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नोटबंदी: कमाई कुछ नहीं, फिर भी कायम है भरोसा

नोटबंदी ने इन हाट बाजारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इसके बावजूद हाटों में अभी निराशा नहीं पनपी है और ‘अच्छे दिन’ की आस बाकी है।

Author नई दिल्ली | December 7, 2016 3:00 AM
हजार रुपए का नोट।

राजधानी दिल्ली में साप्ताहिक रूप से लगने वाले हाट-बाजार की एक समृद्ध परंपरा रही है। लगभग हर मोहल्ले में यह साप्ताहिक हाट लगता है जो दिन के हिसाब से कहीं सोमबाजार, कहीं मंगलबाजार, तो कहीं बुधबाजार नाम से जाना जाता है। लेकिन 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा ने देश की अर्थव्यवस्था में एक अहम कड़ी माने जाने वाले इन हाट बाजारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इसके बावजूद हाटों में अभी निराशा नहीं पनपी है और ‘अच्छे दिन’ की आस बाकी है।  दिल्ली के कुछ वीआइपी इलाकों को छोड़कर लगभग हर मोहल्ले व कालोनी में सप्ताह के किसी न किसी दिन हाट लगने की एक पुरानी व समृद्ध परंपरा है जो न केवल शहर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है बल्कि अर्थव्यवस्था की भी एक अहम कड़ी है, लेकिन, केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले से इन साप्ताहिक बाजारों की कमर ही टूट गई है। दुकानदारों की मानें तो बिक्री आधी से भी कम रह गई है। नोटबंदी का एक महीना बीत जाने के बावजूद बाजार में जोश वापस आने का नाम ही नहीं ले रहा। नकदी के अभाव में इन हाटों के ग्राहक और विक्रेता दोनों परेशान हैं। विक्रेता सोच रहे हैं यह कैशलेस व आॅनलाइन ट्रांजेक्शन क्या बला है और कैसे काम पटरी पर आए, वहीं ग्राहक जेब में बची-खुची नकदी के कारण कुछ चुनिंदा चीजें ही खरीद पा रहे हैं।

सन 1981 से हाट लगा रहे सेवाराम ने अपना तहबाजारी टिकट दिखाते हुए कहा, ‘लगभग एक महीने से हर दिन ग्राहकों का मुंह देखते हुए गुजर रहा है। पहले जहां 1000 तक की बिक्री हो जाती थी, वहीं अब 200 रुपए की बिक्री भी बड़ी मुश्किल से हो पाती है।’ पेटीएम के विकल्प के बारे में पूछे जाने पर सेवाराम ने कहा, ‘मुझे नहीं मालूम ये क्या है, मुझे तो फोन चलाना भी नहीं आता।’ सेवाराम पहले लाल किले के पास हाट में कपड़े बेचते थे और अब मयूर विहार फेज-1 में सोमबाजार में कपड़े की दुकान लगाते हैं। 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद उत्तर प्रदेश से दिल्ली आए नरेंद्र सिंह पिछले 10 साल से मयूर विहार फेज-1 के सोमबाजार में रेडीमेड कपड़ों की दुकान लगा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बेशक व्यापार कम हुआ है, 50 फीसद बिक्री कम हो गई है, बस किसी तरह रोजी-रोटी चल रही है। हालांकि, उन्होंने मोदी के फैसले का समर्थन करते हुए कहा, ‘इससे बेघरों को मकान मिल सकेगा, इस फैसले से काफी उम्मीद है कि हम जैसे लोगों का भला होगा।’ उन्होंने कहा कि जिनके पास बेहिसाब धन या संपत्ति है उन्हें सोचना है, प्रधानमंत्री ने तो कहा है वो फकीर हैं।

वहीं थोड़ी दूरी पर लोहे और लकड़ी के रसोई के सामानों की दुकान लगाने वाली विद्या ने कहा कहा कि हम तो पहले भी गरीब थे, आज भी गरीब हैं, लेकिन मोदी सरकार ने अच्छा काम किया है। पिछले पांच साल से जूते-चप्पल की दुकान लगाने वाले मनीष ने कहा, ‘जितनी मंदी बाजार में अभी देखने को मिल रही है उतनी पहले कभी नहीं रही। कमाई आधी से भी कम रह गई है, लेकिन सरकार ने ठीक किया।’ अर्थशास्त्र के गणित और कैशलेस की समझ से काफी दूर ये दुकानदार लगभग एक महीना बीतने के बाद भी मोदी सरकार के फैसले के साथ खड़े दिखे, उनके आश्वासन पर भरोसा करते नजर आए, केवल इस उम्मीद में कि भ्रष्टाचारियों को सबक मिलेगा और उनकी झोली में भी रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी जरूरतों से जुड़ी राहत की कुछ बूंदे गिरेंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार आगे के बीस दिनों तक इनका सब्र बांधे रख पाएगी।

 

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