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डीयू : छात्राएं लगा रहीं शोध पत्र स्वीकारने की गुहार

वैसे तो पीएचडी के छात्रों पर शोध पत्र (थीसिस) जमा न करने के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में शोध पत्र जमा कराने के लिए महीनों विभाग का चक्कर लगाने और इस बाबत कुलपति तक से गुहार लगाने का अनूठा मामला सामने आया है।

Author नई दिल्ली, 20 अगस्त। | August 21, 2018 6:44 AM
प्रतीकात्मक चित्र

वैसे तो पीएचडी के छात्रों पर शोध पत्र (थीसिस) जमा न करने के आरोप लगते रहते हैं, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में शोध पत्र जमा कराने के लिए महीनों विभाग का चक्कर लगाने और इस बाबत कुलपति तक से गुहार लगाने का अनूठा मामला सामने आया है। मामला डीयू के हिंदी विभाग का है और प्रशासन की कथित गलती की वजह से एक नहीं बल्कि सात छात्राओं का भविष्य दांव पर है। अगर उनके शोध पत्र चार अक्तूबर तक स्वीकार नहीं किए गए तो उनका शैक्षणिक जीवन खत्म हो जाएगा। इस मामले को लेकर मिरांडा हाउस कॉलेज की शोधार्थी रिंकू कुमारी की अगुआई में अमिता व मेघा सहित सभी पीड़ित छात्राओं ने आमरण अनशन करने का फैसला किया है। ये वे छात्राएं हैं, जिनका चयन यूजीसी की ओर से जेआरएस कार्यक्रम से हुआ था। सरकार ने इस छात्राओं पर शोध के लिए प्रति शोधार्थी हर महीने कम से कम 20800 रुपए खर्च किए।

रिंकू कुमारी ने बताया कि हम सभी 89 दिन से ज्यादा समय से अमूमन हर रोज हिंदी विभाग का चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन तकनीकी कारणों की बात कहकर शोध पत्र बाद में लिए जाने का आश्वासन दिया जा रहा है। जब छात्राओं ने शोध पत्र जमा करने की समयसीमा का हवाला दिया तो विभाग ने चुप्पी साध ली। छात्राओं ने इस मामले पर विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय तक से गुहार लगाई है और दखल की मांग की है। तीन पीड़ित छात्राओं ने कुलपति को पत्र लिखकर कहा है कि उनका शोध पत्र हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहन, गुरु तेग बहादुर कॉलेज की शिक्षक डॉ वीणा अग्रवाल और डॉ रजत रानी की अगुआई में पूरा हो चुका है। इनका पंजीकरण अप्रैल 2011 में हुआ था।

शोध मंडल से प्राप्त अनुमति, स्वीकृति व अनुशंसा के बाद सभी शोधार्थियों के शोध जमा करने की आखिरी तारीख चार अक्तूबर 2018 है, लेकिन आठ महीने से ज्यादा समय से उन्हें आश्वासन देकर गुमराह किया जा रहा है। कुलपति कार्यालय से अभी तक कोई भी जवाब नहीं मिलने से छात्राएं मायूसी और तनाव में हैं। पीड़ित छात्राएं बताती हैं कि उन्होंने 2016 में शोध समयावधि बढ़ाने का आवेदन दिया था क्योंकि नियमानुसार वे शोध जमा करने के लिए थोड़ा और वक्त चाहती थीं। इस पर बोर्ड की बैठक हुई और यूजीसी के नियमों का हवाला देते हुए उन्हें न केवल समय बढ़ाने की स्वीकृति दी गई बल्कि सभी को पत्र भी भेजे गए। शोध मंडल (डीयू) की ओर से स्वीकृत समयसीमा को लेकर भेजे गए पत्र में कहा गया है, ‘यूजीसी के नियम के अनुसार पंजीकरण की शोध समयावधि को चार अक्तूबर 2016 से दो साल तक के लिए विस्तार की अनुमति शोधमंडल (कला) द्वारा अनुमोदित की जाती है।’

सवाल है कि अगर शोध मंडल ने यह लिखकर स्वीकार किया है तो फिर इन छात्राओं के शोध पत्र क्यों नहीं स्वीकार किए जा रहे हैं? वहीं इस पूरे मामले में डीयू के हिंदी विभाग ने चुप्पी साध रखी है। विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहन से फोन पर बात की गई तो उन्होंने व्यस्तता की बात कहकर मामला टाल दिया। इसके बाद उनसे संपर्क नहीं हो सका। वहीं विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि शोध की अवधि दो साल बढ़ाने की स्वीकृति देना ही विभाग के गले की फांस बन गया है। उन्होंने बताया कि शोध मंडल ने गलती से विस्तार का समय दे दिया, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन इसका विकल्प निकाल सकता है।

एक पीड़ित छात्रा ने कहा कि विश्वविद्यालय अगर तुरंत मामले का समाधान नहीं निकालता है तो उनके पास आमरण अनशन के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। रिंकू कुमारी ने कहा कि गुरुवार से सभी छात्राएं अनशन करने की तैयारी में हैं। उन्होंने कहा कि सरकार एक तरफ ‘बेटी पढ़ाओ’ की बात करती है और दूसरी ओर इस नामचीन विश्वविद्यालय का यह हाल है।

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