ताज़ा खबर
 

एफटीआइआइ विवाद: दिल्ली में डेरा डाला चौहान विरोधियों ने

प्रियरंजन बीते 52 दिन से भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) की चहारदीवारी में चल रहा आंदोलन जम्हूरियत के लोकमंच जंतर मंतर तक यों ही नहीं पहुंचा। इसके पीछे मंशा मसले को संसद तक पहुंचाना है। आंदोलनकारी छात्रों ने कहा है कि यह राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। अब देश की आला पंचायत इस पर […]

Author August 4, 2015 2:27 AM

प्रियरंजन

बीते 52 दिन से भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) की चहारदीवारी में चल रहा आंदोलन जम्हूरियत के लोकमंच जंतर मंतर तक यों ही नहीं पहुंचा। इसके पीछे मंशा मसले को संसद तक पहुंचाना है। आंदोलनकारी छात्रों ने कहा है कि यह राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। अब देश की आला पंचायत इस पर ध्यान दे। बहस करे और रास्ता दिखाए।

एफटीआइआइ छात्र संघ के अध्यक्ष और आंदोलन की अगुवाई कर रहे हरिशंकर नचिमुथ्थु ने जनसत्ता से बातचीत में कहा, यह लड़ाई व्यक्ति विशेष की नहीं है, बल्कि व्यवस्था सुधार की है। जब जजों की नियुक्ति, कुलपतियों की नियुक्ति के लिए ‘चयन समिति’ बनाई जाती है तो फिर एफटीआइआइ के लिए क्यों नहीं? वे अध्यक्ष पद के अलावा सोसाइटी के चार अन्य सदस्यों अनघा घईसास, नरेंद्र पाठक, राहुल सोलापुरकर, शैलेश गुप्ता की नियुक्तियों पर सवाल खड़े करने यहां पहुंचे है।

अदालती आदेश का हवाला देते हुए छात्र संघ प्रवक्ता यशस्वी मिश्र ने कहा कि जब अदालत किसी व्यक्ति के लिए यह टिप्पणी करे कि उसे फिल्म और डाक्यूमेंट्री में अंतर मालूम नहीं तो उसे एफटीआइआइ सोसाइटी में नामित करना कहां तक उचित है? विरोध नैतिकता को लेकर है, व्यवस्था सुधार को लेकर है। दिल्ली आकर प्रदर्शन के बाबत उन्होंने कहा, जब सरकार वहां नहीं पहुंची तो आंदोलन को ही उन तक पहुंचाना जरूरी था।’ छात्रों ने इसे ‘सांस्कृतिक फासीवाद ’ की संज्ञा दी है।

यह पूछने पर कि अध्यक्ष नामित करना तो सरकार का विशेषाधिकार है, एक आंदोलकारी छात्रा साक्षी गुलाटी ने कहा कि उस व्यक्ति का छात्र क्या करें जिससे वे प्रेरित नहीं हो पा रहे। उन्होंने दावा किया कि अभिनेता की नियुक्ति से संस्थान की विचाराधारात्मक स्वायत्तता पर गहरा आघात पहुंचेगा।

आरएसएस की विचारधारा पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि यह विभिन्न संस्थानों में व्यवस्थागत तरीके से ‘औसत दर्जे के लोगों’ को बढ़ावा दे रहा है। अगर 300 लोगों की सूची बनाई जाए तो भी ‘ये नामित लोग’ उसमें नहीं आएंगे। इस सवाल पर कि विरोध का खमियाजा छात्रों को भुगतना पड़ सकता है, आंदोलनकारियों ने कहा , हमें मालूम है कि अंजाम क्या होगा। लेकिन आने वाली पीढ़ी को ठीक एफटीआइआइ मिलेगा। सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह छात्रों की मांग पर तब तक विचार नहीं करेगा जब तक वे अपना आंदोलन छोड़कर कक्षाओं की तरफ नहीं लौटते हैं।

एक प्रदर्शनकारी छात्र ने कहा कि हमें प्रदर्शन करते हुए 50 से अधिक दिन हो गए हैंं। दिल्ली आने का हमारा मकसद यह है कि हमारी बातें सुनी जाएं। हमने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर उनसे हस्तक्षेप करने और सरकार से अनुपयुक्त लोगों की नियुक्तियां रद्द करने और भावी नियुक्तियों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया का गठन करने की अपील की थी। एक अन्य विद्यार्थी ने कहा कि सरकार ने हमारे विरुद्ध विचाराधारा की लड़ाई छेड़ दी है। एफटीआइआइ किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुकेगा। सरकार को अवश्य ही बातचीत शुरू करना चाहिए।

उधर एफटीआइआइ छात्र एसोसिएशन ने सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ को एक पत्र भेजकर उनसे इस मुद्दे पर सकारात्मक बातचीत शुरू करने का अनुरोध किया था। विद्यार्थी चौहान की नियुक्ति का विरोध भाजपा के साथ उनके रिश्ते और उनमें अनुभव और स्तर की कमी के कारण कर रहे हैं। राठौड़ ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर इस आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया है। गांधी ने पिछले सप्ताह एफटीआइआइ परिसर का दौरा किया था और प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों को समर्थन का वादा किया था।

सूचना और प्रसारण राज्यमंत्री ने कहा कि सरकार प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों के साथ बातचीत के लिए तैयार है। लेकिन वह इस मुद्दे का राजनीतिकरण किए जाने के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि किसी न किसी रूप से एक बात तो जरूर सामने आई है कि हल निकालने की कोशिश और हाल की बैठकों के बावजूद विद्यार्थियों का एक ऐसा वर्ग है जिसकी रुचि इस हड़ताल को जारी रखने में है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के पुणे दौरे से यह स्पष्ट हो गया है कि इस हड़ताल ने राजनीतिक रंग ले लिया है या यह शुरू से ही राजनीतिक हड़ताल है।

राठौड़ ने एफटीआइआइ को महत्त्वपूर्ण संस्थान करार देते हुए कहा कि विद्यार्थी संस्थान के बाद आते हैं, पहले हम इस संस्थान को मजबूत बनाएंगे। उन्होंने कहा कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है और विद्यार्थी बैठक के लिए आ सकते हैं। एफटीआइआइ छात्र एसोसिएशन के प्रतिनिधियों की तीन जुलाई को केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री अरुण जेटली के साथ हुई बातचीत से गतिरोध नहीं दूर हो पाया था। छात्रों को कक्षाओं में नहीं लौटने पर निष्कासन समेत कार्रवाई की धमकी दी गई है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App