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दिल्ली मेरी दिल्ली- ईवीएम का जिन्न

आम आदमी पार्टी ने यूपी निकाय चुनाव में भाजपा की जीत का कारण ईवीएम को बताया है।

Author December 4, 2017 5:01 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो, सोर्स- AP)

संकट टालने का जुगाड़

लोकप्रिय भोजपुरी गायक मनोज तिवारी पिछले साल तीस नवंबर को दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष बने थे। वैसे तो पंजाबी या बनिया के बजाय बिहार मूल के किसी व्यक्ति को दिल्ली भाजपा की कमान मिलने पर जश्न मनाया जाना चाहिए था, लेकिन दिल्ली भाजपा के नेताओं ने साल भर में ही सारे रिवाज पलट दिए। इतना ही नहीं, अगर मनोज तिवारी सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से न जुड़े होते तो अब तक दिल्ली के भाजपाई दिग्गज उन्हें बाहर का रास्ता दिखा चुके होते। पार्टी के दिल्ली प्रभारी से भी उनके रिश्ते सामान्य नहीं हैं। तिवारी की लोकप्रियता केवल दिल्ली में नहीं है वे देशभर में भाजपा के लिए प्रचार करने जाते हैं, लेकिन दिल्ली भाजपा में उनकी हैसियत कुछ खास नहीं बन पाई है। दिल्ली भाजपा को मजबूत करने और विधानसभा चुनाव में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए बनी कमेटी में ही प्रदेश अध्यक्ष का नाम नहीं है। इस हालत में कोई प्रदेश अध्यक्ष बनने का समारोह करने के बजाय संकट टालने का जुगाड़ नहीं करेगा तो क्या करेगा।

कौन किसकी तरफ
बेहद ईमानदार अफसर की छवि वाले एमएम कुट्टी दिल्ली के मुख्य सचिव पद से विदा होकर केंद्र्र सरकार में पहुंच गए और भाजपा नेताओं से बेहतर रिश्ते वाले अंशु प्रकाश दिल्ली के मुख्य सचिव बना दिए गए। कुट्टी ने वैसे तो हर पार्टी के साथ काम किया, लेकिन वे सुर्खियों में आए शीला दीक्षित के प्रधान सचिव बन कर। उनकी छवि नियमों के मुताबिक काम करने वाले  अफसर की भी रही है। इसीलिए उनकी दिल्ली की केजरीवाल सरकार से कभी नहीं बनी, जो हर काम नियमों के बजाय अपने हिसाब से करवाना चाहती थी। कुट्टी ने विदा होते वक्त अपने करीबियों से कहा कि जान बची, काम करना मुश्किल हो गया था। इसी तरह अंशु प्रकाश दिल्ली और केंद्र में कई पदों पर रहे, लेकिन वे केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज के सचिव होने के नाते ज्यादा जाने जाते हैं। कहा जा रहा है कि उनकी नियुक्ति में केजरीवाल सरकार की ज्यादा भूमिका नहीं रही है, लेकिन काम तो उसी के साथ करना है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि प्रकाश उपराज्यपाल अनिल बैजल की ज्यादा सुनते हैं या दिल्ली सरकार की।

गद्दी की कसक
दिल्ली के एक वरिष्ठ भाजपा नेता की हसरत रही कि वे सूबे के मुख्यमंत्री बन जाएं। एक मौका आया भी था जब वे मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए। बाद में पार्टी ने उन्हें एक प्रतिष्ठित संवैधानिक पद पर बिठाकर दिल्ली से बाहर रवाना कर दिया, लेकिन दिल्ली के इस नेता को अपने शहर और यहां की सियासत से अब भी भरपूर लगाव है। यह लगाव इतना तगड़ा है कि वह राजधानी की राजनीति में न केवल दिलचस्पी दिखाते हैं, बल्कि यह भी ध्यान रखते हैं कि कौन सी कुर्सी किसको दी गई है और किसे दी जानी चाहिए। बहरहाल, वे पिछले दिनों दिल्ली आए तो अपने सभी पुराने साथियों को जुटाया। गिले-शिकवे हुए, पुराने दिनों को याद किया गया, भोज का भी बंदोबस्त था लेकिन इस भव्य आयोजन के बावजूद यह कसक कहीं न कहीं महसूस हुई कि चाहे कितना ही बड़ा राजपाट क्यों न मिल जाए लेकिन अगर दिल्ली की गद्दी नहीं मिली तो समझो कुछ भी नहीं मिला।
नेताओं की आड़
कांग्रेस मुख्यालय में एक कार आकर रुकी और कार की अगली सीट से पंडित जी कहे जाने वाले पार्टी के एक वरिष्ठ नेता सीट बेल्ट खोलकर मुस्कुराते हुए निकले। लेकिन दिलचस्प नजारा ठीक उनकी बगल वाली सीट पर दिखा। ड्राइवर की सीट पर दिल्ली के एक पूर्व सांसद और दिल्ली की एक कद्दावर नेता के सुपुत्र बैठे थे। कमाल यह भी कि कार का जो असली ड्राइवर था वह पीछे साहबों वाली सीट पर बैठा था। नजारा दिलचस्प था, सो लोगों ने आनंद भी भरपूर लिया। पूर्व सांसद महोदय तपाक से गाड़ी से उतरे, पंडित जी के पैर छूए और पीछे जाकर कार में बैठ गए। तब तक असली ड्राइवर अपनी असली सीट पर जा बैठा था। पता यह चला कि पूर्व सांसद महज वरिष्ठ नेता को मान-सम्मान देने की खातिर खुद गाड़ी चलाकर आए थे। यह भी जाहिर सी बात है कि उनके कांग्रेस मुख्यालय गाड़ी चलाकर आने का एक मतलब और था कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता उनके घर गए थे, तभी उनको छोड़ने के लिए पूर्व सांसद आए। बहरहाल, इस नजारे को देखकर सियासी विश्लेषकों ने कहा कि राहुल गांधी के खिलाफ बोलने के बाद अब ऐसे नेताओं को अपनी हिफाजत के लिए ऐसे ही वरिष्ठ नेताओं की आड़ लेनी पड़ रही है क्योंकि यह तय है कि राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद उन नेताओं की फेहरिस्त भी जरूर बनेगी जो उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते रहे थे।

ईवीएम का जिन्न
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली नगर निगम और राजौरी गार्डन चुनाव के बाद ईवीएम के मुद्दे को धीरे-धीरे भुलाना शुरू कर दिया था और पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने उसे अपनी प्रेस वार्ता और ट्विटर की विषय सूची से बाहर कर दिया था, वह मुद्दा यूपी निकाय चुनाव के बाद फिर से जिंदा हो गया है। आम आदमी पार्टी ने यूपी निकाय चुनाव में भाजपा की जीत का कारण ईवीएम को बताया है। निकाय चुनाव परिणाम के बाद से आप नेताओं के बीच एक जुमला खासा चर्चित हो रहा है, जहां ईवीएम वहां भाजपा शेर, जहां मतपत्र वहां ढेर। हालांकि अरविंद केजरीवाल ने इस पर खुद मुंह नहीं खोला है, लेकिन लोगों के ट्वीट को खूब रीट्वीट किया है। तो कई महीनों से आप की बोतल में बंद ईवीएम का जिन्न फिर बाहर आ चुका है और शायद यह गुजरात व हिमाचल के विधानसभा चुनाव और पंजाब के निकाय चुनावों तक बाहर ही रहे।

तजुर्बों से नहीं सीखे
नोएडा प्राधिकरण पुराने तजुर्बों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं है। भाजपा सरकार के आने के बाद भ्रष्टाचार खत्म करने और पारदर्शी व्यवस्था अपनाने की कोशिशें कर ऐसी योजनाएं बनाई जा रही हैं, जिनमें हिस्सा लेने से अधिकारी भी कतरा रहे हैं। करीब 7-8 साल पहले नोएडा ने सेक्टर-25 और 32ए की बेशकीमती 152 एकड़ जमीन को केवल एक बिल्डर कंपनी को बेहद कम कीमत पर आबंटित किया था। हालांकि उस समय भी तय दर से कई गुना ज्यादा कीमत पर सेक्टर-9, 10 के व्यापारी इन सेक्टरों में छोटी जमीनें लेना चाह रहे थे। नतीजतन इतने सालों बाद रियल एस्टेट में मंदी के चलते जमीन लेने वाले बिल्डर ने 110 एकड़ जमीन वापस करने का आवेदन किया है। इसी तर्ज पर समूचे नोएडा को 4 भागों में बांटकर बड़ी कंपनियों को यह जिम्मेदारी दिए जाने की योजना भी नाकाम साबित हो रही है। पहले दिसंबर और अब जनवरी, 2018 से नई पार्किंग नीति को लागू करने का दावा किया जा रहा है। असलियत यह है कि 4 भागों में से 2 के लिए किसी भी कंपनी ने आवेदन नहीं किया, जबकि अन्य दो भागों के लिए 2-2 कंपनियों ने आवेदन किए हैं, लेकिन कम से कम 3 आवेदन के बाद ही चयनित कंपनी का नाम तय हो पाएगा।
हथियार और किताब
जब बाहर रहे तो हथियारों से नाता रखा और लोगों की जान से खेलते रहे और जेल गए तो किताबों की सुध जगी। यह वाक्य तिहाड़ में बंद एक घोषित अपराधी पर सटीक बैठता है। अपराधी ने अदालत में एक अर्जी लगाकर उसे किताबों से दूर रखने का इल्जाम लगाया है। उसने अदालत से किताबें और अखबार पढ़ने की इजाजत देने की गुहार लगाते हुए खुद को सामान्य कारावास में रखने की मांग की है। इसी पर किसी ने मजे लेते हुए कहा कि बाहर थे तो हथियार को तवज्जो और अंदर हैं तो किताबों का बहाना!
-बेदिल

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