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हासिल ए फैसला

यात्रियों की संख्या बढ़ने की उम्मीद कर रही नोएडा मेट्रो का हालिया फैसला मुसाफिरों के लिए तो मुश्किल पैदा कर ही रहा है साथ ही कमाई के मामले में मेट्रो का खजाना भरने में भी नाकाम साबित हुआ।

यात्रियों की संख्या बढ़ने की उम्मीद कर रही नोएडा मेट्रो का हालिया फैसला मुसाफिरों के लिए तो मुश्किल पैदा कर ही रहा है साथ ही कमाई के मामले में मेट्रो का खजाना भरने में भी नाकाम साबित हुआ। चंद मिनटों का समय घटाने के लिए कुछ स्टेशनों पर मेट्रो का रुकना बंद है। इसके लिए तर्क यह दिया गया था कि सफर का समय ज्यादा होने की वजह से मुसाफिर मेट्रो का इस्तेमाल करने से परहेज कर रहे हैं।

हालांकि इससे फर्क ज्यादा नहीं पड़ा क्योंकि कुछ स्टेशनों पर मेट्रो के नहीं रुकने से कुछ मिनटों का ही अंतर आ रहा है। वहीं दूसरी तरफ जिन स्टेशनों पर मेट्रो का रुकना बंद हुआ है, वहां से सफर करने वाले मुसाफिर अब मेट्रो के बजाए वैकल्पिक माध्यमों का इस्तेमाल करने पर मजबूर हैं। लोगों के घर के पास मेट्रो स्टेशन होते हुए भी वे ट्रेन की सुविधा नहीं ले सकते। अलबत्ता लोगों का कहना है कि नोएडा मेट्रो के इस फैसले का उल्टा असर पड़ रहा है, मुसाफिरों की संख्या बढ़ने के बजाए घट रही है।

वाजिब चिंता

दिल्ली नगर निगम में पांच सीटों पर उपचुनाव को लेकर हर राजनीतिक दल ने खूब जोर अजमाइश की। इनमें विपक्ष की एक पार्टी भी जी-जान से लगी थी। लेकिन हर सभा में पार्टी के एक नेताजी को भीड़ की चिंता सताती रही। जिस जनसभा में वह पहुंच रहे हैं उनमें भीड़ है कि नहीं इसको लेकर पूछताछ भी करते दिखे। लेकिन अब नेता जी को कौन बताए, जिनकी पार्टी का एक भी विधायक नहीं है और ना ही बीते दो चुनावों से कोई उम्मीदवार सांसदी का चुनाव ही जीत पाया है।

ऐसे में वहां खड़े निगम उम्मीदवार के लिए भीड़ जुटा पाना कितनी बड़ी चुनौती होगी। लेकिन अब दिल्ली प्रदेश की जिम्मेदारी मिली है तो निभाना तो है ही। अगर नहीं जाते तो राष्ट्रीय नेतृत्व उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी कर सकता था। माना जा रहा है कि यही कारण है कि चुनाव के आखिरी दिनों में नेताजी ने मोर्चा संभाला और पार्टी उम्मीदवारों के लिए चुनाव मैदान में कूदे। हालांकि अब भीड़ की यह चिंता नतीजे आने के बाद ही हटेगी।

चुनाव की रोटी

बार-बार चुनाव आए तो कितना अच्छा होगा! अपन को दो रोटी तो मिल जाती है। पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी में एक सज्जन के मुंह से यह बात सुनकर बेदिल को थोड़ा अचरज हुआ तो उसकी तहकीकात में जाने का मन किया। बेदिल ने गुरुद्वारा के पास के एक बूथ पर जब उस सज्जन से पूछा कि आखिर इसके क्या मायने हैं।

अधेड़ उम्र के उस व्यक्ति ने कहा कि प्रचार के दौरान उन्हें सुबह चाय से लेकर दोपहर का भोजन और फिर शाम में मेहनताना के बाद भोजन देकर दूसरे दिन आने के लिए कहा जाता है। रविवार को मतदान के बाद यह सब बंद हो जाएगा तो बताएं कि बेरोजगारी तो बढ़ेगी? इसलिए हमारे जैसे लोग कहते हैं कि बार-बार चुनाव आए और लंबे समय तक प्रचार हो तो कम से कम दो बार का खाना मिल जाता है।

वाह रे अभियान

दिल्ली पुलिस कई बार ऐसे-ऐसे अभियान चलाती है जैसे उसे इसी काम के लिए अधिकृत किया गया हो। इस समय पुलिस घर से बिछड़े बच्चे, बुजुर्ग और महिलाओं को उनके परिजनों से मिलाने का अभियान छेड़े हुए है। ऐसा कोई दिन नहीं होता जिस दिन पुलिस का कोई भी जिला, पीसीआर या अन्य यूनिट इस अभियान काहिस्सा नहीं बनते। यह अच्छी बात भी है कि बिछड़ों को उनके अपनों से मिलाया जा रहा है।

लेकिन बेदिल ने जब इसकी तह में जाने की कोशिश की तो पता चला कि यह सब एक प्रकार से दिखाने और आम लोगों को भरमाने के लिए तक ही सीमित है। आसानी से कोई बिछड़ा मिल जाए तो वाहवाही के लिए प्रचार होता है। अन्यथा कोई अपने परिजनों की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने थाने तक जाए तो पता चला उनसे इतनी पूछताछ और कागजात की मांग कर दी जाती है कि पीड़ित दोबारा थाना जाने की हिम्मत नहीं कर सके। अब आप खुद ही समझ लें कि पुलिस का यह अभियान क्या है?

आंदोलन में आगे

कृषि कानूनों की वापसी के लिए चल रहा किसानों का आंदोलन हाईटेक होता जा रहा है। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर चल रहे आंदोलन के मंच के सामने अब एक बड़ा प्रोजेक्टर स्क्रीन भी लगाया गया है। दावा है कि भीड़ बढ़ने पर इस एलइडी स्क्रीन से मंच की गतिविधियों को दिखाने का उपयोग होगा। लेकिन अंदरखाने कई और भी वजह हैं इस एलइडी स्क्रीन के! आंदोलन लंबा चलना है।

सबको बांधे रखने की भी चुनौती है। कहना न होगा कि बीते तीन महीने से ज्यादा समय से सबके लिए खबर बन रहे यहां के धरनारत किसान खुद भी रोजमर्रा की खबरों से रू-ब-रू होते रहना भी चाह रहे हैं। जुगाड़ रहेगा तभी तो कभी-कभी बोरियत दूर करने के लिए इस एलइडी स्क्रीन से कुछ मनोरंजन और दूसरी जानकारी भी मिल सकेगी। किसी ने ठीक ही कहा-एलइडी स्क्रीन से एक पंथ कई काज संपन्न होंगे। आंदोलन तो हाईटेक होगा ही। मंच के सामने लगाई गई एलईडी स्क्रीन पर अपना आंदोलन दूसरो को तो दिखाया जाएगा ही, साथ ही इसके जरिए आंदोलनरत किसानों को देश व दुनिया की गतिविधियों की जानकारी उपलब्ध कराई जा सकेगी।
-बेदिल

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