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दिल्ली: टाइटेनियम प्रत्यारोपण से नाउम्मीदों के लिए जगी उम्मीद

28 साल के तरुण (बदला हुआ नाम) मेधावी छात्र रहे। मारुति में अच्छी नौकरी थी और जिंदगी बेहतर चल रही थी। लेकिन दो साल पहले हुए एक सड़क हादसे ने उनका सब कुछ छीन लिया।

Author नई दिल्ली। | October 17, 2018 4:29 AM
प्रतीकात्मक चित्र

28 साल के तरुण (बदला हुआ नाम) मेधावी छात्र रहे। मारुति में अच्छी नौकरी थी और जिंदगी बेहतर चल रही थी। लेकिन दो साल पहले हुए एक सड़क हादसे ने उनका सब कुछ छीन लिया। डॉक्टरों की कोशिश से तरुण की जिंदगी तो बच गई लेकिन सब कुछ बदल गया। सड़क हादसे के कारण उनका चेहरा विकृत हो गया और आवाज भी चली गई। कुल मिलाकर उनकी जिंदगी मौत बदतर हो गई। हादसे के कारण तरुण की नौकरी चली गई। उनका घर से निकलना बंद हो गया। विकृत चेहरे के कारण वे किसी के सामने आने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। अवसाद से घिरे तरुण के मन में कई बार जिंदगी खत्म करने का खयाल भी आया। उन्हें लगता था कि जीने की कोई वजह ही नहीं बची है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के जय प्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों ने ऐसे ही मरीजों को उम्मीद किरण दिखाई है और उन्हें पूरी तरह से ठीक करने के लिए थ्रीडी (त्रिआयामी) प्रिंटिंग तकनीक की मदद से खास इंप्लांट तैयार किया है। ट्रॉमा सेंटर के मुखिया प्रोफेसर डॉ राजेश मल्होत्रा ने हड्डी विभाग में आने वाले घायलों के इलाज के लिए कूल्हे का टाइटेनियम इंप्लांट तैयार कर सफल सर्जरी को अंजाम दिया था। उन्होंने इसी तकनीक से कूल्हे का इंप्लांट तैयार कर लगाया है। ट्रॉमा सेंटर की जनरल सर्जन डॉ सुषमा सागर के निर्देशन में चेहरे का प्रत्यारोपण ईजाद करने वाली मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ रुचि पाठक कौल ने यह इंप्लांट एक मरीज के चेहरे पर लगाया है। डॉ रुचि बताती हैं कि टाइटेनियम (एक खास धातु) से बने इस इंप्लांट से घायल मरीजों के चेहरे को एक बार के ऑपेरशन में ही पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। वे बताती हैं कि एम्स ट्रॉमा सेंटर में दो साल पहले तक सालाना करीब 64000 घायल मरीज आते थे। अब यह आंकड़ा और बढ़ गया है। ऐसे घायलों के इलाज के दौरान डॉक्टर की पहली प्राथमिकता उनकी जिंदगी बचाना होती है। चेहरे का आकार ठीक करना बाद का मामला होता है और वह भी कई बार की लंबी व जटिल सर्जरी के बाद ही मुमकिन हो पाता है। इसमें कई साल भी लग सकते हैं।

डॉ रुचि बताती हैं कि हादसे में विकृत हुए चेहरे का इलाज काफी खर्चीला और कष्टदायक है। कई मरीज इसका खर्च उठाने में असमर्थ होते हैं और विकृत चेहरे के कारण गहरे अवसाद में चले जाते हैं। इतना ही नहीं, मानसिक अवसाद और बेकारी के कारण कई मरीज आत्महत्या तक करने को मजबूर हो जाते हैं। वे बताती हैं कि सड़क दुर्घटना का शिकार होने वाले ज्यादातर लोग कामकाजी व 25 से 35 साल के आयुवर्ग के होते हैं। कई बार ये अपने परिवार में इकलौते कमाने वाले होते हैं और हादसे के कारण इनका पूरा परिवार तबाह हो जाता है। घायलों की इसी पीड़ा ने उन्हें कुछ विकल्प तलाशने को प्रेरित किया और उन्होंने इस तकनीक पर काम शुरू किया। डॉ रुचि ने बताया कि ऐसे घायलों की नाक की हड्डी टूट जाने, तालू में छेद हो जाने या जबड़ा टूट जाने से वे बोल और खा-पी भी नहीं पाते। इसे ठीक करने के लिए पहले शरीर के अन्य हिस्सों से हड्डी व मांस काटकर लगाना पड़ता था। इसमें शरीर को दोहरा, तिहरा जख्म मिलता था और कई बार सर्जरी की जरूरत पड़ती थी।

लेकिन इंप्लांट से शरीर को बिना अतिरिक्त जख्म दिए एक बार में ही इलाज किया जा सकता है। वे बताती हैं कि इंप्लांट का खर्च 30-40 से 60-65 हजार रुपए तक है। जितने वजन के टाइटेनियम की जरूरत होती है उसी हिसाब से खर्च होता है। सबसे बड़ी बात है कि मरीज का चेहरा सामान्य हो जाता है। डॉ रुचि आगे बताती हैं कि इसी थ्रीडी प्रिंटिंग इमेज की मदद से बने इंप्लांट के कारण तरुण का चेहरा ठीक हो गया है और उन्हें उनकी नौकरी भी वापस मिल गई है। इसके साथ ही उन्हें नई जिंदगी शुरू करने की हिम्मत भी मिल गई है। उन्होंने बताया कि राहुल के ऑपरेशन की तैयारी चल रही है। इस तकनीक से हजारों अन्य मरीजों को उम्मीद की किरण मिलेगी। यह तकनीक कैंसर व दूसरी बीमारियों के कारण विकृत हुए चेहरे वाले मरीजों व अन्य अंगों के प्रभावित होने के कारण विकलांग हुए मरीजों के लिए भी एक वरदान साबित हो सकती है।

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