लोगों की निजी जानकारी गोपनीय रखने पर सरकार की दलील से सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं - Guidelines are needed to protect private information: Supreme Court - Jansatta
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लोगों की निजी जानकारी गोपनीय रखने पर सरकार की दलील से सुप्रीम कोर्ट सहमत नहीं

पीठ ने कहा कि सार्वजनिक दायरे में मौजूद लोगों की निजी सूचनाओं का इस्तेमाल सिर्फ नियम मकसद के लिये ही सुनिश्चित करने के लिये सर्वमान्य दिशानिर्देशों की आवश्यकता है।

Author August 1, 2017 10:07 PM
देश में एक अरब लोगों के आधार कार्ड बन चुके हैं।

उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार (1 अगस्त) को कहा कि सार्वजनिक दायरे में लोगों की निजी सूचनाओं की संरक्षा के लिये अतिमहत्वपूर्ण दिशानिर्देशों की आवश्यकता है ताकि इनका इस्तेमाल सिर्फ नियत उद्देश्य के लिये ही किया जाये। प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने गुजरात सरकार के वकील की इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि निजी जानकारी के दुरूपयोग से मामला दर मामला के आधार पर निबटा जा सकता है और कहा कि देश की आबादी को ध्यान में रखते हुये सभी को दायरे में रखने वाले दिशानिर्देशों की आवश्यकता है। संविधान पीठ इस सवाल पर विचार कर रही है कि क्या निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है? पीठ ने इस तथ्य का भी जिक्र किया कि भारत ने 1948 के अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं जिसमे निजता को मानवीय अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी है।

इस मुद्दे पर महाराष्ट्र सरकार की दलीलों का जिक्र करते हुये न्यायालय ने कहा, ‘‘यदि हम इसे स्वीकार भी कर लें कि संविधान सभा ने इस पर (निजता के मुद्दे) विचार किया था और इसे मौलिक अधिकारों में शामिल करने के विपरीत फैसला किया तो भी आप इस तथ्य से कैसे निबटेंगे कि भारत ने मानव अधिकारों पर यूनीवर्सल घोषणा पर हस्ताक्षर किया है जो इसे मान्यता देता है।’’

संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल, न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम सप्रे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक दायरे में मौजूद लोगों की निजी सूचनाओं का इस्तेमाल सिर्फ नियम मकसद के लिये ही सुनिश्चित करने के लिये सर्वमान्य दिशानिर्देशों की आवश्यकता है।

पीठ ने कहा, ‘‘यदि मैं किसी कार्य विशेष के लिये नाम, माता पिता का नाम और टेलीफोन नंबर जैसी निजी सूचना देता हूं तो यह अपेक्षा की जाती है कि इसका इस्तेमाल इसी कार्य विशेष में होगा। अन्यथा हम इसके उल्लंघन की स्थिति से कैसे निबटेंगे?’’ बड़ी संख्या में लोगों द्वारा अपनी निजी सूचना सार्वजनिक दायरे में रखे जाने के मसले पर पीठ ने कहा, ‘‘जब आपके पास इतने अधिक इस्तेमाल करने वाले हैं तो आप प्रत्येक मामले के आधार पर फैसला नहीं कर सकते। आपको इसे नियंत्रित करने के लिये दिशानिर्देश की आवश्यकता होगी।’’

इससे पहले, आज सुनवाई शुरू होते ही महाराष्ट्र सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी ए सुन्दरम ने कहा कि शीर्ष अदालत को संविधान और कानून के प्रावधानों की व्याख्या का अधिकार दिया गया है और वह निजता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप शामिल नहीं कर सकती है। उनका तर्क था, ‘‘यह संसद और सिर्फ संसद ही कर सकती है।’’

सुन्दरम ने कहा, ‘‘यह संविधान या कानून की व्याख्या का मामला नहीं है। यह एक अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करने का मामला है। ऐसा सिर्फ संसद द्वारा ही किया जा सकता है।’’ उन्होंने जब संविधान सभा में हुयी बहस का जिक्र किया तो पीठ ने टिप्पणी की कि यह नहीं कहा जा सकता कि संविधान सभा ने निजता के प्रत्येक पहलू पर बहस की थी।

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