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दिल्ली मेरी दिल्ली: जुबान पर लगाम

डॉक्टरी सलाह मानें तो केजरीवाल को अभी कम ही बोलना चाहिए, आखिर कुछ ही दिन पहले तो उनकी जुबान छोटी की गई है।

Author नई दिल्ली | October 3, 2016 2:33 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

जुबान पर लगाम

विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का रिकार्ड बनाने में जुटे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बड़े दमखम से दावा किया था कि शुक्रवार को वे विधानसभा में केंद्र सरकार के खिलाफ ऐसा धमाका करेंगे जिसके सामने आने से अखबारों और खबरिया चैनलों को पसीने आ जाएंगे, लेकिन उससे ठीक एक दिन पहले सेना ने जिस तरह पाकिस्तान में आतंकवादियों पर जवाबी कार्रवाई की, उससे केजरीवाल की भाषा ही बदल गई। वे केंद्र सरकार की कार्रवाई का न केवल समर्थन करने लगे बल्कि इस कार्रवाई के समर्थन में विधानसभा में प्रस्ताव तक पारित कर दिया। कांग्रेस इसे केजरीवाल की नौटंकी मान रही है जबकि भाजपा के नेता गीदड़भभकी। वैसे डॉक्टरी सलाह मानें तो केजरीवाल को अभी कम ही बोलना चाहिए, आखिर कुछ ही दिन पहले तो उनकी जुबान छोटी की गई है।

सरकार की सफाई

संसदीय सचिव विवाद की सफाई में आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार यह कहते नहीं थकती कि संसदीय सचिवों का पद लाभ का पद नहीं है। संसदीय सचिव बनाए गए विधायकों का भी कहना है कि उन्होंने सरकार से इस पद के नाते कोई लाभ नहीं लिया है। वहीं सरकार की ओर से ही चुनाव आयोग को बताया गया कि इन 21 संसदीय सचिवों पर 13 लाख से ज्यादा खर्च करके इनके लिए दफ्तर बनाए गए। इन्हें सरकारी काम के लिए कार दी गई, इनके नाम के बोर्ड लगाए गए। और तो और इनमें से कई ने तो मंत्री की गैरहाजिरी में विभागों के बैठकों की अध्यक्षता तक कर डाली। इतना ही नहीं, कई जगह उनके संसदीय सचिव पदनाम वाले होर्डिंग्स भी लगाए गए हैं।

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चिकनगुनिया ने दी राहत

कई बार आफत भी राहत बन जाती है। ऐसा ही एक वाकया हुआ अपराध शाखा की ओर से दबोचे गए तीन में से एक मुजरिम के साथ। बीते दिनों पुलिस ने बलात्कार के एक दोषी समेत तीन लोगों को गिरफ्तार कर हत्या की एक योजना नाकाम करने का दावा किया। बलात्कार का दोषी पेरोल पर जेल से बाहर आने के बाद फरार हो गया था। इनमें से दो को तो तिहाड़ भेज दिया गया लेकिन एक ने खुद को चिकनगुनिया होने का दावा कर दिया। उसने यह भी बताया कि काफी कोशिशों के बावजूद वह अस्पताल में भर्ती नहीं हो पा रहा है। गिरफ्तारी के बाद उसे अस्पताल में बिस्तर तो मिला ही, साथ ही मिली तिहाड़ जाने से थोड़े समय के लिए राहत।

बिल का झटका

दिल्ली से सटे नोएडा के बिजली विभाग के अधिकारियों ने उपभोक्ताओं से बकाया पैसे वसूलने के नाम पर उन्हें परेशान करने का नायाब तरीका ढूंढ़ निकाला है। इसके तहत करीब दो साल पहले उपभोक्ताओं से बिजली के बिल के बकाया के नाम पर लाइनमैन चेक लेकर आए। सोची-समझी साजिश के तहत उन चेकों को कैश कराने के लिए बैंक नहीं भेजा गया। जबकि इसके बाद आए बिलों का भुगतान उपभोक्ता लगातार करते रहे। अब बिजली विभाग के जेई और एसडीओ स्तर के अफसर दो साल पहले की रकम का भुगतान नहीं होने का दावा कर जुर्माना व ब्याज लगाकर उपभोक्ताओं को भारी-भरकम बिल भेज रहे हैं। दो साल पहले का रिकॉर्ड भी ज्यादातर उपभोक्ताओं के पास नहीं होने से अब बिजली काटने तक की धमकी दी जा रही है। हालात ऐसे हैं कि सपा की सरकार में सपा से ही जुड़े व्यापारियों तक को बख्शा नहीं जा रहा है। तंग आकर पार्टी से जुड़े एक बड़े व्यापारी नेता ने मामले की शिकायत मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक पहुंचा दी है।

बदल गए हालात

पुलिस और पत्रकारों के बीच संवादहीनता बढ़ती जा रही है। एक वक्त था जब अपराध की खबरें कवर करने वाले रिपोर्टरों को जिले के पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जानते थे और रिपोर्टर को किसी भी खबर में पुलिस के पक्ष के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करनी पड़ती थी, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब पुलिस के आला अधिकारी हाईकमान की तरह बर्ताव करते हैं और उन्हें यह नागवार गुजरता है कि वे खबरों में अपना पक्ष दें। हालत यह हो गई है अब अपराध कवर करने वाले रिपोर्टर को घटनास्थल तक जाने में भी पुलिस मदद नहीं करती। शनिवार को मयूर विहार के माविला अपार्टमेंट में रहने वाले एक रिटायर्ड पायलट ने जब गोली मारकर खुदकुशी की तो स्वाभाविक रूप में रिपोर्टर घटनास्थल पर पहुंचने लगे। पर वहां तो पुलिस का ऐसा पहरा लगा था कि किसी को अंदर जाने की इजाजत तक नहीं दी गई। पुलिस वाले हाथ झाड़े एक ही वाक्य बोलते रहे कि अंदर जाना ठीक नहीं होगा। पर बिना अंदर जाए खबर कैसे निकलेगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं था।

अपनी धुन में मगन

आला पुलिस अधिकारी लैंडलाइन पर आपका फोन उठा लें और आपकी उनसे ठीक से बात हो जाए तो खुद को धन्य मानिएगा। दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों के पास इतना वक्त ही नहीं होता कि वे फोन उठाकर दूसरी तरफ के व्यक्ति को संतुष्ट कर सकें। एक दशक पहले आरएस गुप्ता के समय आयुक्त के आवास तक का फोन आसानी से उठाया जाता था और फोन करने वाले को संतुष्ट किया जाता था। संभव हुआ तो आयुक्त खुद बात करते थे, वरना पुलिस मुख्यालय में आने का समय देते थे। आयुक्त से नीचे तब के उपायुक्त और मौजूदा समय में स्पेशल पुलिस आयुक्त (कानून व्यवस्था) पी कामराज खुद अपने घर का फोन देर रात तक उठाते थे और फोन करने वालों से आराम से बातें करते थे। मौजूदा पुलिस मुख्यालय में संयुक्त आयुक्त प्रवीर रंजन और इसी स्तर के अधिकारी एमएम ओबराय, रिटायर हो चुके केसी द्विवेदी और आमोद कंठ के बारे में कहा जाता था कि अगर वे मोबाइल पर नहीं मिलेंगे तो लैंडलाइन पर मिलना तय है। पर अब वो समय नहीं रहा। अब अधिकारी अपने काम में व्यस्त रहते हैं। उन्हें रिपोर्टरों के फोन या उनकी परेशानियों से क्या मतलब? वे तो अपनी धुन में मगन हैं।
-बेदिल

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