ताज़ा खबर
 

शिक्षण संस्थानों को स्वच्छता श्रेणी देने की तैयारी

शिक्षण संस्थानों को अब स्वच्छ शौचालय, स्वच्छ पेयजल और हरे-भरे परिसर के लिए भी रैंकिंग मिलेगी। इन संस्थानों को अपने परिसर के आसपास की सफाई में योगदान और सफाई में नवाचार के उपयोग पर भी अंक मिलेंगे।

Author नई दिल्ली | July 19, 2017 3:58 AM
शिक्षण संस्थानों को अब स्वच्छ शौचालय, स्वच्छ पेयजल और हरे-भरे परिसर के लिए भी रैंकिंग मिलेगी। इन संस्थानों को अपने परिसर के आसपास की सफाई में योगदान और सफाई में नवाचार के उपयोग पर भी अंक मिलेंगे।

स्वच्छ भारत अभियान को एक कदम आगे बढ़ाते हुए केंद्र सरकार ने देश के उच्च शिक्षण संस्थानों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को पहली बार ‘स्वच्छता रैंकिंग’ देने का फैसला किया है। शिक्षण संस्थानों को अब स्वच्छ शौचालय, स्वच्छ पेयजल और हरे-भरे परिसर के लिए भी रैंकिंग मिलेगी। इन संस्थानों को अपने परिसर के आसपास की सफाई में योगदान और सफाई में नवाचार के उपयोग पर भी अंक मिलेंगे। स्वच्छता के पैमाने पर खरे उतरने वाले संस्थानों को पुरस्कृत भी किया जाएगा।  केंद्रीय मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक, देश भर के उच्च शिक्षण संस्थान स्वच्छता रैंकिंग पाने के लिए 20 से 31 जुलाई के बीच आॅनलाइन आवेदन कर सकेंगे। आवेदन करने वाले संस्थानों के दावे की सत्यता जांचने के लिए मंत्रालय की एक जांच टीम अगस्त में इन संस्थानों का दौरा करेगी।

सितंबर के पहले हफ्ते तक संस्थानों की रैंकिंग तैयार कर ली जाएगी। मंत्रालय की ओर से 8 सितंबर को दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें रैंकिंग में अग्रणी संस्थानों को पुरस्कृत किया जाएगा। एचआरडी मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, स्वच्छता अभियान को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि संस्थानों के बीच इस तरह की स्वस्थ प्रतियोगिता हो। हर साल इस रैंकिंग प्रक्रिया को जारी रखने के सवाल पर अधिकारी ने कहा, ‘पहली बार स्वच्छता रैंकिंग देने का प्रयास किया जा रहा है। देखना होगा कि कितने संस्थान इसमें रुचि लेते हैं और क्या परिणाम रहता है। उसके आधार पर ही फैसला किया जाएगा कि इसे आगे जारी रखा जाए या नहीं। उन्होंने कहा कि जांच टीम भेजने का काम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआइसीटीई) को सौंपा गया है। आवेदनों की संख्या के आधार पर टीमें गठित की जाएंगी। स्वच्छता मानदंडों में यह भी देखा जाएगा कि साफ-सफाई के लिए कौन सी नई तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है और क्या संस्थान स्वच्छता के मामले में अपने परिसर से बाहर आसपास के वातावरण और समाज से भी सरोकार रखते हैं। हालांकि, परिसर के बाहर के सरोकारों को 15 फीसद ही महत्त्व दिया गया है जिसमें एक तो यह देखा जाएगा कि क्या संस्थान ने किसी गांव या पड़ोस के क्षेत्र को गोद लिया हुआ है। दूसरा यह कि इन जगहों को स्वच्छ बनाने में संस्थान ने क्या परिणाम हासिल किए हैं।

दिल्ली के आंबेडकर कॉलेज में पत्रकारिता में तीसरे वर्ष के विद्यार्थी कामिल ने कहा उनके कॉलेज के अंदर तो साफ-सफाई है, लेकिन परिसर के बाहर का हाल बुरा है। कामिल ने कहा कि इस तरह की पहल से कुछ तो सुधार होगा। वहीं इसी कॉलेज से पास हुर्इं रीना (बदला हुआ नाम) ने कहा कि वह हाल ही में राजधानी कॉलेज और हिंदू कॉलेज में हिंदी के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रवेश परीक्षा के लिए गई थीं तो उन्हें ऐसे शौचालयों का इस्तेमाल करना पड़ा जहां पानी नहीं था। यहां तक कि हाथ धोने के लिए भी पानी नहीं था। रीना ने कहा कि राजधानी कॉलेज का शौचालय तो गंदा और मच्छरों से भरा था। विद्यार्थी इस स्वच्छता रैंकिंग के फैसले से उत्साहित तो हैं, लेकिन चूंकि इसमें शामिल होने की बाध्यता नहीं है, ऐसे में यह पहल कितनी सफल होती है इसका खुलासा तो आवेदनों की संख्या से होगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X