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कितने दिन का तालमेल

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उनके साथ तीन कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए गए। हारून यूसुफ, देवेंद्र यादव व राजेश लिलोठिया। दिल्ली कांग्रेस में उसूल यही है कि यहां अध्यक्ष सुप्रीम होता है और वह भी अगर शीला दीक्षित सरीखी हों तो बात और भी अहम हो जाती है, लेकिन तीनों कार्यकारी अध्यक्ष भी कुछ नया कर गुजरने को बेताब हैं।

Author February 4, 2019 5:17 AM
दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। (फोटो- पीटीआई)

पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उनके साथ तीन कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए गए। हारून यूसुफ, देवेंद्र यादव व राजेश लिलोठिया। दिल्ली कांग्रेस में उसूल यही है कि यहां अध्यक्ष सुप्रीम होता है और वह भी अगर शीला दीक्षित सरीखी हों तो बात और भी अहम हो जाती है, लेकिन तीनों कार्यकारी अध्यक्ष भी कुछ नया कर गुजरने को बेताब हैं। ऐसे में उनको विशेष जिम्मेदारी दिए जाने की बात पहले से तय थी, लेकिन बाधाएं शुरू से ही सामने आने लगीं। पहले तो उनके बैठने की जगह को ही लेकर असमंजस था। आखिर दीक्षित ने तीनों को प्रदेश कार्यालय में सबसे ऊपर की पांचवीं मंजिल पर बैठने की जगह दी। यह दीगर बात है कि प्रदेश कार्यालय आने वालों को पहली बार यह मालूम चला कि पांचवीं मंजिल पर भी कोई बैठने का कमरा है। इस मामले में एक दिक्कत यह भी है कि अध्यक्ष का कमरा दूसरी मंजिल पर है और उनके करीबी नेताओं को तीसरी मंजिल पर जगह मिली है। ऐसे में ज्यादा गुंजाइश इस बात की है कि प्रदेश कार्यालय आने वाले वही लोग पांचवीं मंजिल तक पहुंच पाएंगे जिन्हें तीनों कार्यकारी अध्यक्षों से ही मिलना होगा। बहरहाल, कार्यकारी अध्यक्षों व अन्य पदाधिकारियों के बैठने की जगह तो तय हो गई और काम भी, लेकिन दिक्कत यह हो गई कि हाल ही में कुछ खाली प्रकोष्ठों के अध्यक्षों की नियुक्तिहुई। इस नियुक्ति में एक कार्यकारी अध्यक्ष की सहमति भी जरूरी थी जो संभवत: हासिल नहीं की गई। बहरहाल अभी तो शुरुआत हुई है, देखना है कि यह तालमेल कितने दिन बरकरार रहता है।

ऊंट के मुंह में जीरा
विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से जेआरएफ की छात्रवृत्ति में सिर्फ 24 फीसद का इजाफा किया गया है, जबकि 2014 में यह वृद्धि 56 फीसद थी। 2010 के बाद यह दूसरी वृद्धि है। शोधार्थियों ने छात्रवृत्ति में कम से कम 80 फीसद बढ़ोतरी की मांग की थी। अब उन्हें यह वृद्धि ऊंट के मुंह में जीरा जैसी ही लग रही है। पिछले दिनों इस मांग को लेकर मंत्रालय के दर पर पहुंचे शोधार्थियों को पहले पुलिस के डंडे मिले और अब छात्रवृत्ति में मामूली इजाफा। शोधार्थियों ने बेदिल को बताया कि वे छात्रवृत्ति में बढ़ोतरी का अपना संघर्ष जारी रखेंगे।

भंडाफोड़ का डर
पुलिस-पत्रकार के रिश्वतखोरी गठजोड़ का भंडाफोड़ करने को लेकर सुर्खियों में आए गौतम बुद्ध नगर के एसएसपी वैभव कृष्ण से न केवल पुलिस, बल्कि अन्य सरकारी महकमों जैसे- परिवहन व बिजली विभाग के अधिकारी व कर्मचारी भी सहम गए हैं। बुधवार को हुए इस भंडाफोड़ की सूचना मिलने के बाद दलालों से भरा रहने वाला संभागीय परिवहन कार्यालय बिल्कुल खाली हो गया है। सरकारी बाबुओं के चहेतों को भी विभाग में घुसने नहीं दिया जा रहा। अधिकारियों के कमरों से फाइलों के ढेर एकाएक गायब हो गए हैं। माना जा रहा है कि डीएम की सहमति से एसएसपी दलालों के लिए बदनाम परिवहन विभाग में भी आॅपरेशन ट्रैप चला सकते हैं। एसएसपी की कार्यशैली से वाकिफ परिवहन विभाग के एक कर्मचारी के मुताबिक उन्नाव में अपनी तैनाती के दौरान वैभव कृष्ण ने घूसखोरी के आरोप में एक एआरटीओ को जेल भेज दिया था, और वे यहां भी किसी को छोड़ने नहीं वाले हैं।

वोट के लिए कुछ भी
चुनावी मौसम में राजनेताओं के वोट मांगने के तरीकों को किसी मापदंड के दायरे में रखना मुश्किल है, खासकर आज के दौर में जब राजनीति ने आदर्श का दामन पूरी तरह छोड़ दिया है। कुछ ऐसा ही वाकया दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में हाल ही में देखने को मिला। मौका था दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की ओर से अभिभावक-शिक्षक बैठक कार्यक्रम के दौरान 11 हजार कक्षाओं की नींव रखना। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों और अभिभावकों को संबोधित करते हुए केजरीवाल कह गए कि अगर वे अपने बच्चों से प्यार करते हैं तो भाजपा को नहीं, उन्हें वोट दें। केजरीवाल के इस बयान की चौतरफा आलोचना हुई कि बच्चों और स्कूलों को तो राजनीति से दूर रखें। ऐसे में तो बस यही कहना बनता है कि ‘वोट के लिए कुछ भी करेगा’।

रद्द होतीं बैठकें
अधिकारियों की उदासीनता से बैठकें रद्द हो जाती हैं। पूर्वी नगर निगम इस मामले में अव्वल है। यूं तो पूर्वी निगम तीनों निगमों में आर्थिक स्थिति सहित अन्य मामलों में फिसड्डी है ही, ऊपर से जो बैठकें होती हैं उन्हें भी रद्द करने में यह निगम रिकॉर्ड बना रहा है। बैठक रद्द करने का कोई तर्क भी नहीं दिया जा रहा है। सिर्फ सूचना से काम चलाया जा रहा है। पिछले महीने उद्योग सदन में आयोजित एक बैठक को रद्द कर दिया गया। बेदिल ने जब निगम मुख्यालय पहुंचकर इसकी तहकीकात की तो जवाब मिला कि इसका भी जवाब ढूंढ़ना पड़ेगा। शायद अधिकारियों की उदासीनता और पदाधिकारियों की गैरहाजिरी को भांप कर बैठकें टाल दी गर्इं। पता चला कि बैठक आयोजित करने वाले विभाग भी तो यहां से नहीं बल्कि कहीं और से संचालित हो रहे हैं।

भूमिका बनाते नेता
अस्सी की उम्र पार कर चुकीं शीला दीक्षित को कांग्रेस का सबसे लोकप्रिय चेहरा मानकर एक बार फिर दिल्ली कांग्रेस की बागडोर सौंप दी गई। उनकी मदद के लिए तीन कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए गए। दीक्षित का काम कांग्रेस को फिर से सक्रिय करना और सभी को जोड़ना माना जा रहा है, लेकिन कांग्रेस को खड़ा करने की जिम्मेदारी उन तीन कार्यकारी अध्यक्षों की है, जो अभी भी पद के खुमार से उबरते नहीं दिख रहे हैं। इस चक्कर में वैसे घर बैठे नेता सक्रिय हो गए हैं, जिनका लोगों से सरोकार कम हो गया था। कांग्रेस नेताओं की चुनौती इसलिए बड़ी है कि उन्हें आम आदमी पार्टी (आप) से न केवल सत्ता लेनी है, बल्कि अपने वोटरों को भी वापस लाना है। 15 साल तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित का मुकाबला को अरविंद केजरीवाल नहीं कर सकते, लेकिन मतदाताओं को प्रभावित करने का उनका जो निराला अंदाज है, उसका तोड़ कांग्रेस के पास नहीं है। माना जा रहा था कि दीक्षित के साथ कार्यकारी अध्यक्ष बने युवा नेता कुछ करेंगे, लेकिन अभी तक तो वे सिर्फ भूमिका बनाते ही दिख रहे हैं।

सरकार का युद्ध विराम
लोकसभा चुनाव की तारीख तय हुए बिना ही सभी दलों की चुनावी सक्रियता बढ़ती जा रही है। ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपने अफसरों से लड़ने के बजाय फिर से पुराने रंग में आ गए हैं और भाजपा राजनीतिक हमले शुरू कर दिए हैं। इसका लाभ उठाकर दिल्ली की नौकरशाही अपने हिसाब से काम कर रही है। विजय देव के मुख्य सचिव बनने के बाद दनादन तबादले हो रहे हैं। पहले की तरह राजनिवास से नियुक्ति और तबादले हो रहे हैं, लेकिन इन तबादलों पर सरकार की ओर से कोई बयानबाजी नहीं हो रही है। वैसे विजय देव इस मामले में ज्यादा व्यावहारिक माने जाते हैं कि कुछ तबादले वे सरकार के हिसाब से भी करवा दे रहे हैं।

बंदिश का तोड़
जंतर मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों व रैली में शामिल होने वालों की संख्या दिल्ली पुलिस ने तय कर रखी है। लिहाजा प्रदर्शन के लिए स्वीकृति देते पुलिस इस बाबत हिदायत देती रहती है, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। बीते दिनों हाशिए के लोगों की आवाज उठाने को लेकर यहां हुए एक जमावड़े में यह बंदिश टूटती नजर आई। पता चला कि प्रदर्शन में कई संगठनों को शामिल होना था, लेकिन मुद्दे कम ही थे। बस फिर क्या था, अलग-अलग संगठनों से थोड़े-थोड़े लोगों को प्रदर्शन में दिखा रैली की स्वीकृति ली गई और फिर सबने साथ बैठकर सरकार को कोसा। किसी ने ठीक ही कहा, ‘वे डाल डाल तो ये
पात पात’।
-बेदिल

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