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मकबरा हो मंदिर, गर्व से उठ जाता सिर

उत्तर औपनिवेशिक भारतीय इतिहास में दो तरह की शक्तियों के बीच संघर्ष जारी है। एक इतिहास को ज्यादा से ज्यादा विज्ञान सम्मत बनाने की कोशिश में है तो दूसरी खुद इतिहास को मिथक सिद्ध करने की कोशिश में।

प्रतीकात्मक तस्वीर

उत्तर औपनिवेशिक भारतीय इतिहास में दो तरह की शक्तियों के बीच संघर्ष जारी है। एक इतिहास को ज्यादा से ज्यादा विज्ञान सम्मत बनाने की कोशिश में है तो दूसरी खुद इतिहास को मिथक सिद्ध करने की कोशिश में। मजेदार बात यह है कि इस दौर में भारतीय मुसलमानों के बारे में सबसे अधिक मिथक गढ़े गए। उन मिथकों में मुसलमानों को हिंदू मंदिरों का ध्वंसक और मंदिरों को सुनियोजित तरीके से मस्जिद में तब्दील करनेवाला साबित किया गया। इस मिथकीकरण के पीछे दरअसल मस्जिदों को मंदिर घोषित कर दिए जाने की उनकी ‘मांग’ छिपी होती है।
राष्टवादी इतिहासकारों के एक दल द्वारा समय-समय पर यह दावा किया जाता रहा है कि ताजमहल वास्तव में राजा मानसिंह द्वारा निर्मित एक राजपूत महल था जिसे शाहजहां ने जबर्दस्ती हथियाया और एक मकबरे में बदल दिया। उन्होंने लाहौरी के ‘व पेश अजीं मंजिल राजा मानसिंह बूंद’ के उल्लेख का सहारा लेते हुए कहा कि यह वास्तव में शिव का एक मंदिर था जिसपर बाद में राजा मानसिंह द्वारा कब्जा कर लिया गया था। अगर यह एक पहले से मौजूद इमारत थी, तो भी राजा मानसिंह ने एक मंदिर पर क्यों कब्जा किया? दरअसल, लाहौरी के उक्त कथन को उसके प्रसंग से बाहर लेकर अपने विचारों के समर्थन के लिए उसके अर्थ को विकृत करने का प्रयास भर है। लाहौरी और सभी दूसरे फारसी विद्वानों ने सर्वसम्मति और असंदिग्ध रूप से इस बात की पुष्टि की है कि वह मूल रूप से जमीन थी जिसे शाहजहां ने चार ‘हवेलियों’ के बदले प्राप्त किया था और यह कि इसका निर्माण-कार्य नींव से शुरू हुआ था। सूचना के दूसरे स्रोत विलियम हाकिंस व विलियम फिंच जैसे विदेशी यात्रियों के विवरण हैं, जिनमें कहीं भी ताजमहल की तरह की इमारत का उल्लेख नहीं है।

विदेशी पर्यटक पीटर मुंडी के विवरण को यहां देखना दिलचस्प होगा जिसमें लिखा है : ‘यह बाश्शा अपनी दिवंगत बेगम तेग महल के लिए, जिस्से वो बहोत प्यार करते थे, अब एक मकबरा बनो रहे हैं…वो चाहता वो सबसे शुंदर हो…काम शुरू हो चुका है और वो बहोत ज्यादा मजदूरों और लागत के साथ जारी होता, जिसमें बेपनाह मेहनत, सोना और चांदी जैस्सा कीमती आम धातु और संगमरमर को मामूली पथरों की तरे लगायो जा रिया है’। फ्रांसीसी तैवर्नियर पहली बार 1640-41 में, जबकि ताज का निर्माण-कार्य जारी था, आगरा आया था। अगर पहले से मौजूद किसी इमारत का रूपांतरण हुआ होता तो वह भी इसे लिखना नहीं भूलता। इसके विपरीत, उसने इस बात की पुष्टि की कि शहंशाह शाहजहां अपनी प्रिय बेगम के लिए एक विशाल मकबरा बनवा रहा था, और इस योजना पर ‘बीस हजार आदमियों ने अनवरत काम किया’। जब बीस हजार मजदूर इस योजना पर काम कर रहे थे, तो यह खबर निश्चित रूप से फैल सकती थी कि एक राजपूती महल या मंदिर को मकबरे में बदला जा रहा था, और अगर ऐसा हुआ होता तो तैवर्नियर को जरूर यह बात मालूम होती।
दूसरी ओर राष्ट्रवादी इतिहासकार पुरुषोत्तम नाथ ओक अपनी किताब में लिखते हैं कि ताजमहल के हिंदू मंदिर होने के कई सबूत मौजूद हैं। वे अपने तर्कों के साथ ताजमहल के प्राचीन शिवमंदिर तेजोमहालय और अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर नामक शिवलिंग होने की बात कहते हैं। ओक ने इसे लेकर याचिका भी दायर की थी, जिसमें उन्होंने ताज को एक हिंदू स्मारक घोषित करने व कब्रों और सील्ड कक्षों को खोलने व यह देखने कि उनमें शिवलिंग, या अन्य मंदिर के अवशेष हैं, या नहीं पता लगाने की अपील थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी इस याचिका को अस्वीकार कर दिया। प्रोफेसर ओक का तर्क है कि हिंदू मंदिरों में ही पूजा और धार्मिक संस्कारों के लिए भगवान शिव की मूर्ति, त्रिशूल, कलश और ॐ आदि वस्तुएं प्रयोग की जाती हैं। ताजमहल में ऐसी बहुत सी आकृतियां और शिल्प संबंधी तथ्य और दृश्य इस बात का सबूत देते हैं कि ताजमहल विशाल मकबरा न होकर विशेषत: शिवमंदिर है।
वहीं एक दिसंबर 2015 को केंद्र सरकार ने अपनी ओर से कहा कि ताजमहल हिंदू मंदिर नहीं है। केंद्रीय पर्यटन मंत्री महेश शर्मा ने संसद परिसर में पत्रकारों से कहा कि सरकार को जो सबूत मिले हैं, उनके आधार पर यह साबित नहीं होता कि ताजमहल कभी हिंदू मंदिर था। आगरा की एक अदालत में कुछ लोगों की ओर से ये याचिका दी गई थी कि ताजमहल को हिंदू मंदिर घोषित किया जाए और हिंदुओं को इसमें पूजा-अर्चना की इजाजत मिले।

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