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चुनाव हुए तो क्या फिर काम करेगा केजरीवाल का करिश्मा!

दिल्ली के सियासी गलियारों में अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मुख्यमंत्री व आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपने करिश्मे से इन सभी 20 विधायकों को दोबारा विधानसभा पहुंचाने में कामयाब होंगे?

Author नई दिल्ली | January 22, 2018 5:07 AM
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फोटो-tWITTER/@AamAadmiParty)

लाभ के पद के मामले में चुनाव आयोग की सिफारिश पर राष्ट्रपति की ओर से अयोग्य ठहराए गए आम आदमी पार्टी (आप) के 20 विधायकों को अब सिर्फ अदालत से ही राहत की उम्म्मीद है। ये सभी विधायक हाई कोर्ट में नए सिरे से याचिका दायर कर राष्ट्रपति के फैसले को खारिज करने की मांग करेंगे। अगर वहां से भी इन्हें राहत नहीं मिली तो इनके सामने जनता की अदालत में जाना ही एकमात्र विकल्प होगा। दिल्ली के सियासी गलियारों में अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मुख्यमंत्री व आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल अपने करिश्मे से इन सभी 20 विधायकों को दोबारा विधानसभा पहुंचाने में कामयाब होंगे? अगर दिल्ली नगर निगम के चुनाव के आंकड़ों पर गौर करें तो साफ है कि दिल्लीवालों पर अब केजरीवाल का जादू नहीं चल पा रहा है। आलम यह है कि इनमें से एक भी विधायक के लिए चुनाव में जीतना आसान नहीं होगा। हर सीट पर उन्हें भाजपा व कांग्रेस के उम्मीदवारों से जबरदस्त चुनौती मिलने वाली है।

उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया व दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय ने भले ही जनता की अदालत में जाने और कांग्रेस व भाजपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त कराने का दम भरा हो, लेकिन जिन विधायकों की सदस्यता गई है, उनकी हालत बेहद खराब है। पार्टी अनुशासन के मद्देनजर ये विधायक खुलकर अपनी बात नहीं रख सकते, लेकिन इनमें से कई विधायकों के दिल्ली में अपने मकान तक नहीं हैं। वे तो अब चुनाव में होने वाले असली खर्च का हिसाब लगाकर ही हलकान हैं। उन्हें इस बात का बखूबी अहसास है कि दिल्ली की सियासी हवा ने अपना रुख बदल लिया है और बीते तीन सालों में यहां की सियासत में बहुत कुछ बदल गया है। सवाल यह भी है कि आखिर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को संसदीय सचिव की कुर्सी क्यों सौंपी। स्वराज इंडिया के अनुपम के मुताबिक, इन विधायकों को खुश करने के लिए केजरीवाल ने ऐसा किया ताकि ये विधायक हर फैसले में उनका साथ दें। दूसरी ओर बागी विधायक कपिल मिश्रा कहते हैं कि जब इन विधायकों को कोई फायदा ही नहीं होने वाला था तो इनको कुर्सी सौंपने का मतलब क्या था। अगर ऐसा ही था तो बाकी बचे विधायकों को भी क्यों नहीं संसदीय सचिव बना दिया गया। पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास कहते हैं कि उनकी राय मानी ही नहीं गई। ऐसे में स्वराज इंडिया के नेताओं का यह कहना सही है कि 67 सीटें जीतने के बाद केजरीवाल सोचने लगे थे कि अब वे कुछ भी कर सकते हैं। पहले बगैर किसी कानून के 21 विधायकों को अपने मंत्रियों का संसदीय सचिव बना दिया, उसके बाद दिल्ली विधानसभा में इन नियुक्तियों को पिछली तारीख से वैध करने का बिल लेकर आ गए।

 

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