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हिंदीभाषियों में समझ नहीं बन पाई: उमा

23 वर्ष पूर्व 1994 में स्थापित नाट्य संस्था ‘लिटिल थेस्पियन’ के माध्यम से उमा अपने पति एसएम अजहर आलम के साथ बंगाल की धरती पर न सिर्फ हिंदी, बल्कि उर्दू रंगमंच को भी विस्तार देने में सतत प्रयत्नशील हैं।

मशहूर रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला

रामाशीष
कोलकाता में हिंदी रंगमंच को नया आयाम देने वाली मशहूर रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला वर्ष 1984 से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं और 33 वर्षों की रंगयात्रा में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 23 वर्ष पूर्व 1994 में स्थापित नाट्य संस्था ‘लिटिल थेस्पियन’ के माध्यम से उमा अपने पति एसएम अजहर आलम के साथ बंगाल की धरती पर न सिर्फ हिंदी, बल्कि उर्दू रंगमंच को भी विस्तार देने में सतत प्रयत्नशील हैं। पेश है उमा से बातचीत…

गमंच हमें संवेदनशील बनाता है, जिसकी गहराई में उतरने पर इसके कई रंग-बिरंगे आयाम उभरते हैं। यह कहना है रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला का। उनकी शिकायत है कि कला, साहित्य व संस्कृति के लिए विश्वविख्यात कोलकाता शहर में अभी तक हिंदीभाषियों में अपनी भाषा के रंगमंच व नाटक के प्रति वैसी मानसिकता और समझ नहीं बन पाई है, जो बांग्लाभाषियों में देखी जाती है। उमा के मुताबिक पश्चिम बंगाल का बांग्ला रंगमंच सिर्फ इसीलिए समृद्ध है क्योंकि यहां रंगमंच के दर्शक काफी हैं और पश्चिम बंगाल में चार हजार से ज्यादा नाट्य संस्थाएं हैं।
उमा का कहना है कि आमंत्रित दर्शकों पर निर्भर करके कोई कितना काम कर सकता है, यह सोचने वाली बात है। वहीं बांग्ला में हर शाम छह-सात नाटकों के शो होते हैं और हर आॅडिटोरियम में टिकट खरीद कर दर्शक आते हैं।
20 अगस्त 1968 को कोलकाता में पैदा हुईं उमा एक पारंपरिक मारवाड़ी परिवार से आती हैं। खुद उमा के मुताबिक विशुद्ध रूप से इस वैश्य परिवार में कला, साहित्य व संस्कृति के लिए कोई स्थान नहीं था। उमा ने बताया कि 1984 में दसवीं पास करने के बाद माहेश्वरी बालिका विद्यालय के एक समारोह में एक कार्यक्रम से जुड़ने का मौका मिला। उस कार्यक्रम के तहत एक नाटक की भी तैयारी चल रही थी, जिसका नाम था-गुस्ताखी माफ। इस नाटक का हिस्सा बनने का प्रस्ताव मिलते ही मैंने तुरंत हामी भर दी। उमा-अजहर की संस्था ‘लिटिल थेस्पियन’ अब तक अपने इस सफर में 16 संपूर्ण नाटक, 31 कहानियां व आठ एकांकियों का मंचन कर चुकी है, जिनमें से 12 उर्दू, दो नेपाली व शेष हिंदी में हैं। खुद उमा ने 45 से ज्यादा नाटकों में अभिनय किया है। इनमें बालकन की औरतें, धोखा, रेंगती परछाइयां, अलका, गैंडा, पतझड़, सवालिया निशान, यादों के बुझे हुए सवेरे, लोहार, नमक की गुड़िया, सुलगते चिनार, महाकाल आदि प्रमुख हैं।
इसके अलावा उन्होंने एक मां धरती सी, रश्मिरथी मां, किस्सा ख्वानी, लाइसेंस, दोपहर, पहले आप, यादों के बुझे हुए सवेरे आदि दर्जनों नाटकों का निर्देशन भी किया है। लिटिल थेस्पियन में इस वक्त नाटक ‘रूहें’ पर काम चल रहा है। अजहर आलम के लिखे इस नाटक का मंचन इस साल सितंबर में किया जाएगा।

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