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हमारी याद आएगी: जब बिजली मिस्त्री का हुनर संगीतकार के काम आया

हुनर उस खोटे सिक्के की तरह होता है, जो मुसीबत में काम आता है। ‘नीले गगन के तले...’, ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए...’, ‘ऐ मेरी जौहरा जबीं...’ जैसे मुधर गाने बनाने वाले संगीतकार रवि के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया था, जब उन्हें गायक बनने के अपने अरमानों को दबा कर इलेक्ट्रीशियन का काम करना पड़ा था।

रवि (3 मार्च, 1926- 7 मार्च, 2012)

एक पूरी पीढ़ी ने शादी-ब्याह में बारात के आगे ‘आज मेरे यार की शादी है…’ पर जमकर भंगड़ा किया, ‘बाबुल की दुआएं लेती जा…’ सुनकर आंखें भिगोई और ‘चंदा मामा दूर के…’ जैसी लोरी सुना कर बच्चों को सुलाया है। भिखारियों के बीच ‘गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा, तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा…’ गाना आज भी सबसे ऊंचे पायदान पर है। ‘दादी अम्मा दादी अम्मा मान जाओ…’ गाने वाली पीढ़ी आज खुद दादी बन गई और कभी कभार यह गाना सुन कर अपने बचपन में चली जाती है। भारतीय समाज को आसानी से गुनगुनाए जा सकने वाले ऐसे गानों की सौगात देने वाले संगीतकार रवि फिल्मों में गायक बनने आए थे मगर बन गए संगीतकार। इस जुनूनी संगीतकार को इसके लिए खूब संघर्ष भी करना पड़ा।

हुनर उस खोटे सिक्के की तरह होता है, जो मुसीबत में काम आता है। ‘नीले गगन के तले…’, ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए…’, ‘ऐ मेरी जौहरा जबीं…’ जैसे मुधर गाने बनाने वाले संगीतकार रवि के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया था, जब उन्हें गायक बनने के अपने अरमानों को दबा कर इलेक्ट्रीशियन का काम करना पड़ा था। यह 1950 की बात है। तब दिल्ली से गायक बनने के लिए मुंबई आए रवि आर्थिक संकटों से जूझ रहे थे।

दरअसल दिल्ली में जुनून में पहले हारमोनियम और फिर एक के बाद कई अन्य वाद्य बजाना सीखने और भजनादि गाने के बाद रवि को लगने लगा था कि वे अच्छे गायक बन सकते हैं। मगर 16-17 साल के हो चुके रवि को कमाने-धमाने की चिंता भी थी। तो दिल्ली के पास एक सैनिक छावनी में वे बिजली सुधारने का काम करने लगे थे। इसके लिए वे सुबह छह बजे उठकर काम पर जाते थे और देर रात घर लौटते थे। तनख्वाह थी 196 रुपए। कुछेक महीने काम करने के बाद रवि परेशान हो गए और यह काम छोड़ दिया। बीसेक साल के हुए तो 1946 में घरवालों ने शादी कर दी। शादी के तीन चार साल बाद भी जब रोजीरोटी का जुगाड़ नहीं हुआ, तो रवि ने तय किया कि वह मुंबई जाकर फिल्मों में गायक बनेंगे और रवि उस महानगर में आ गए, जहां न वे किसी को जानते थे और न ही उनके रहने का कोई ठिकाना था। कुछेक दिन उन्होंने मालाड रेलवे स्टेशन पर निकाले। उम्मीद की किरण तब नजर आई संगीतकार जब हुस्नलाल-भगतराम ने उन्हें एक गाने के कोरस में मौका दिया। मगर रिहर्सल के दौरान ही उन्हें बाहर कर दिया गया।

हालात बुरे थे और रवि के पिता को उन्हें हर महीने पैसे भेजने पड़ रहे थे। पिता की कमाई 80 रुपए थी, जिसमें से 40 रुपए वे अपने बेटे के सपने को पूरा करने के लिए मनीआॅर्डर कर देते थे। चूंकि दिल्ली से रवि बिजली मिस्री के औजार साथ ले आए थे इसलिए अतिरिक्त पैसों के लिए यह काम शुरू कर दिया था। मुंबई में रवि ने पांच साल तक छिटपुट काम कर संघर्ष किया। संगीतकार हेमंत कुमार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। ‘आनंदमठ’ में वंदे मातरम… (1952) में कोरस गाने का मौका दिया। 1954 में ‘नागिन’ में मशहूर गाने ‘तन डोले मेरा मन डोले…’ पर क्लेवायलिन कल्याणजी ने बजाया था और हारमोनियम पर सुर दिए थे रवि ने। इसके बाद ही हेमंत कुमार ने उन्हें स्वतंत्र रूप से फिल्म संगीतकार बनने का सुझाव दिया था।

1955 में रवि को स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनने का मौका मिला फिल्म ‘वचन’ में। इसका गाना ‘चंदा मामा दूर के पुए पकाए गुड़ के आप खाएं थाली में मुन्ने को दें प्याली में…’ खूब लोकप्रिय हुआ। इसके बाद रवि ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। रवि ने बीआर चोपड़ा की अधिकांश फिल्मों में संगीत दिया जिनमें महेंद्र कपूर को खूब गाने का मौका मिला। जब बीआर चोपड़ा और गायक रफी के बीच टकराव हुआ और चोपड़ा ने एक नए रफी को पैदा करने का अभियान चलाया, तब रवि ने ‘गुमराह’ में महेंद्र कपूर को मौका दिया और फिर उनसे बीआर फिल्म्स की फिल्मों के गाने गवाए। चोपड़ा दूसरा रफी तो पैदा नहीं कर पाए, मगर इस टकराव में महेंद्र कपूर जैसा गायक मिला।

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