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अहम है एनएसयूआइ का दखल

इससे यह अंदाजा लगाया जाता है कि युवा किस तरफ जा रहा है। जिस तरह की एनएसयूआइ की तैयारी थी उसमें परिषद उम्मीदवारों की एक तरफा जीत होनी चाहिए थी।

डीयू परिसर में मौजूद छात्र।

भाजपा समर्थित छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव की एकतरफा जीत में बिना तैयारी कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआइ ने जोरदार हस्तक्षेप किया है। छात्र संघ के चार अहम पदों में भले ही उसे एक पद मिला हो लेकिन उसने कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा और चुनाव न लड़ने वाली आम आदमी पार्टी (आप) को जोरदार झटका दिया है।

पिछले कुछ सालों से दिल्ली की राजनीति में ‘आप’ के आने के बाद हाशिए पर चली गई कांग्रेस ने मई के लोकसभा चुनाव से वापसी की थी लेकिन शीला दीक्षित के निधन के बाद फिर से बेसहारा दिख रही है। सालों बाद डूसू चुनाव एनएसयूआइ अपने दम पर लड़ी। सचिव का पद जीता और संयुक्त सचिव पद पर कम मतों से उसका उम्मीदवार पराजित हुआ। इसके ठीक विपरित अध्यक्ष पद पर रेकॉर्ड अंतर से एबीवीपी का उम्मीदवार चुनाव जीता। कायदे से इस चुनाव को दिल्ली के युवाओं का मिजाज माना जाता है। दिल्ली में देश भर से छात्र पढ़ने आते हैं इसलिए इसे देश भर केयुवाओं का मन माना जाता है।

कांग्रेस के माने जाने वाले मतों को ही अपने पक्ष में करके ‘आप’ ने 2015 में प्रचंड बहुमत से सत्ता पाई और अति उत्साह में समाजवादियों के पुराने संगठन के नाम पर छात्र युवा संघर्ष समिति (सीवाइएसएस) बनाकर डूसू का चुनाव लड़ना शुरू किया। चुनाव में उनके तीसरे नंबर पर आने के बाद ही कांग्रेस के हौंसले बढ़े और पार्टी बच पाई। ‘आप’ कोई न कोई बहाना करके डूसू चुनाव से बचती रही। अगले कुछ महीने बाद दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इसलिए इस बार के डूसू चुनाव की भूमिका ज्यादा मानी जा रही है। ‘आप’ ने ईवीएम के बजाए बैलेट पेपर से चुनाव होने पर ही छात्रसंघ चुनाव लड़ने के बहाने किनारा किया।

परिषद तो अपने को आरएसएस की छात्र शाखा मानता है लेकिन आम समझ में इसे भाजपा से ही जुड़ा माना जाता है। इसलिए भाजपा पूरी ताकत से चुनाव में परिषद के लिए काम करती है। एनएसयूआइ तो कांग्रेस की छात्र शाखा ही है। दिल्ली कांग्रेस का दो महीने से कोई अध्यक्ष नहीं है और 28 सितंबर तक पितृपक्ष होने से नियुक्ति भी होने के आसार नहीं हैं। ऐसे में एनएसयूआइ के उम्मीदवार अपने बूते चुनाव लड़े। एक कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर थोड़ा भी प्रयास होता तो एक पद और एनएसयूआइ को मिल जाता। इस चुनाव को दिल्ली की राजनीति का इसलिए पैमाना माना जाता है कि इसके वोटर भले ही एक लाख तीस हजार हों और आधे भी वोट करने नहीं आते हों लेकिन उन्हें युवा मतदाताओं का प्रतिनिधि माना जाता है।

इससे यह अंदाजा लगाया जाता है कि युवा किस तरफ जा रहा है। जिस तरह की एनएसयूआइ की तैयारी थी उसमें परिषद उम्मीदवारों की एक तरफा जीत होनी चाहिए थी। बाकी पदों पर भी वैसे ही वोट मिलने चाहिए थे जैसा अध्यक्ष पद पर मिला है। ऐसा न होने से भाजपा खेमें में वैसा उत्साह नहीं है जैसा लोक सभा चुनाव में एकतरफा जीत के बाद हुआ था। फिर भी यह तो तय हो ही गया कि अभी भी प्रधानमंत्री की लोकप्रियता युवाओं में कम नहीं हुई है। अगर आप डूसू चुनाव में होती तो राजनीतिक वातावरण थोड़ा और साफ हो जाता। बावजूद इसके कांग्रेस के नेता अगर गंभीरता से प्रयास करें तो दिल्ली में उनकी जड़े जम सकती हैं।

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