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दिल्ली मेरी दिल्ली- संकट के संकेत, एकजुटता की कमी

अब जबकि कुमार विश्वास को पार्टी में हाशिए पर पहुंचा दिया गया है, ऐसे में लग रहा है कि उनकी टिकट के भी कन्फर्म होने की गुंजाइश नहीं है।

Author November 6, 2017 3:41 AM
आप नेता कुमार विश्वास (फोटो-पीटीआई)

एकजुटता की कमी

लोकप्रिय भोजपुरी कलाकार मनोज तिवारी को बड़े गाजे-बाजे के साथ दिल्ली भाजपा की बागडोर सौंपी गई थी। संयोग से उन्होंने दिल्ली नगर निगम चुनाव में भाजपा को जीत भी दिला दी। लेकिन उसके बाद भाजपा बवाना विधानसभा उपचुनाव क्या हारी, उनकी टीम बिखरने लगी। पार्टी में मनोज तिवारी की सक्रियता तो नजर आती है, लेकिन दिल्ली भाजपा के सभी पदाधिकारी एकजुट नहीं दिख रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि अब उसे भी कांग्रेस की श्रेणी में रखा जाने लगा है। केंद्र में भाजपा की सरकार है और तीनों निगमों में भी उसी का शासन है, लेकिन व्यवहार में भाजपा की मौजूदगी पहले जैसी नहीं दिख रही है। मनोज तिवारी को भाजपा का एक तबका पसंद नहीं करता है और निगम चुनाव के बाद उनका राजनीतिक ग्राफ जिस तरह से ऊपर चढ़ने लगा था वह भी अब रुक गया है।

संकट के संकेत
दिल्ली में सरकार और उपराज्यपाल के अधिकार के मामले में आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने सुनवाई शुरू कर दी है। पहले दिन जो टिप्पणी आई उसने दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार की परेशानी बढ़ा दी। दिल्ली हाई कोर्ट पिछले साल ही फैसला दे चुका है कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के बॉस हैं। सुप्रीम कोर्ट भी उसी लहजे में दिख रहा है। अलबत्ता एक जज ने उपराज्यपाल को ज्यादा समय तक फाइल न दबाए रखने को कहा। इस मामले में फैसला आने में काफी समय लग सकता है क्योंकि संविधान पीठ का फैसला आखिरी होगा। समस्या यह है कि इस शुरुआती टिप्पणी से वो अफसर जो दिल्ली सरकार का दरबार लगा रहे हैं, वे भी राजनिवास का चक्कर लगाना न शुरू कर दें। वैसे ही मुख्य सचिव व लोक निर्माण के मामले में दिल्ली सरकार पहले ही अदालत से झटका खा चुकी है। प्रमुख सचिव लोक निर्माण अश्विनी कुमार दिल्ली से विदा भी किए जा चुके हैं।

इंतजार की इंतहा
आम आदमी पार्टी की राष्टीय परिषद की बैठक उम्मीद के अनुसार ही हंगामेदार रही। पार्टी में इस बार निशाने पर इसके संस्थापकों में से एक कुमार विश्वास रहे। इससे पहले भी पार्टी की राष्टीय परिषद की बैठक चर्चित और विवादित रही थी। ऐसी ही एक बैठक में पार्टी ने कुछ अन्य संस्थापकों योगेंद्र यादव व प्रशांत भूषण आदि नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया था। इन नेताओं को बाहर किए जाने वाली बैठक से पहले पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता एक जगह बैठे थे। वहीं पर एक वरिष्ठ नेता ने दूसरे से कहा कि देखो, चाहे योगेंद्र यादव हों, प्रशांत भूषण हों या प्रो आनंद कुमार, ये सारे के सारे लोग पढ़े-लिखे जानकार हैं। पार्टी को बनाने में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान है। दूसरी बात यह है कि इनका अपना कोई जनाधार नहीं है, ऐसे में इन्हें पार्टी में ही एक किनारे लगा दिया जाए और कोई खास तवज्जो न दी जाए, लेकिन इन्हें बाहर निकालना ठीक नहीं होगा। इस पर दूसरे नेता ने जवाब दिया कि ये तो ठीक है कि इनका जनता में कोई जनाधार नहीं है और इससे पार्टी के किसी नेता को कोई खतरा नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि अब मामला राज्यसभा की सीट का है। अगर ये पार्टी में रहेंगे तो राज्यसभा में दावेदारी भी इनकी ही रहेगी। अपनी बौद्धिकता के दम पर ये सीटें ले जाने में कामयाब भी हो जाएंगे। ऐसे में हमारी रिजर्वेशन अगेंस्ट कैंसिलेशन (आरएसी) तो कभी कन्फर्म हो ही नहीं पाएगी। इनके निकल जाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमारी सीट पक्की हो जाएगी। अब जबकि कुमार विश्वास को पार्टी में हाशिए पर पहुंचा दिया गया है, ऐसे में लग रहा है कि उनकी टिकट के भी कन्फर्म होने की गुंजाइश नहीं है।
-बेदिल

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