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दिल्ली तक केजरीवाल

ममता बनर्जी से अरविंद केजरीवाल के अच्छे संबंध माने जाते हैं लेकिन दिल्ली या आम आदमी पार्टी के प्रभाव वाले हरियाणा व पंजाब में ममता की पार्टी का कोई आधार ही नहीं है।

Author March 25, 2019 2:16 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (एक्सप्रेस फोटोः अमित मेहरा)

पहले देश भर में बन रहे राजग के खिलाफ गठबंधन में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, मायावती और चंद्र बाबू नायडू की बड़ी भूमिका दिख रही थी। लगता था कि ये सभी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हो जाएंगे तो भाजपा की अगुआई वाली राजग को बड़ी चुनौती मिल सकती थी। अब ये चारो नेता अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं। ममता बनर्जी से अरविंद केजरीवाल के अच्छे संबंध माने जाते हैं लेकिन दिल्ली या आम आदमी पार्टी के प्रभाव वाले हरियाणा व पंजाब में ममता की पार्टी का कोई आधार ही नहीं है। मजबूरन केजरीवाल कांग्रेस के नेताओं के शरण में गए और वहां भी बात केवल दिल्ली तक रह गई है। वे बार-बार यह सफाई दे रहे हैं कि मुद्दा बदल गया है कि अब कांग्रेस के बजाए भाजपा को हराना जरूरी हो गया है। बाकी राज्यों के लिए कांग्रेस बात भी नहीं कर रही है। कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने वाराणसी पहुंचे केजरीवाल के इस लोकसभा की लड़ाई दिल्ली तक सिमट कर रह जाने का खतरा पैदा हो गया है।

विश्वास का दर्द
होली का मौका हो और उस पर चुनाव का तड़का। ऐसे में राजनीतिक रंगों में सराबोर होली मनाते दिखे कवि कुमार विश्वास। आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक रहे कुमार विश्वास आजकल हाशिए पर चल रहे हैं और गाहे-बगाहे उनके भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने की अफवाहें सामने आती रहती हैं। अपने आवास पर जोगी-रा सारा-रा रा का राग अलापते हुए कुमार विश्वास ने ना केवल आम आमदी पार्टी और अरविंद केजरीवाल पर जमकर कटाक्ष किया बल्कि खुद को भी नहीं बख्शा। अपने राजनीतिक जीवन की डवांडोल नैया पर खुद ही चुटकी लेते हुए अपना दर्द उड़ेल कर रख दिया और बयान किया कि कि भरी जवानी में आडवाणी होने का अहसास कैसा होता है।

नेताओं की बयानबाजी
उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन होने के समय से जो कयास लगाए जा रहे थे, वे चुनावी समर के तेज होने के साथ सामने आने लगे हैं। गठबंधन की बुनियाद रखी जाने के दौरान कार्यकर्ताओं को एक-दूसरे के वोट बैंक का एकसाथ आने या दोनों दलों के नेताओं का एक मंच पर साथ आने पर असमंजस था। अब जबकि मतदान आने वाले दिनों में शुरू होने वाले हैं, ये असमंजस पूरी तरह से स्पष्ट हो रहा है। गौतम बुद्ध नगर से सपा के कद्दावर नेता और मुलायम सिंह के नजदीकी एमएलसी नरेंद्र भाटी के नाम से नामांकन पत्र लिए जाने से सपा-बसपा के पदाधिकारियों में सुगबुगाहट तेज हो गई है। हालांकि अभी तक नरेंद्र सिंह भाटी ने निर्दलीय या किसी दल से चुनाव लड़ने का एलान नहीं किया है लेकिन वे गठबंधन के बसपा प्रत्याशी के साथ मंच साझा करने से साफ इनकार कर चुके हैं। इसी तरह कांग्रेस की तरफ से बाहरी को प्रत्याशी बनाए जाने के विरोध में नोएडा के वरिष्ठ कार्यकर्ता अभी तक नाराज बने हुए हैं।

मीडिया कवरेज पर पहरा
शांति सेवा और न्याय की बात करने वाले दिल्ली पुलिसकर्मी और अधिकारी किसी घटनाक्रम के मीडिया कवरेज को लेकर कितने उदार रहते हैं, इसे बीते दिनों घटी एक घटना से समझा जा सकता है। उत्तरी पूर्वी जिला में एक बच्चे के अपहरण के बाद हत्या कर दी गई। गुस्साए परिजनों ने थाने के पास सड़क जाम की और आरोपी को जल्दी पकड़ने की गुहार लगाई। इस घटनाक्रम का कवरेज करने के लिए गए कुछ पत्रकारों के मोबाइल फोन पुलिसकर्मियों ने छीन लिए। हालांकि, जब इस घटना की जानकारी जिला पुलिस के आला अधिकारियों को लगी तो वे हरकत में आए। बावजूद इसके कुछ मीडियाकर्मियों को अपना मोबाइल फोन वापस लेने में कई घंटे लग गए। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई बार धरना-प्रदर्शन का कवरेज कर रहे मीडियाकर्मियों के साथ बदसलूकी की घटना घट चुकी है।

लेखी का नंबर
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले क्रिकेट खिलाड़ी गौतम गंभीर के भाजपा में शामिल होने से दिल्ली के कई नेताओं की परेशानी बढ़ गई है। पहले से ही कहा जा रहा था कि गंभीर नई दिल्ली से भाजपा उम्मीदवार होंगें। वे दिल्ली के राजेंद्र नगर के रहने वाले हैं। लेकिन जिस बिरादरी से हैं उसके वोट पश्चिमी दिल्ली में हैं। दिल्ली की सातों लोकसभा सीट अभी भाजपा के पास हैं। भाजपा के आंतरिक सर्वे में चार सीटों पर लड़ाई ज्यादा कठिन मानी जा रही है। वैसे कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में ना-ना होते हुए समझौते के आसार अब भी बने ही हुए हैं, अगर ऐसा हुआ तब तो हर सीट पर भाजपा की लड़ाई कठिन हो जाएगी। फिलहाल तो गंभीर के पार्टी में आने से लोकसभा का एक मजबूत उम्मीदवार भाजपा को मिला और नई दिल्ली की सांसद मीनाक्षी लेखी का ज्यादा और प्रवेश वर्मा का कम रक्तचाप बढ़ा। लेखी ने अपने इलाके में सक्रिय रहने के अलावा सांसद के नाते संसद में और पार्टी प्रवक्ता के नाते पार्टी फोरम पर बड़ी भूमिका अदा की। पहले गंभीर पार्टी में आते और पार्टी में सक्रिय रहते तो शायद इन नेताओं को उन्हें स्वीकारने में आसानी होती, एकाएक पार्टी में आकर टिकट पाने से मौजूदा सांसद की परेशानी तो बढ़ेगी ही।
-बेदिल

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