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हाई कोर्ट की राय- मजदूरी करके भी अलग हुई पत्नी का गुजर बसर करे पति

कोर्ट ने महिला के पति को निर्देश दिया कि वो वह अपनी पत्नी और नाबालिग बेटे को 15-15 हजार रुपए प्रतिमाह का गुजारा भत्ता दे।

Author नई दिल्ली | June 3, 2019 8:26 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने घरेलू मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पत्नी को उसी स्तर की जिंदगी जीने का पूरा हक है जैसी जिंदगी वह ससुराल में जी रही थी। केस की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला के पति को निर्देश दिया कि वो वह अपनी पत्नी और नाबालिग बेटे को 15-15 हजार रुपए प्रतिमाह का गुजारा भत्ता दे। दरअसल एक निचली अदालत ने महिला के पति को गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया जिसके खिलाफ उसने (पति) हाई कोर्ट में अपील की। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कहा कि निचली अदालत के फैसले में दखल देने की जरुरत नहीं है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि जब भी कोर्ट गुजारा भत्ता तय करे तो यह कल्पना करें कि जब महिला अपने ससुराल को छोड़ने पर मजबूर होती है तो वह किस वेदना, व्यथा और वित्तीय संकट से गुजर रही होती है। इसलिए कानून में प्रावधान किया गया कि पीड़ित महिला के लिए उचित भत्ते की व्यवस्था की जाए, ताकि वह अपना और बच्चों का सही तरह पालन-पोषण कर सके। कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता दिये जाने का जो प्रावधान है, उसके पीछे गरिमामय जिंदगी बसर करने से है। ऐसी महिलाओं को बारे में सोचना चाहिए जो ससुराल से मजबूरी में निकलीं हो या निकाली गई हों।

हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए कहा कि महिला वैसी ही जिंदगी की हकदार है जैसी जिंदगी उसे पति के घर में मिली हो। ऐसे में पति चालाकी से महिला को उसके हक से वंचित नहीं कर सकता। अगर पति शारीरिक रूप से सक्षम है तो यह उसकी जिम्मेदारी है कि वो गुजारा भत्ता दे। फिर चाहे उसे मजदूरी का ही काम क्यों ना करना पड़े।

मौजूदा मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने महिला के पति को अंतरिम आदेश दिया था कि वो गुजारा भत्ते के तौर पर महिला और उसके बेटे को 15-15 हजार रुपए का गुजारा भत्ता दे। गौरतलब है कि महिला दिल्ली के लाजपत नगर इलाके की निवासी है। उसका कहना है कि पति का फतेहाबाद में कपड़े का शोरूम है। करोड़ों रुपए की जमीन-जायदाद है। इसके अलावा पति के पिता का भी अपना अलग कारोबार है।

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