीकरण बिठाने लगे।

पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास पर विधायक अमानतुल्लाह खान ने आरोप लगाया कि वे विधायकों को तोड़ कर भाजपा में ले जाना चाहते हैं। कुमार नाराज हो गए। केजरीवाल ने उनकी मान-मनौवल की और अमानतुल्लाह को बाहर का रास्ता दिखाया। अभी वह मामला शांत भी नहीं हुआ था कि कपिल मिश्रा ने सीधे अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगा दिया कि सरकार में मंत्री सत्येंद्र जैन से उन्हें दो करोड़ रुपए नकद लेते उन्होंने अपनी आंखों से देखा। फिर दूसरा आरोप कि सत्येंद्र जैन ने केजरीवाल के किसी नजदीकी रिश्तेदार के लिए पचास करोड़ रुपए की जमीन का सौदा कराया था। इसके अलावा शीला दीक्षित सरकार के समय हुए करीब चार सौ करोड़ रुपए के जल टैंकर घोटाले की फाइल को दबाने जैसे कई मामलों के आरोप भी लगाए। हालांकि पार्टी इन आरोपों को बेबुनियाद करार दे चुकी है, पर नैतिकता के तकाजे को देखते हुए अरविंद केजरीवाल से सफाई की दरकार बनी हुई है। अभी तक केजरीवाल पर सीधे भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं था, पर अब वे भी नैतिक जवाबदेही के घेरे में हैं।

इन आरोपों में कितनी सच्चाई है और कपिल मिश्रा ने ये आरोप तभी क्यों लगाए जब उन्हें मंत्री पद से हटाया गया, वे अपने पद पर रहते हुए कितने पाक-साफ थे- आदि सवालों पर बहसें होती रहेंगी, पर हकीकत यह है कि आम आदमी पार्टी और उसकी सरकार आज जिस मोड़ पर पहुंच चुकी है, उसके लिए अरविंद केजरीवाल खुद जिम्मेदार हैं। यह बहुत पहले साफ हो चुका था कि पार्टी चलाने, सदस्यों में एकजुटता और जिम्मेदारियों में संतुलन बनाए रखने का हुनर उनमें नहीं है। वे खुद दूसरी पार्टियों के नेताओं और केंद्र सरकार पर आरोपों और उपराज्यपाल के फैसलों आदि पर तीखी आपत्ति जताते हुए अपनी कमजोरियों को ढंकने का प्रयास करते रहे हैं। अगर उनके विधायकों और दूसरे सदस्यों के विपक्षी दल में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं, तो इससे यह भी जाहिर हो चुका है कि वे जिस शुचिता का सपना लेकर चले थे, वह बहुत पहले टूट चुका था, बस मौके की तलाश थी। अब लोगों का विश्वास उन पर से उठ चुका है और केजरीवाल अपने ऊपर लगे आरोपों से बरी भी हो जाते हैं, तो पार्टी का संभलना मुश्किल है।

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