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तो इस साल हम मच्छर मारेंगे या उससे मरेंगे?

पिछले दो सालों से डेंगू का डंक ही स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बता रहा है।

Author January 3, 2017 1:59 AM
डेंगू।

सत्ता बनाम सेहत पर डंक

पिछले दो सालों से डेंगू का डंक ही स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बता रहा है। देश की राजधानी तक में मच्छर के डंक से सैकड़ों लोगों की जानें गर्इं। अब देखना यह है कि इस साल सरकार और समाज मच्छरों का इलाज कर पाता है या नहीं। पिछले साल मच्छरजनित बीमारियों से हुई मौत के वास्तविक आंकड़े देने में सरकार नाकाम रही। सरकारी व निजी आंकड़ों में अंतर था। दिल्ली व आसपास डेंगू के 4337 मामले व चिकनगुनिया के 12116 मामले दर्ज हुए। डेंगू पीड़ित मरीजों का आंकड़ा भी इस बार बड़ा हो गया था। चिकनगुिनया पीड़ित कई मरीजों की मौत हो जाने के बाद भी व्यवस्था इस बहस में उलझी रहा कि चिकनगुिनया से मौत हो सकती है कि नहीं। मलेरिया के 816 मामले आने के अलावा इससे भी मौतें हुर्इं। जबकि हमसे कम संपन्न देश श्रीलंका ने मलेरिया मुक्त होने का खिताब हासिल किया। दिल्ली सरकार इस मामले में नगर निगम को और निगम ने सरकार को घेरने की कोशिश की। निगम ने बजट का रोना लगभग साल भर ही रोया। कर्मचारियों की हड़ताल भी रही। पूरा शहर गंदगी के ढेर पर लंबे समय तक रहा। मच्छर मलेरिया, हैजा, टाइफाइड ने लोगों को जम कर सताया। अस्पतालों में जगह व संसाधन कम पड़ गए थे। सरकारी नुमाइंदे विदेशी दौरों पर रहे। दिल्ली सहित तमाम हिस्सों में फैले बर्ड फ्लू ने भी लोगों को खूब डराया। हालांकि फ्लू का कम घातक वायरस ही पाए जाने से राहत रही। दुनिया में कहीं भी यह वायरस पक्षी से मनुष्यों में जाता नहीं देखा गया।
मोहल्ला क्लिनिक का हल्ला

दिल्ली सरकार ने एक हजार मोहल्ला क्लीनिक खोलने की बात कही थी। साल भर में कुल करीब 106 मोहल्ला क्लीनिक ही खुल पाए। वह भी अस्थआई इंतजामों के साथ। हालांकि यह राहत भरा कदम बताया गया। फिर भी इसमें जांच व इलाज के लिए ज्यादातर कर्मचारी व डॉक्टर मौजूदा अस्पतालों से लिए गए। एंबुलेंस सेवा भी पहले से मौजूद सेवा का विस्तारित रूप ही रहा। 110 नई एंबुलेंस आनी थी जिनमें 10 सुपर स्पेशियलिटी व 100 आधुनिक सेवायुक्त एंबुलेंस आनी थीं। इनमें से कैट्स के तहत 65 एंबुलेंस आ पार्इं।
गरीबों की एम्स से दूरी बढ़ी

हृदय प्रत्यारोपण स्वास्थ्य के क्षेत्र में अहम है, और इस साल इसकी उपलब्धियों पर नजर रहेगी। एम्स ने पिछले साल 13 हृदय प्रत्यारोपण के साथ 50 प्रत्यारोपण का रिकार्ड बनाया। एम्स ने गरीब मरीजों को गोद लेने की योजना शुरू की जो सामाजिक-आर्थिक सहभागिता से परवान चढ़ेगा ऐसा बताया गया। पारंपरिक चिकित्सा सेवा पर ध्यान दिया जाने लगा। स्वास्थ्य के क्षेत्र में बीता साल उपलब्धियों का साल नहीं बन पाया। देश का नामी केंद्र अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) अपने कई विवादित फैसलों के लिए चर्चा के केंद्र में रहा। डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया में मरीजों का डॉक्टर तक पहुंचना दिनोंदिन दुश्कर होता गया। आॅनलाइन अपाइंटमेंट के बावजूद घंटों व कई लाइनों में लगने की कष्टकारी प्रक्रिया से गुजरने के दरमियान कई मरीज बेहोश होकर गिरे तो कई मरीजों के हाथ पांव टूटे। एम्स में इलाज के लिए भटकने की मजबूरी ने गरीब व ग्रामीण मरीजों को एम्स से दूरी बढ़ा दी है।
विवादों में भी रहा अगुआ

एम्स साल भर विवादोंं में घिरा रहा। एम्स निदेशक ने कई मनमाने फैसले लेकर विवाद को बढ़ाया, जिसमें गैस्ट्रोलॉजी विभाग के मुखिया का पद गैरविभागीय व्यक्ति को सौंपने के हास्यास्पद व शर्मनाक फैसले ने इस चर्चा को बल दिया कि कि निजी खुन्नस के कारण पद का का दुरुपयोग किया गया। यह मामला कैट में विचाराधीन है। इसी तरह के एक अन्य विवाद को मेडिसन विभाग के मुखिया ने जन्म दिया जब उन्होंने अपने विभाग के एक डॉक्टर सहित तीन डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें अस्पताल से निकाल दिया। एम्स इसके अलावा भी कई अन्य फैसलों के लिए विवादों में रहा।
मुफ्त जांच और दवाएं

साल 2016 में केंद्र सरकार की तरफ से हृदय व कैंसर के मरीजों के लिए सस्ती दर पर दवाएं देने वाले दवा बिक्री केंद्र अमृत स्टोर एम्स, आरएमएल, सफदरजंग व लेडी हार्डिंग अस्पताल में खोले गए। हालांकि इनमें सभी दवाएं न मिलने या कम कारगर दवाएं मिलने की शिकायतें भी आर्इं। जबकि दिल्ली सरकार ने अपने सभी अस्पतालों में मुफ्त जांच व दवाएं देने का एलान किया जो नई बोतल में पुरानी शराब ही साबित हुई। दरअसल कांग्रेस सरकार के समय से ही दिल्ली के सभी अस्पतालों में मुफ्त दवा का इंतजाम था जो आधे-अधूरे ढंग से चल रहा था। इसे आप सरकार ने अपनी उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया। ज्यादातर महंगी दवाओं की खरीद बंद कर दी गई। इसके साथ ही सर्कुलर निकाला गया कि कोई भी डॉक्टर बाहर से दवाएं लाने को नहीं लिखेगा। इससे डाक्टरों व मरीजों में तकरार की घटनाएं भी बढ़ीं। दवाओं की केंद्रीकृत खरीद दवा घोटाले को रोकने के दावे के साथ शुरू की गई। इसके कारण अस्पतालों में दवाओं की आपूर्ति कई बार बाधित भी हुई।

उलझते रहे डॉक्टर और तीमारदार

तीमारदारों व डाक्टरों के बीच झगड़े व मारपीट की घटनाएं भी पूरे साल किसी न किसी अस्पताल में होती रहीं। इसके साथ ही इन घटनाओं के विरोध में व सुरक्षा की मांग को लेकर डाक्टरों की बार-बार हड़ताल भी हुई। लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल, जीबी पंत, सफदरजंग, आरएमएल, जीटीबी, डीडीयू जिसमें स्वास्थ्य सेवाएं जम कर बाधित हुई। एम्स तक में एक कर्मचारी के बेटे की मौत के बाद कर्मचारियों ने जमकर हंगामा किया। इलाज मिलने में देरी के कारण हुई मौत के आरोप के साथ कर्मचारी आंदोलन पर उतर आए, जिसके बाद डॉक्टरों पर कार्रवाई की गई।
आगजनी में संसाधन बर्बाद

राममनोहर लोहिया अस्पताल में आगजनी से आॅपरेशन थिएटर जल कर खाक हो गया। इस अस्पताल की ओटी में नमी और आगजनी से कई आॅपरेशन थिएटर काफी समय बंद रहे। इसमें काफी दवाएं व महंगे उपकरण सहित तमाम संसाधन जलने से लाखों रुपए का तो नुकसान हुआ ही कई मरीजों के अहम आॅपरेशन टालने पड़े। वहीं सफदरजंग अस्पताल के सैकड़ों कैंसर मरीजों का इलाज बीच में छोड़ रेडियो थेरेपी विभाग बंद हो गया। रेडिएशन की नियामक व निगरानी संस्था बार्क ने अस्पताल में तय मानकों का पालन न होते देख विभाग को सील कर दिया। दवा की मात्रा तय करने वाले फिजिस्ट भर्ती नहीं हो पाए। विभाग अभी भी शुरू नहीं हो पाया।

एकीकृत परीक्षा का शोर

एमबीबीएस की सीटें एम्स में बढ़ा कर 72 से 100 की गर्इं। कुछ नए पाठ्यक्रम भी शुरू हुए। मेडिकल की पढ़ाई के लिए एकीकृत परीक्षा को लेकर सड़क से संसद तक शोर मचा। राजनीतिक दखल के कारण निजी कॉलेजों को राहत मिल गई। आंबेडकर अस्पताल में मेडिकल कॉलेज खुला। कैडेवर अंग प्रत्यारोपण ने जहां कई नाउम्मीद लोगों को नई जिंदगी दी वहीं अपोलो अस्पताल में पकड़े गए किडनी रैकेट ने इस पेशे को शर्मसार किया। सरकार का जोर पीपीपी मॉडल की ओर बढ़ा है।

वीडियो: अंतर्राष्ट्रीय फुटबाल खिलाड़ी पूनम की डेंगू से मौत हुई

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