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दिल्ली: डीयू ने बनाई मलेरिया और डेंगू के मच्छर मारने की हर्बल दवा

मानसून और उसके बाद मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। इनकी वजह से डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया आदि बुखार फैलते हैं। इनमें से कई तो बहुत ही घातक हैं।

Author नई दिल्ली। | Updated: August 1, 2018 4:42 AM
विभाग की प्रोफेसर वीणा अग्रवाल के नेतृत्व में पीएचडी कर रहे दिनेश कुमार ने यह दवा बनाई है।

मानसून और उसके बाद मच्छरों का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। इनकी वजह से डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया आदि बुखार फैलते हैं। इनमें से कई तो बहुत ही घातक हैं। मच्छरों को काबू में करने के लिए सरकारें रासायनिक दवाओं का छिड़काव कराती हैं, जिससे भूमि, जल और वायु प्रदूषण बढ़ता है और इससे मच्छर के लार्वा भी पूरी तरह नहीं मरते हैं। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के वनस्पति शास्त्र विभाग के शोधकर्ताओं ने राष्ट्रीय मलेरिया शोध संस्थान के साथ मिलकर मलेरिया, फाइलेरिया और डेंगू के मच्छरों को मारने की एक हर्बल दवा तैयार की है।

विभाग की प्रोफेसर वीणा अग्रवाल के नेतृत्व में पीएचडी कर रहे दिनेश कुमार ने यह दवा बनाई है। प्रोफेसर अग्रवाल का कहना है कि बड़े स्तर पर इस दवा का उत्पादन करने के लिए हमें कंपनियों की मदद की जरूरत है। इस शोध को अमेरिकी पत्रिका ‘प्रोसेस सेफ्टी एंड एंवॉयरमेंटल प्रोटेक्शन’ और जर्मनी की एक पत्रिका ने भी छापा है। प्रोफेसर अग्रवाल ने बताया कि हमने इस दवा को बनाने में इंद्रजौ पेड़ की छाल का उपयोग किया है। उनके मुताबिक, हिंदू मान्यताओं में इंद्रजौ को एक चिकित्सकीय पेड़ माना गया है।
देश में कई जनजातियां आज भी इसका उपयोग कई तरह की बीमारियों से निजात पाने के लिए कर रही हैं। उन्होंने बताया कि हमने इंद्रजौ के पेड़ों की हरी छाल को लिया और साफ पानी से तीन बार धोया ताकि उसमें मौजूद गंदगी निकल जाए। इसके बाद उसे कमरे के तपमान पर 72 घंटे तक सुखाया और फिर उसका पाउडर बनाया।

इस पाउडर को प्रयोगशाला में नैनो पार्टिकल स्तर पर संसाधित करने के बाद प्राप्त हर्बल दवा का मच्छरों और उनके लार्वा पर प्रयोग किया गया जो 100 फीसद सफल रहा। इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे दिनेश ने बताया कि हमने अपने शोध के दौरान राष्ट्रीय मलेरिया शोध संस्थान, द्वारका की भी मदद ली थी। प्रोफेसर अग्रवाल ने बताया कि इंद्रजौ की छाल से प्राप्त तत्व को बिना पेड़ों को नुकसान पहुंचाए ट्यूश कल्चर के माध्यम से प्रयोगशाला में भी विकसित किया जा सकता है। इसके लिए हमें इंद्रजौ के बहुत सारे पेड़ों की जरूरत नहीं होगी। इस दवा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसके इस्तेमाल से मच्छरों से तो निजात मिलेगी ही साथ ही भूमि, जल और वायु प्रदूषण भी नहीं होगा।

उनके मुताबिक, वर्तमान में जो भी दवाएं मच्छरों को मारने या उनके प्रजनन को रोकने के लिए उपयोग हो रही हैं, उनसे भारी मात्रा में प्रदूषण हो रहा है और मच्छर भी पूरी तरह से खत्म नहीं हो रहे हैं। इसका अंतत: खमियाजा मनुष्य को और नई बीमारियों के रूप में उठाना पड़ रहा है। इसके अलावा यह अन्य दवाओं के मुकाबले सस्ती भी रहेगी। प्रोफेसर अग्रवाल ने बताया कि हम इस दवा का बड़े स्तर पर उत्पादन करने के बारे में सोच रहे हैं। हमें इसके लिए कुछ फंड की आवश्यकता है ताकि डीयू के छात्र एक स्टार्टअप शुरू कर सकें। उनके मुताबिक अभी कुछ कंपनियों से बात चल रही है।

जीपीएस युक्त पीएमएस प्रणाली में पहली बार अन्य विभाग जुड़े हैं। उनकी तरफ से लगाए जाने पौधे और जगह का ऑनलाइन ब्योरा उपलब्ध होगा। हालांकि वन विभाग की तरफ से लगाए जाने वाले पौधों और जगह का ब्योरा पहले से पीएमएस प्रणाली से जुड़ा है। इस वजह से पौधों की संख्या को बढ़ाना या उनकी देख-रेख नहीं करने पर पूरी तरह से रोक लगेगी और जवाबदेही तय होगी। – प्रमोद कुमार, वनाधिकारी, गौतमबुद्ध नगर

पौधरोपण अभियान को केवल एक दिन का उत्सव मानने वालों पर यह प्रणाली शिकंजा कसेगी। पौधों की संख्या को लेकर फर्जी आंकड़े इससे पूरी तरह से बंद हो जाएंगे। पौधे लगाकर देखभाल नहीं करने या मानक से अधिक पौधों के मृत होने पर संबंधित विभागों के अधिकारियों से व्यय वसूली की जाएगी। मोबाइल ऐप के जरिए भी इलाके में रोपे गए पौधों की संख्या पर निगरानी रखी जा सकेगी। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में पहले से इस प्रणाली का इस्तेमाल हो रहा है। -बी. प्रभाकर, मुख्य वन संरक्षक, (मूल्यांकन एवं अनुश्रृवण) लखनऊ

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